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हर साल 28 बटालियन के बराबर मौतें होती हैं

हाथ से मैला उठाने के काम में लगे लोगों की 28 बटालियन के बराबर मौत हो जाती है….हाथ से मैला ढोने की प्रथा ने भारत में किसी महामारी से भी अधिक जानें ली हैं. और ये आज भी बदस्तूर हैं. इससे जुड़े तीन लोगों की आज भी हर घंटे मौत हो जाती है. यहां हर रोज़ क़रीब एक सफाई कर्मी गटर में दम तोड़ देता है. हालांकि 2017 का सरकारी आंकड़ा 300 मौतों का है. इसमें सबसे ऊपर है तमिलनाडु जहां अकेले लगभग आधी मौतें दर्ज की गईं. इसके बाद कर्नाटक (59), यूपी (52) और दिल्ली (12) का नंबर आता है. भारत दुनिया का इकलौता देश है जहां सफ़ाई का काम दलितों के हवाले है. हालांकि यहां गटर में घुसकर सफ़ाई करने पर 2013 से ही पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया गया. और 1993 से ही यहां हाथ से मैला उठाने के काम पर प्रतिबंध लगा हुआ है. लेकिन ऐसे लोगों की संख्या और मौतें कम होने की बजाय बढ़ी हैं. हाथ से मैला ढोने वालों की संख्या 2017 में 13,000 थी. पर 2018 के सर्वे में ये संख्या 53,236 हो गई है. यानी चार गुने की बढ़ोत्तरी. हाथ से मैला साफ करने के काम से जुड़े रहने वाले 22,327 सफाई कर्मियों की हर साल जान जाती है. ये संख्या सेना की क़रीब 28 बटालियन के बराबर है. 2011 में हुए सामाजिक आर्थिक सर्वे के मुताबिक देश भर में 1,67,487 लोग इस काम में लगे हुए हैं. ये बहुत बहुत कमतर करके दिखाया गया है. ज़मीनी हालात इससे भी भयावह हैं..

 

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