साहित्य

  • Photo of मारुति आंदोलन पर बनी फ़िल्म ‘फ़ैक्ट्री’ दिखाती है कि लड़ना ही एकमात्र रास्ता है

    मारुति आंदोलन पर बनी फ़िल्म ‘फ़ैक्ट्री’ दिखाती है कि लड़ना ही एकमात्र रास्ता है

    By सौरभ कुमार  सनं 2012 में हरियाणा के मानेसर की मारुति सुजुकी फैक्ट्री के भीतर श्रमिकों और प्रबंधन के बीच के तनाव ने तब एक दुखद मोड़ लिया जब एक प्रबंधक की मृत्यु हो गयी। कंपनी द्वारा 213 मजदूरों को हत्या के लिए आरोपित किया गया और 147 की गिरफ्तारी हुई। मार्च, 2015 में 79 मजदूरों को जमानत मिली, 68…

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  • Photo of 10 जुलाई से आशा वर्कर्स हैं हड़ताल पर,  वेतन 4000 से बढ़कार 12,000 हज़ार करने की कर रही हैं मांग

    10 जुलाई से आशा वर्कर्स हैं हड़ताल पर, वेतन 4000 से बढ़कार 12,000 हज़ार करने की कर रही हैं मांग

    वेतन बढ़ोत्तरी को लेकर आशा वर्कर्स शुक्रवार से हड़ताल पर हैं। आशा वर्कर्स की मांग है कि सरकार उनका वेतन 4,000 हज़ार से बढ़ाकर 12,000 हज़ार करे। साथ ही 22 राज्यों में करीब तीन लाख आशा वर्कर्स वेतन बढ़ोतरी, कोरोना से सुरक्षा, जीवन बीमा आदि मांगों को लेकर प्रदर्शन कर रही हैं। इससे पहले आशा वर्कर्स 3 जनवरी को हड़ताल…

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  • Photo of पाठ्यक्रम से संविधान, तर्क, विज्ञान हटने से अराजक पीढ़ी पैदा होगी- नज़रिया

    पाठ्यक्रम से संविधान, तर्क, विज्ञान हटने से अराजक पीढ़ी पैदा होगी- नज़रिया

    By चंद्रशेखर जोशी सीबीएसई ने बच्चों के दिमाग से संविधान को हटाने की औपचारिक घोषणा कर दी है। 22 भागों में लिखे संविधान की मूल बातें अब पाठ्यक्रम का हिस्सा नहीं रहेंगी। सीबीएसई ने जूनियर कक्षाओं के पाठ्यक्रम से धर्मनिरपेक्षता, राष्ट्रवाद, नागरिकता, लोकतांत्रिक अधिकार संबंधी पाठों को हटा दिया है। बोर्ड ने तर्क दिया है कि कोरोना वायरस संकट के…

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  • Photo of भूख से बड़ा बागी कुछ नहीं होता इस दुनिया में!- ख़ालिद ख़ान की कविताएं

    भूख से बड़ा बागी कुछ नहीं होता इस दुनिया में!- ख़ालिद ख़ान की कविताएं

    (युवा कवि ख़ालिद ए. ख़ान की ये कविताएं बग़ावती तेवर लिए हुए होती हैं। कला के लिए कला या कविता के लिए कविता चाहे अपनी जगह सही हो, लेकिन अगर उसमें भविष्य के सपने न हों तो आवाम के लिए उसका कोई ख़ास महत्व नहीं रहता। खालिद की कविताएं भविष्य के सपने बुनती हैं, उम्मीद दिखाती हैं, वही उम्मीद जिसके…

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  • Photo of नदी डूबने वाली है!

    नदी डूबने वाली है!

    By पृथ्वी परिहार   नदी डूबने वाली है! सोचो गर गांव अपने घर चला गया तो शहर का क्या होगा। गारे से लड़ पड़ी करंडी तो तुम्हारी उजली सहर का क्या होगा। क्या होगा साफ्टवेयर राउटर से बनी तुम्हारी इस रंगीली दुनिया का हार्डवेयर बनाने वाला कारीगर गर भूख से मर गया होगा। यूं ही नंगे पांव तपती सडक़ पर…

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  • Photo of सब नहीं मरे थे महामारी से

    सब नहीं मरे थे महामारी से

    बच्चा लाल ‘उन्मेष’   सब नहीं मरे थे महामारी से ———————————————— जब दुनिया लड़ रही थी महामारी से सब नहीं लड़े थे इकतरफा कुछ लड़ रहे थे भूख से कुछ लड़ रहे थे अपने हिस्से में ज़बरन डाले गए दुःख से जब दुनिया भयभीत थी महामारी से सब भयभीत नहीं थे इकतरफा कुछ भयभीत थे क्रूर निज़ाम से कुछ भयभीत…

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  • Photo of पचपन बरस की मज़दूरी पेट में नहीं सीने में दुखती है

    पचपन बरस की मज़दूरी पेट में नहीं सीने में दुखती है

    इस बरस में लोग अपने घर की छत देखते हैं उम्र की घड़ियाँ ठहरती नहीं हैं लेकिन कुछ पल लोग अपने बीते दिनों की याद में बिताते हैं अपने बच्चों को स्कूल की दहलीज से निकल कर दुनिया की उस पंक्ति में देखते हैं जहाँ से तारे परिवार के लिए सुख लेकर आते हैं लेकिन वे गए मज़दूरी के लिए…

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  • Photo of कौन जात हो भाई?

    कौन जात हो भाई?

    By बच्चा लाल ‘उन्मेष’ कौन जात हो भाई? “दलित हैं साब!” नहीं मतलब किसमें आते हो? आपकी गाली में आते हैं गन्दी नाली में आते हैं और अलग की हुई थाली में आते हैं साब! मुझे लगा हिन्दू में आते हो! आता हूँ न साब! पर आपके चुनाव में। क्या खाते हो भाई? “जो एक दलित खाता है साब!” नहीं…

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  • Photo of एक फ़िल्म बताती है कि कैसे मज़दूरों ने अकेले दम पर खुद का अस्पताल खड़ा कर दिया

    एक फ़िल्म बताती है कि कैसे मज़दूरों ने अकेले दम पर खुद का अस्पताल खड़ा कर दिया

    By संजय जोशी  2014 में भिलाई में रहने वाले और मजदूरों के बीच में काम करने वाले दस्तावेज़ी फ़िल्मकार अजय टी जी ने 53 मिनट लम्बी एक दस्तावेज़ी फ़िल्म बनाई। नाम था इसका ‘पहली आवाज़’। दूरदर्शन और भारत सरकार के प्रयास पीएसबीटी (पब्लिक सर्विस ब्रॉडकास्ट ट्रस्ट) द्वारा संयुक्त रूप से निर्मित पहली नज़र में एक साधारण दस्तावेज़ लगती है। एक अस्पताल के बारे…

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  • जा रहे हम…

    – संजय कुंदन- जैसे आए थे वैसे ही जा रहे हम यही दो-चार पोटलियां साथ थीं तब भी आज भी हैं और यह देह लेकिन अब आत्मा पर खरोंचें कितनी बढ़ गई हैं कौन देखता है कोई रोकता तो रुक भी जाते बस दिखलाता आंख में थोड़ा पानी इतना ही कहता – यह शहर तुम्हारा भी तो है उन्होंने देखा…

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