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लॉकडाउन के बीच वन विभाग ने ध्वस्त कर दिए ओडिशा के आदिवासियों के घर

अब इन आदिवासियों के पास रहने और खाने का कोई बंदोबस्त नहीं बचा

By आशीष सक्सेना

ये कैसा निजाम है और किन लोगों की जिंदगी महफूज करने को दुबला हुआ जा रहा है। लॉकडाउन इसीलिए है न कि लोगों की सांसों को वायरस से खतरा न पैदा हो। दूसरी तरफ सरकारी विभाग लोगों की जिंदगी तबाह करने का काम भी इसी लॉकडाउन के बीच करने लगें तो क्या माना जाएगा।

आखिर ऐसी क्या मुसीबत आ गई उड़ीसा के वन विभाग को कि उसने इस नाजुक मौके पर 32 आदिवासी परिवारों को उजाड़ दिया। उनके घर ध्वस्त कर दिए, बेघर कर दिया। बताया जा रहा है कि ऐसी घटना इस बीच मणिपुर में भी हो चुकी है।

आदिवासियों से जहां दुनियाभर के वैज्ञानिक ग्रह बचाने की उम्मीद लगा रहे हैं, उनके साथ ऐसी ज्यादती बहुत महंगी पड़ सकती है। ये अमानवीय तरीके वन अधिकार कानून का भी उल्लंघन हैं।

‘डाउन टू अर्थ’ की रिपोर्ट के मुताबिक उड़ीसा के आदिवासी गांवों में अध्ययनों से पता चला है कि लोग जंगलों से 357 प्रकार के खाद्य पदार्थों को हासिल करते हैं।

बगैर जंगलों को सहेजे वे सदियों से ऐसा कैसे कर पाए! वहीं केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने क्या किया?
वर्ष 2017-18 में जैव विविधता संरक्षण के लिए 30 करोड़ रुपये उपलब्ध कराए थे, जो 2018-2019 में केवल 14 करोड़ रुपये रह गया।

जबकि कृषि फसलों में पाई जाने वाली आनुवंशिक विविधता का लगभग तीन-चौथाई हिस्सा पिछली सदी में खत्म हो गया।
आज 90 प्रतिशत ऊर्जा और प्रोटीन केवल 15 पौधों और 8 जानवरों की प्रजातियों से आता है।

सच्चाई यही है कि जहां आदिवासी हैं, वहां जंगल बचे हुए हैं। जहां वे नहीं, वहां जंगल का नामोनिशान मिट चुका है।

‘अंतरसरकारी विज्ञान नीति मंच’ की ओर से किए गए अध्ययन में ये बात वैज्ञानिकों ने धरती के आसन्न संकट को समझाकर कहा गया है,-  ‘कुदरत के बचे हुए खजाने को अब मूल निवासी ही बचा सकते हैं, जो दूरदराज के इलाकों में रहते हैं। जो विनाशकारी औद्योगिक खेती से होने वाले नुकसान की जद में नहीं आए हैं। ये समुदाय प्रकृति की रक्षा करना जानते हैं, कई बार वैज्ञानिकों से भी बेहतर। ‘ ये अभी तक का सबसे बड़ा अध्ययन है, जिसमें 50 देशों के 500 से ज्यादा वैज्ञानिक शरीक हुए।

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