नज़रिया

सरकार ने अटल का एक वीडियो 12 साल तक दबाए रखा…

-कमल सिंह, वरिष्ठ पत्रकार

अटल बिहारी वाजपेयी का उदारतावाद केवल मुखौटा था। वे पूरी तरह आरएसएस के स्वयं सेवक आैर हिंदुत्ववादी थे। कांग्रेस के पतन आैर जनता पार्टी के उदय एवं बिखराव के दौर में उन्होंने जनसंध आैर बाद में जनता पार्टी की नीतियों के माध्यम से आरएसएस की हिंदुत्ववादी नीतियों को ही आगे बढ़ाया।

राष्ट्रीय राजनीति में वे सेंटर स्टेज पर नरसिम्हा राव के दौर में आए। यह वह दौर था जब साेवियत संघ बिखर चुका था आैर वैश्वीकरण का दाैर था। वाजपेयी ने नरसिम्हा राव की आर्थिक नीतियों को पूरी वफादारी से आगे बढ़ाया जिस प्रकार आज मोदी सरकार इसे आैर तेज गति से आगे बढ़ा रही है।

13 दिन के अपने प्रथम कार्यकाल में उन्होंने बस एक ही काम किया वह यह कि विदेशी एनराॅन बिजली कंपनी के साथ समझौते पर हस्ताक्षर किए जबकि इससे पूर्व महाराष्ट्र में शरद पवार की सरकार के खिलाफ इस कंपनी के साथ समझौते का विरोध भाजपा एवं संघ कर रहे थे।
बाबरी मस्जिद के विध्वंस पर अटल बिहारी वाजपेयी ने इसे ‘राष्ट्रीय शर्म की घटना’ बताया था। यह उनका एक रूप था तो उनका दूसरा रूप एक बाबरी मस्जिद विध्वंस के एक दिन पूर्व लखनऊ में कारसेवकों की सभा में उनके भाषण में देखा जा सकता है।

इस भाषण से जाहिर होता है बाबरी मस्जिद विध्वंस की योजना की न केवल उन्हें जानकारी थी बल्कि अपनी लच्छेदार भाषण शैली ने उन्होंने कारसेवकों को इसके लिए उत्साहित भी किया था।

उनके इस भाषण का वीडियो गुप्तचर विभाग के पास भी था (यह वीडियो 2005 में आउटलुक पत्रिका के माध्यम से प्रकाश में आया)। इससे जाहिर हाे जाता है कि वाजपेयी को बाबरी मस्ज़िद गिराए जाने का पूरा अंदाज़ा था।

क्या बाबरी ध्वंस के बारे में जानकारी थी?

कारसेवकों को संबोधित करते हुए वाजपेयी ने अपने चिर परिचित अंदाज में, मस्ज़िद का हवाला दिए बिना कहा, ‘सुप्रीम कोर्ट ने भजन-कीर्तन की अनुमति दे दी है। व्यक्ति अकेला भजन नहीं कर सकता है। कीर्तन खड़े-खड़े नहीं किया जा सकता। हम कितनी देर तक खड़े रह सकते हैं? जमीन खुरदुरी है आैर उसमें नुकीले पत्थर हैं। कोर्इ उनपर बैठा नहीं रह सकता। जमीन को समतल करना पड़ेगा।’

वाजपेयी ने जनता की तालियों आैर वाह-वाही के बीच अपने भाषण को जारी रखा, ‘अगर कल यज्ञ प्रारंभ होता है, कुछ सृजन होगा… यह सर्दियों का मौसम है। कुछ लोग दक्षिण से आए हैं। वे एेसे मौसम के अभ्यस्त नहीं हैं। उनके लिए एक शामियाना लगाना होगा… मैं नहीं जानता कल क्या होगा… मैं अयोध्या जाना चाहता था परंतु मुझे दिल्ली जाने के लिए कहा गया है।’

वाजपेयी का यह भाषण गुप्तचार विभाग द्वारा रिकार्ड वीडियो के अंश हैं। जाहिर है, राव भी इससे बखूबी वाक़िफ होंगे। इसके बावजूद 12 साल तक इसके बारे में लोगों को कुछ पता ही नहीं चल सका!

