‘न्यायपालिका और कार्यपालिका में निकटता न्यायपालिका की स्वतंत्रता और लोकतंत्र के हित में नहीं’

jan hasktakshep

 By कमल सिंह

लोकसभा चुनाव के मध्य दमनकारी कानून यूएपीए को समाप्त करने और इसके तहत गिरफ्तार लोगों की रिहाई की मांग,सर्वोच्च न्यायालय के वकीलों ने न्याय व्यवस्था पर उठाए सवाल

दिल्ली में लोकसभा की सभी सात सीटों के लिए 25 मई को होने वाले मतदान , के पहले 18 मई, 2024 को मानवाधिकार व नागरिक अधिकार के लिए सक्रिय संगठन “जन हस्तक्षेप” ने ‘प्रेस क्लब ऑफ इंडिया’ में” गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम” (यूएपीए) को “बिना अपराध सजा” वाला दमनकारी कानून बताते हुए एक सेमिनार का आयोजन किया।

सेमिनार को आमंत्रित वक्ता सर्वोच्च न्यायालय के वरिष्ठ वकील कॉलिन गोंजाल्विस, संजय पारिख और शाहरुख आलम के आलावा नागरिक व मानवाधिकारों के लिए सक्रिय दिल्ली स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स में प्रोफेसर नंदिनी सुंदर ने संबोधित किया। पीयूसीएल की राष्ट्रीय संयोजक कविता श्रीवास्तव ने भी सम्मेलन में शिरकत की।

सेमिनार के अंत में एक प्रस्ताव पारित करके गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (यूएपीए) को समाप्त करने और इसके अंतर्गत तहत जेल में लंबे समय तक बंद निर्दोष व्यक्तियों के नाजायज उत्पीड़न को रेखांकित करते हुए उनकी रिहाई की मांग की गई। बैठक की अध्यक्षता एवं संचालन डॉ.अनूप सराया ने किया।

लोकसभा के वर्तमान आम चुनाव का हवाला देते हुए “जन हस्तक्षेप” के संयोजक डॉ. विकास बाजपेयी ने इस संसदीय चुनाव के नतीजों के संभावित दूरगामी प्रभाव को रेखांकित करते हुए कहा, “1947 के बाद स्थापित लोकतंत्र, संविधान और उसके द्वारा जनता को हासिल अधिकारों, सरकार की जवाबदेही, नीतियों पर सवाल करने और जनता द्वारा अपनी मांगों के लिए लोकतांत्रिक संघर्ष करने के अवसरों की हिफाजत दांव पर है।”

उन्होंने कहा कि देश में सरकार बदलती रही हैं, आम जनता के लोकतांत्रिक संघर्षों को बलपूर्वक दबाने का प्रयास हर सरकार करती रही है, लगातार दमनकारी कानून बनाए जाते रहे हैं। वर्तमान सरकार ने यूएपीए के प्रावधानों को इतना सख्त कर दिया है कि इसके तहत लोगों को गिरफ्तार करके बेहद लंबे समय से जेल में अवरुद्ध उत्पीड़ित किया जाना आम हो गया है। यह कानून अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और लोकतंत्र के लिए भीषण खतरा बन गया है।

सर्वोच्च न्यायालय के वरिष्ठ वकील कॉलिन गोंजाल्विस ने उच्च न्यायपालिका में मौजूद तनावपूर्ण स्थिति की ओर ध्यान आकर्षित करते उच्च न्यायालयों और सर्वोच्च न्यायालय के कई निर्णयों का उदाहरण देते हुए बताया ‘उच्च न्यायपालिका और कार्यपालिका के बीच निकटता बढ़ रही है और इसका प्रतिकूल प्रभाव न्यायपालिका के निचले स्तर तक है और यह स्थिति न्याय व्यवस्था के लिए खतरनाक है।’

भाजपा से जुड़े वकील का प्रमोशन सुप्रीम कोर्ट में

गोंजाल्विस ने भाजपा से जुड़े एडवोकेट लक्ष्मना चंद्र विक्टोरिया गौरी के उस कथन का हवाला दिया जिसमें खुले तौर पर कहा गया : “ हरे (मुस्लिम) आतंक और श्वेत (ईसाई) आतंक”। इसके बावजूद सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने उन्हें सुप्रीम कोर्ट में पदोन्नत करने की सिफारिश की। जब इस पर एतराज किया गया तो कॉलेजियम का जवाब था, “वे केवल पात्रता की जांच कर सकते हैं, संबंधित व्यक्ति की उपयुक्तता की नहीं।”

