संघर्ष

14 साल की लड़ाई के बाद 25 एफ़एफ़ के तहत निकाले गए 272 एचटी कर्मचारियों की तुरंत बहाली के आदेश

दिल्ली में हिंदुस्तान टाइम्स से 14 साल पहले निकाले गए 272 कर्मचारियों को कोर्ट से एक बड़ी जीत हासिल हुई है।

कोर्ट ने 2004 से निकाले गए इन कर्मचारियों को वेतन समेत बहाल करने का निर्देश दिया है।

यानी 14 का बकाया वेतन भी प्रबंधन को देना पड़ेगा।

प्रबंधन ने उस समय एक झटके में करीब साढ़े तीन सौ कर्मचारी निकाल दिए थे। तबसे लेकर आजतक हिंदुस्तान टाइम्स, कस्तूरबा मार्ग दिल्ली के कार्यालय के बाहर लॉन में ये कर्मचारी धरना दे रहे हैं और कानूनी लड़ाई लड़ रहे हैं।

प्रबंधन ने हिंदुस्तान टाइम्स लिमिटेड का मालिकाना हक हिंदुस्तान टाइम मीडिया लिमिटेड को ट्रांसफर करने के बहाने इन कर्मचारियों को निकाला था।

कोर्ट के आदेश में कहा गया है कि प्रबंधन उन सभी कर्मचारियों के वेतन जमा कराए, जिन्होंने सेवानिवृत्ति की उम्र पार नहीं की है। ये राशि सेवा शर्तों के मुताबिक होनी चाहिए और एक महीने के भीरत कोर्ट में जमा की जानी होगी और कोर्ट ही इसे कर्मचारियों को देगी।

कोर्ट ने कंपनी को 23 जनवरी 2012 के आदेश को तुरंत लागू करने का आदेश दिया जिसमें सेवाओं के बहाल किए जाने का फैसला आया था।

25एफ़एफ़ के तहत निकाला था कर्मचारियों को

2012 में औद्योगिक ट्रिब्यूनल ने कहा था कि औद्योगिक विवाद अधिनियम 1947 की धारा 25 एफ़एफ़ के तहत कर्मचारियों की बर्खास्तगी अवैधानिक थी और एचटीएल को आदेश दिया था कि सभी कर्मचारियों को सेवा निरंतरता के साथ बहाल किया जाए।

हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि ये एक ऐसी स्थिती है कि जिसमें कर्मचारी एक ऐसी सुरंग में फंस गए हैं जहां साढ़े छह साल पहले ट्रिब्यूनल के आदेश के बावजूद उन्हें कोई उम्मीद की रोशनी नहीं दिखाई देती।

पटियाला कोर्ट से वर्करों के पक्ष में आदेश को चुुनौती देने के लिए कंपनी हाईकोर्ट चली गयी थी।

ये मुकदमा आयताराम एंड अदर्स वर्सेज हिन्दुस्तान टाईम्स के नाम से जाना जाता है।

13 साल से धरने पर बैठे रवींद्र ठाकुर की हिंदुस्तान टाइम्स कार्यालय के बाहर ही अक्टूबर 2017 में मौत हो गई।

272 कर्मचारियों में कुछ लोगों की मौत हो चुकी है। अभी पिछले साल ही अक्टूबर में ही हिंदुस्तान टाइम्स के सामने पिछले 13 साल से न्‍याय की आस में बैठे रविंद्र ठाकुर की मौत हो गई थी।

लगभग 56-57 साल की उम्र के रविंद्र ठाकुर मूल रुप से हिमाचल प्रदेश के रहने वाले थे।

आदेश की कॉपी पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.

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