‘आदिवासियों के भगवान’ ने खुद मैदान में उतरकर सिखाया कि गुलामी के खिलाफ लडऩा पड़ता है

अंग्रेजी हुकूमत से मुक्ति युद्ध के इतिहास में सिर्फ बिरसा मुंडा ही रहे, जिन्होंने नायक होने का ऐसा फर्ज निभाया कि उनको भगवान का दर्जा हासिल हो गया। एक ऐसा भगवान जिसने अपनी पूजा नहीं कराई, बल्कि ये सिखाया कि गुलामी की जंजीर तोडऩे को लडऩा ही पड़ेगा।

आज जब पूरी दुनिया के वैज्ञानिक पर्यावरण और जैव विविधता की चिंता में आदिवासियों का मुंह तक रहे हैं। वहीं, भारत समेत अधिकांश विश्व में आदिवासी बहुराष्ट्रीय कंपनियों की चाकर सरकारों के दमन का शिकार हो रहे हैं।

मुंडा जनजातियों ने 18वीं सदी से 20वीं सदी तक कई बार अंग्रेज सरकार, भारतीय शासकों, जमींदारों के खिलाफ विद्रोह करके आजादी का परचम बुलंद किया। बिरसा मुंडा की अगुवाई में 19वीं सदी के आखिर में हुए विद्रोह को उलगुलान (महान हलचल) नाम से जाना जाता है, जो उस सदी का सबसे क्रांतिकारी जनजातीय संघर्ष था। इस मुक्ति युद्ध में हजारों मुंडा आदिवासियों ने शहादत देकर अंग्रेजी हूकूमत की चूलें हिला दीं।

बिरसा मुंडा ने मुंडा आदिवासियों को जनविरोधी नीतियों के खिलाफ जागरुक किया तो सरकार ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया। बाद में उन्होंने धार्मिक उपदेशों के जरिए जब जागरुकता फैलाई तो आदिवासियों ने भगवान मान लिया। इस तरीके से बिरसा मुंडा ने आदिवासियों के बीच कुरीतियों को भी खत्म करने का बीड़ा उठाया।

1898 में डोंबरी पहाडियों पर मुंडाओं की विशाल सभा मेें आंदोलन की भूमिका तैयार हुई। 24 दिसंबर 1899 को बिरसा मुंडा ने साथियों के साथ अंग्रेजों के खिलाफ युद्ध छेड़ दिया। 5 जनवरी 1900 तक पूरे आज के झारखंड मेंं विद्रोह आग की तरह फैल गया। ब्रिटिश फौज ने विद्रोह को कुचलने को दमन शुरू कर दिया।

नौ जनवरी को अंतिम युद्ध हुआ, जिसमें हजारों मुंडा आदिवासियों की शहादत हुई और बड़ी संख्या में गिरफ्तारी हुईं। गिरफ्तार लोगों में दो को फांसी, 40 को आजीवन कारावास, छह को 14 वर्ष की सजा, तीन को चार से छह साल की जेल और 15 को तीन बरस की जेल हुई।

बिरसा मुंडा पहले तो पुलिस की पकड़ में नहीं आए, लेकिन एक स्थानीय गद्दार की मुखबिरी से 3 मार्च को वो भी गिरफ्तार हो गए। तब तक वे जंगलों में भूखे-प्यासे भटकने कमजोर हो चुके थे। जेल में उन्हे हैजा हो गया और 9 जून 1900 को रांची जेल में उनका देहांत हो गया। उस समय उनकी उम्र महज 25 साल थी।

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