उन्होंने बताया न्यायपालिका और कार्यपालिका में निकटता न्यायपालिका की स्वतंत्रता और लोकतंत्र के हित में नहीं होती है। आज स्थिति यह है कि सर्वोच्च न्यायालय में न्यायाधीश भी दो भाग में बटे हैं। एक वे जो सरकार के नजदीक हैं, दूसरे वे जो अपेक्षाकृत स्वतंत्र हैं। अगर चुनाव के बाद भी कार्यपालिका और न्यायपालिका के बीच ऐसी ही सामंजस्य की स्थिति रही तो देश की न्याय व्यवस्था के लिए यह खतरनाक होगा।

पीयूसीएल से संबंधित सर्वोच्च न्यायालय के वरिष्ठ वकील संजय पारिख ने विस्तार से बताया कि कैसे पिछले कुछ दशकों में अदालतों ने धीरे-धीरे आपराधिक न्यायशास्त्र को सिर के बल खड़ा कर दिया है।

पहले अदालत का मानना था कि “किसी व्यक्ति के विचार या व्यक्त इरादे (भले ही हिंसा की बात करें) कुछ भी हो, उसे तब तक आतंकवादी घोषित नहीं किया जा सकता जब तक कि ऐसे व्यक्ति की हिंसा या आतंकवादी गतिविधि में संलिप्तता व्यवहार (एक्शन) में आतंक का स्पष्ट कृत्य (OVERT ACT) नहीं हो।

लेकिन अब किसी व्यक्ति को आतंकी कानूनों के तहत फंसाए जाने के लिए उसके द्वारा किसी प्रकार का आतंकी कृत्य किया गया है, यह आवश्यक नहीं है। उन्होंने प्रधानमंत्री राजीव गांधी की हत्या के मामले का हवाला देते हुए बताया कि न्यायालय ने इसे हत्या का अपराध ही माना था, आतंकवादी कृत्य नहीं माना था।

श्रीलंका में भारतीय फौज के खिलाफ यह हत्या का मामला था, आतंकवाद का मामला मानने से न्यायालय ने इनकार कर दिया था। आज यूएपीए के तहत किसी व्यक्ति को फंसाने के लिए केवल ‘षड्यंत्र’ या “साजिश” का आरोप लगा देना ही पर्याप्त है। संजय पारिख ने इस दमनकारी कानून को समाप्त करने के लिए न्यायाधीशों के बोध, समझदारी, विवेक का आसरा लेने या न्यायपालिका पर निर्भरता की जगह सशक्त जन आंदोलन की जरूरत है।

सर्वोच्च न्यायालय की वरिष्ठ एडवोकेट शाहरुख आलम ने भारत में पुलिस और सरकार के रवैये की तुलना करते हुए बताया वहां पुलिस तंत्र कितना ही सैन्यीकृत हो नागरिकों के प्रदर्शन पर दमन के बावजूद आंदोलनकारियों को 2-3 दिन में छोड़ दिया जाता है। उन्होंने इस संदर्भ में गाजा में इजरायल द्वारा जारी जनसंहार में अमेरिकी सरकार के समर्थन के विरोध में प्रदर्नकारी छात्रों की गिरफ्तारी और रिहाई का उदाहरण दिया।

इसके विपरीत, भारतीय पुलिस औपनिवेशिक दमनकारी की तरह व्यवहार करती है। उन्होंने कहा ‘केवल पुलिस ही नहीं यहां न्याय व्यवस्था भी सैन्यीकृत (Militarized) है। नागरिकों के संवैधानिक अधिकारों के प्रति सम्मान का काफी अभाव है।

दूसरे देशों में पुलिस और कानून लागू करने वाली एजेंसियां किसी व्यक्ति के खिलाफ पहले सबूत एकत्र करती हैं, फिर इन सबूतों के आधार पर उनकी हिरासत की मांग के लिए अदालतों का दरवाजा खटखटाती हैं। भारत में पुलिस और राज्य एजेंसियों को बेलगाम अधिकार है, वह अपराध के आरोप की जांच के दौरान भी किसी व्यक्ति को महीनों हिरासत में रख सकती है।

इसके अतिरिक्त, एक यह नजरिया भी विकसित हुआ है व्यक्ति जिस पर आरोप है, अदालतें कथित अपराध की जांच करने से ज्यादा, व्यक्ति की राजनीति, उसके इरादे के बारे में पूछताछ करती हैं और तथ्य व सबूत की जगह निर्णय में इसका प्रभाव नजर आता है।

विपक्ष के नेताओं की गिरफ्तारी अथवा गिरफ्तारी का भय दिखाकर सरकार द्वारा राजनीतिक भयादोहन