सूत्रों के अनुसार, ये वीडियो इस वजह से ठंडे बस्ते में बंद पड़ा रहा क्योंकि केंद्र सरकार के उच्चतम स्तर पर काेर्इ था, जो नहीं चाहता था कि यह सार्वजनिक हो। अगर ये वीडियो उस वक्त सामने आ जाता, वाजपेयी के लिए कठिनार्इ की वजह बन सकता था (सर्इद नकवी : बीइंग द अदर्स, पृष्ठ92-93)।

गुजरात दंगों और ‘अटल वरदहस्त’

गुजरात के दंगों के समय मोदी की अालोचना के संदर्भ में वाजपेयी के उदारवादी रुख का हवाला दिया जाता है। हक़ीक़त यह है कि गोधरा के बाद भी गुजरात मोदी के मुख्यमंत्रित्व में महीनों (कम से कम तीन माह) सांप्रदायिक दंगों में झुलसता रहा।

संसद में प्रबल विरोध होता रहा परंतु मोदी सरकार पर केंद्र का वरदहस्त बरकरार रहा।

प्रधानमंत्री बनने के बाद इंडियन एक्सप्रेस के प्रतिनिधि सर्इद नकवी से उन्होंने 1947 में सांप्रदायिक आधार पर हुए भारत विभाजन काे उचित बताया था।

नकवी इस मुलाकात के बारे में बताते हैं,  “प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी मई 1996-जून से 1996 13 महीने, दूसरी बार 19 मार्च 1998 को 11 महीने के लिए और तीसरी बार 1999 से 2004 तक कुल लगभग छह साल प्रधान मंत्री रहे।”

‘विभाजन अच्छा था क्योंकि मुसलमान कम रह गए हैं’

नकवी बताते हैं, “इस दौरान एक बार उन्होंने अपनी जीभ को गालों में गढ़ाते हुए मुझसे कहा था, ‘विभाजन हिंदुओं के लिए अच्छा था क्योंकि अब यहां हमारे संभालने के लिए मुसलमान कम तादाद में रह गए हैं।” (सर्इद नकवी : बीइंग द अदर्स, पृष्ठ 147)

यह तथ्य जाहिर करता है कि वाजपेयी के बारे में जब यह कहा जाता है कि संघ आैर भाजपा से संबंधित होने के बावज़ूद वे अल्पसंख्यकों के प्रति उदार हैं, में कितनी सचार्इ है।

उनका यह दूसरा रूप मीनाक्षीपुरम में धर्मांतरण के बाद वहां उनके भाषण में देखा जा सकता है। उन्होंने अल्पसंख्यकों के प्रति विष वमन करते हुए यह भी कहा कि उड़ीसा, मध्यप्रदेश आैर छत्तीसगढ़ के कबीलार्इ इलाकों में जिस तेजी से र्इसार्इकरण हो रहा है, इससे वे अत्यधिक चिंतित हैं।

धर्मांतरण पर राष्ट्रीय बहस चाहते थे अटल

उन्होंने धर्मांतरण पर राष्ट्रीय बहस किए जाने की अपील की। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ से संबंधित के.एन. गोविंदाचार्य ने अपने को उन लोगों के लिए समर्पित कर दिया जो हिंदू धर्म से ‘भटक’ गए हैं। — (सर्इद नकवी : बीइंग द अदर्स, पृष्ठ 80)

बहरहाल, यह तो सत्य है कि वे भारतीय संसदीय राजनीति के रंगमंच में एेसे अभिनेता थे जो ताजिंदगी मुखौटे के नीचे अपने असली चेहरे को छुपाए रखने में कामयाब रहे।

उनके मरने के बाद भी यही कहा जा रहा है कि वाजपेयी सही व्यक्ति थे, बस वे ग़लत पार्टी में वे थे। हालांकि सत्य यह है कि मोदी आैर वाजपेयी में कोर्इ फर्क है तो बस इतना कि मोदी के चेहरे पर मुखौटा नहीं है।

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