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उत्तराखंडः चार दिन से धरने पर बैठे इंटरार्क मज़दूरों और महिलाओं का फूटा गुस्सा

उत्तराखंड में बिल्डिंग के स्टील ढांचे बनाने वाली कंपनी इंटरार्क में 10 सितम्बर से हड़ताल में मज़दूरों के परिजन भी शामिल हो गए हैं।

इंटरार्क मजदूर संगठन किच्छा व सिडकुल पंतनगर के वर्करों के साथ उनकी पत्नियां व बच्चे भी सड़क पर उतर कर असिस्टेंट लेबर कमिश्नर का घेराव कर दिया है।

शुक्रवार को चौथे दिन कंपनी ने लेबर विभाग की मध्यस्थता में बातचीत का आश्वासन दिया था लेकिन 14 सितम्बर को डीएम ग़ैरमौजूद हो गए।

इस दौरान मज़दूरों और उनके बीबी बच्चों और स्थानीय जनता ने एएलसी तक लंबा पैदल मार्च निकाला।

वर्कर प्रतिनिधियों ने चेतावनी दै ही कि अगर श्रम कानूनों को लागू नहीं किया गया तो पूरे सिडकुल के मजदूरों को सड़कों पर उतरना पड़ेगा जिसकी पूरी जिम्मेदारी यहां के शासन और उत्तराखंड सरकार की होगी।

इसके अलावा मज़दूरों ने एलसी में बैठी एडविक कर्मकार यूनियन को भी मान्यता देने की मांग रखी। इंकलाबी मज़दूर संगठन के कैलाश भट्ट ने बताया कि अब संगठन एडविक के निकाले कर्मचारियों की बहाली की भी मांग कर रहे हैं।

गौरतलब है कि अवैध गेट बंदी और अवैध वेतन कटौती के चलते वर्करों का गुस्सा फूटा।

इंटरार्क मज़दूरों के परिजन

क्या है मामला

कैलाश भट्ट के अनुसार, पंतनगर और किच्छा में दो प्लांट हैं। पंतनगर में सात सौ से अधिक परमानेंट मज़दूर काम कर रहे हैं जबकि किच्छा में तीन से क़रीब परमानेंट मज़दूर हैं। इसके अलावा तीन सौ मज़दूर ठेके और कैजुअल वाले हैं।

यूनियन और मैनेजमेंट की सहमति से हर साल जुलाई महीने में कंपनी और यूनियन के बीच वेतन भत्ते संबंधी समझौता होता है।

मज़दूरों का दावा है कि 2014 से हर साल ढाई हज़ार रुपये (कैश इन हैंड) की वेतन बढ़ोत्तरी होती आई है। पिछले साल तो 2700 रुपये तक की बढ़ोत्तरी हुई।

लेकिन इस साल सितम्बर आ गया और किसी समझौते पर बातचीत नहीं बनी।

हालांकि जुलाई से ही वर्कर प्रतिनिधियों के साथ साथ बात चीत चल रही थी लेकिन अचानक कंपनी ने गेट पर एक अगस्त को नोटिस चिपका दी, जिसमें 1400 रुपये बढ़ोत्तरी का एकतरफा फैसला लिखा हुआ था।

यूनियन ने इसका प्रतिवाद करते हुए फैसले को एकतरफा बताया और इस संबंध में गेट पर एक नोटिस चिपका दी।

एएलसी से डीएम कार्यालय तक मज़दूरों महिलाओं की रैली।

घटनाक्रम

मैनेजमेंट ने 17 अगस्त को दोनों यूनियनों के महामंत्रियों को निलंबित कर दिया।

मैनेजमेंट यहीं नहीं रुका, 22 अगस्त को आठ वर्करों को, जिनमें पंतनगर यूनियन के कोषाध्यक्ष भी शामिल थे, कम प्रोडक्शन का आरोप लगाकर बाहर कर दिया।

मज़दूरों के अनुसार, बदले की भावना से की गई इस कार्रवाई के विरोध में पंतनगर प्लांट की पूरी नाइट शिफ्ट के मज़दूर प्लांट में ही धरने पर बैठ गए।

मज़दूरों ने कहा कि अगर कम प्रडोक्शन की बात है तो सभी मज़दूरों को सस्पेंड किया जाए।

दूसरे दिन जब एक शिफ्ट के मज़दूर आए तो वो भी धरने पर बैठ गए और बाद में बी शिफ्ट के मज़दूर भी उसमें शामिल हो गए।

यही नहीं किच्छा प्लांट के वर्कर भी इसी तरह अपने प्लांट के अंदर धरने पर बैठ गए और उन्होंने भी खुद को सस्पेंड करने या निकाले गए सभी दस वर्करों की बहाली की मांग रख दी।

क़रीब तीन दिन तक दोनों प्लांटों के एक हज़ार मज़दूर अंदर ही दिन रात बैठे रहे, कोई घर नहीं गया।

मज़दूरोंने कहा कि अगर समझौता नहीं होता है तो वो रक्षाबंधन में भी प्लांट के अंदर ही रहेंगे।

इसी बीच पंत नगर के मज़दूरों के घरों की क़रीब छह सौ महिलाएं भी पंतनगर मार्केट में धरने पर बैठ गईं।

मैनेजमेंट ने आखिरकार 24 अगस्त को मज़दूरों को बहाल कर लिया और वेतन समझौते को लेकर 14 सितम्बर को लेबर विभाग की मध्यस्थता में वार्ता का वादा किया।

मैनेजमेंट ने अपने ही वादे को तोड़ा

इस बीच सात सितम्बर को मैनेजमेंट ने कम प्रोडक्शन का हवाला देते हुए सभी मज़दूरों की तनख्वाह में चार हज़ार से सात हज़ार रुपये तक कटौती कर दी।

उन मज़दूरों के वेतन भी काट लिए गए जिनका प्रोडक्शन से कोई संबंध नहीं था, जैसे कि ड्राईवर, कैंटीन, हाउस कीपिंग आदि। यहां तक कि उन वर्करों पर भी गाज गिरी जो नोएडा या तमिलनाडु के प्लांटों में भेजे गए थे।

जबकि सुपरवाइजर और प्रोडक्शन मैनेजर की रिपोर्ट है कि अधिक प्रोडक्शन के कारण माल डंप पड़ा हुआ है इसलिए प्रोडक्शन को कम किया गया।

इस तरह मैनेजमेंट ने मज़दूरों पर दबाव बढ़ा दिया जिसके ख़िलाफ़ मज़दूर और उनके परिजन, बच्चों समेत रुद्रपुर के एएलसी कार्यालय पर 10 सितम्बर से धरने पर बैठ गए।

असिस्टेंट लेबर कमिश्नर कार्यालय का रवैया

जब मज़दूर और महिलाएं, बच्चे एएलसी कार्यालय पर धरने पर बैठे तो उन्हें भी जगह खाली करने का नोटिस दे दिया गया।

उन्होंने भारतीय औद्योगिक विवाद अधिनियम 1947 की धारा के उल्लंघनको कारण बताया।

जब यूनियन ने प्रतिवाद किया कि लेबर ऑफ़िस में धरना देना किस क़ानून के तहत ग़ैरक़ानूनी है तो एएलसी कार्यालय नरम पड़ा।

इसके बावजूद यूनियन प्रतिनिधियों और मैनेजमेंट के बीच कलेक्ट्रेट में वार्ता होनी थी लेकिन डीएम गायब हो गए।

अखिरकार एडीएम की मौजूदगी में वार्ता जारी है।

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