लोक सभा चुनाव में जहां “फासीवाद बनाम लोकतंत्र” की चिंता में जहां भ्रष्टाचार, ईडी, पीएमएलए आदि अपराध में विपक्ष के नेताओं की गिरफ्तारी अथवा गिरफ्तारी का भय दिखाकर सरकार राजनीतिक भयादोहन कर रही है, शासक वर्ग के इस अंतर्विरोध तक विषय सीमित है, वहां छत्तीसगढ़ में हवाई बमबारी, एनकाउंटर के नाम पर निर्दोष जनजाति किसानों, महिलाओं व मासूम बच्चों की पुलिस व अर्द्ध सैन्य बलों का संहार किया जा रहा है और मीडिया में यह सवाल हाशिए पर है।

कोई भी संसदीय दल इस पर खामोश है, यह सवाल नागरिक अधिकार व मानवाधिकार के प्रति संवेदनशील इस विचार गोष्ठी में छत्तीसगढ़ में जारी दमन की ओर ध्यान आकर्षित करते हुए दिल्ली स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स की प्रोफेसर नंदिनी सुंदर ने वर्तमान शासकों की नीतियों पर निशाना साधते हुए कहा, “यूएपीए जैसे कानूनों का इस्तेमाल आतंक को नियंत्रित करने के लिए नहीं बल्कि लोगों में आतंक फैलाने के लिए किया जा रहा है। राज्य सुनियोजित तरीके से इस प्रकार की नीतियां लागू कर रहा है, जिसके तहत देश की आबादी का बड़ा हिस्सा आदिवासी जनजाति, अल्पसंख्यक, विशेष रूप से मुसलमान और दलित समुदाय नागरिक अधिकारों से महरूम हो जाए।

‘राजसत्ता को इन समुदायों की लोकतांत्रिक अधिकारों की आकांक्षा सरकार के मंसूबों में बाधा नजर आती है। किसी भी आदिवासी को केवल इसलिए आतंकवादी घोषित किया जा सकता है और उसकी हत्या की जाती है क्योंकि वह प्राकृतिक संसाधनों से समृद्ध ऐसे क्षेत्र में बसा हुआ है, जिसे सरकार उन्हें सौंपना चाहती है, जिससे उन्हें धन हासिल हो सके।’

प्रो.नंदिनी सुंदर ने न्यायालय के पूर्वाग्रह के उदाहरण में शरजील इमाम औरत उमर खालिद के संदर्भ में अदालत में न्यायाधीशों की टिप्पणियों का हवाला दिया।

शरजील के मामले में न्यायाधीश द्वारा कहा गया उसके भाषणों से मुसलमान लामबंद हुए और न्यायालय की नजर में चाहे कोई हिंसा का सबूत नहीं है फिर भी यही ही अपराध का पर्याप्त सबूत है।

इसी प्रकार उमर खालिद के बारे में अदालत की टिप्पणी थी कि उसके भाषण से मुसलमान वैचारिक तौर पर संगठित हो रहे थे। अदालत ने मुसलमानों की लामबंदी और वैचारिक तौर पर संगठित होने को खतरे के रूप में देखा था। वे सभी जो लोगों को उन विचारों और शब्दों से लैस करना चाहते हैं जो उनके संघर्षों को अभिव्यक्ति देने में मदद करते हैं, आतंकवादी माने जाते हैं।

सुश्री सुंदर ने कहा, आरोपित व्यक्ति की राजनीति को आधार बनाने भर से शासकों का मकसद पूरा नहीं होता है इसलिए यूएपीए की आवश्यकता है, ताकि लम्बे समय तक जेल में बंद रखा जा सके।

अंत में प्रश्न उत्तर सत्र के बाद एक पंक्ति के प्रस्ताव में कहा गया – ‘दमनकारी कानून यूएपीए का लोकतांत्रिक समाज में कोई स्थान नहीं है, इसे तुरंत समाप्त किया जाना चाहिए, और इस अधिनियम के तहत गिरफ्तार सभी व्यक्तियों को रिहा किया जाना चाहिए।

वरिष्ठ पत्रकार एवं जन हस्तक्षेप के संयोजक अनिल दुबे के धन्यवाद के साथ कार्यक्रम का समापन हुआ। कार्यक्रम में पीयूसीएल की राष्ट्रीय संयोजक कविता श्रीवास्तव ने भी शिरकत की।

पीपुल्स यूनियन फाॅर सिविल लिबर्टीज़ उत्तर प्रदेश द्वारा प्रकाशित पुस्तक “मानवाधिकार के 75 वर्ष : युद्ध के विरुद्ध शांति, समता, न्याय और आजादी के लिए” का वितरण किया गया जिसमें यूएफीए, सहित तमाम दमनकारी कानून, ऑपरेशन ग्रीन हंट के जरिए नागरिकों पर सैन्य बल के प्रयोग सहित विभिन्न सरकारों द्वारा अपनाई गई दमनकारी नीतियों और भारत में बढ़ता दमन और मानवाधिकार, सीएए, मजदूर अधिकारों पर हमले, किसान आंदोलन जैसे विभिन्न मुद्दे समेटे गए हैं।

 

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