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बिजली कर्मचारियों ने पर्चा निकाल कर कहा, निजीकरण के बाद किसानों को देना पड़ेगा हर महीने 6000 रु.

कर्मचारी परिषद ने पूरी गणित समझाकर बताया कि सरकार भ्रामक प्रचार कर दे रही है धोखा

1971 के बाद ग्रामीण विद्युतीकरण ने भारत के किसानों की तकदीर बदल दी। गांव तक बिजली पहुंचने से हम खाद्यान के मामले में न केवल आत्मनिर्भर हो गए अपितु खाद्यान निर्यात भी कर रहे हैं।

आज जब सारी दुनिया कोविड – 19 महामारी के संक्रमण से कराह रही है तब भारत के गोदामों में 50 लाख टन चावल और 27 लाख टन गेहूं भरा हुआ है।

हमारे गोदाम लबालब भरे हैं और पूरे देश को खाना खिलाने में सक्षम हैं तो इसमें बिजली की बड़ी भूमिका है। कारपोरेट के निजी क्षेत्र के बिजली घरों को बैंकों द्वारा दिया गया छह लाख करोड़ रुपये डूब गया है जिसकी भरपाई के लिए आम उपभोक्ता की बिजली दरें बढ़ाई जाती हैं।

इसे ऐसे समझिये कि अभी किसानों को मुफ्त बिजली मिलती है या प्रति हार्स पॉवर के हिसाब से बहुत कम दरों पर बिजली मिलती है।

देश में बिजली की औसत लागत 06 .73 रुपये प्रति यूनिट है। बिजली के निजीकरण के बाद निजी कंपनी को एक्ट के अनुसार कम से कम 16 प्रतिशत मुनाफा लेने का अधिकार होगा।

कंपनी चाहे तो और अधिक मुनाफा भी ले सकती है। बिजली की औसत लागत रु 06 . 73 प्रति यूनिट पर कम से कम 16 प्रतिशत मुनाफा जोड़ दें तो सब्सिडी समाप्त होने के बाद किसानों को 8 रुपये प्रति यूनिट से कम कीमत पर बिजली नहीं मिलेगी।

एक किसान यदि साल भर में 8500 से 9000 यूनिट बिजली खर्च करता है तो उसे 72000 रुपये साल बिजली का बिल देना पड़ेगा जो 6000 रुपये प्रति माह आता है। बिजली की दरों में सब्सिडी समाप्त होने के बाद किसानों को बिजली का पूरा बिल देना होगा।

किसानो को झांसा देने के लिए सरकार यह कह रही है कि किसान पहले पूरा बिल भर दे फिर बाद में सरकार चाहे तो किसान के खाते में गैस सिलिंडर की तरह बिजली की सब्सिडी की धनराशि उसके बैंक खाते में डाल सकती है।

यहां यह समझने की बात है कि पहले तो गरीब किसान को 6000 रुपये प्रति माह जमा करना होगा और यह बिल न जमा करने पर बिजली का निजीकरण होने के बाद निजी क्षेत्र की बिजली कंपनी आज की सरकारी कंपनी की तरह कोई रियायत नहीं देगी बल्कि उसकी बिजली तुरंत काट देगी।

दूसरी बात यह कि सरकार किसान के बैंक खाते में सब्सिडी की धनराशि डालेगी भी तो उसमे कई महीने लग सकते है ऐसी स्थिति में किसान क्या कई महीने बिजली का बिल अदा किए बिना बिजली कट जाने पर अपनी फसल बचा पायेगा ?

निजीकरण से बेतहाशा बढ़ेंगी बिजली की दरें

देश में सबसे पहले 120 साल पहले मुंबई में बिजली का निजीकरण हुआ था। मुंबई में आज भी बिजली आपूर्ति निजी कंपनी अदानी और टाटा के पास है।

मुंबई में आम उपभोक्ता के लिए घरेलू बिजली की दरें 10 से 12 रुपये प्रति यूनिट है।

निजीकरण के बाद इन्हीं या इन जैसी निजी कम्पनियों को और शहरों और गांवों की बिजली आपूर्ति मिल जाएगी।

अभी सरकारी कंपनियाँ बड़े उद्योगों और बड़े व्यावसायिक प्रतिष्ठानों को लागत से थोड़े अधिक दाम पर बिजली देकर जो मुनाफा कमाती हैं उससे ही किसानों और घरेलू उपभोक्ताओं को सस्ती बिजली दे रही हैं।

सरकारी कम्पनियां जहां जनकल्याण के लिए काम कर रही हैं, वहीं निजी कंपनियां मुनाफे के लिए काम करती हैं। यह प्रचार भ्रामक है कि निजीकरण से बिजली सस्ती होगी। मुंबई इसका ज्वलंत उदाहरण है।

बिजली उत्पादन के क्षेत्र में पहले ही कई निजी कम्पनियां काम कर रही हैं और मुनाफा लेकर सरकारी बिजली उत्पादन कंपनियों की तुलना में कहीं अधिक महंगी दरों पर बिजली बेच रही हैं।

नए बिल में यह प्राविधान भी किया जा रहा है कि निजी क्षेत्र की बिजली उत्पादन कंपनियों को लागत के पूरे पैसे का भुगतान पहले सरकारी कंपनी करे तभी वह आम लोगों को देने के लिए बिजली ले पाएगी। यह भुगतान सुनिश्चित करने के लिए केंद्र सरकार एक नई अथॉरिटी बनाएगी।

इन सबके बाद फिर यह प्रचार करना कि निजीकरण के बाद बिजली सस्ती हो जाएगी पूरी तरह भ्रामक है और आम जनता से धोखा है।

( विद्युत कर्मचारी संयुक्त संघर्ष समिति, उप्र द्वारा जनहित में जारी किया गया पर्चा )

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