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संकटकाल में भी ‘कौन जात हो’ का सवाल, उत्तराखंड में दलित भोजन माता के हाथों बने भोजन को खाने से इनकार

पलायन करके घर पहुंचने की जद्दोजहद करने वाले या पहुंचने वाले मजदूरों में अधिकांश दलित जातियों के ही हैं

By आशीष सक्सेना

उत्तराखंड की खूबसूरत वादियों को निहारने वालों को शायद यकीन नहीं होगा कि यहां कितनी गहराई से जातिवाद पसरा है। ‘कौन जात हो का सवाल’  संकटकाल में साफ दिखाई दे रहा है, भले सरकारी भोंपू बनी मुख्यधारा की मीडिया ‘जमाती-जमाती’ करके कितना ही भ्रम में डाल ले।

ताजा घटनाक्रमण ये हैं कि उत्तराखंड के नैनीताल में ओखलकांडा ब्लॉक के भुमका गांव में दूसरी जगहों से आकर क्वारंटाइन किए गए दो सवर्ण चाचा-भतीजे ने दलित महिला के हाथों बना खाना खाने से इनकार कर दिया।

बात ग्राम प्रधान तक पहुंची और उनको समझाया भी गया, लेकिन वे नहीं माने। गांव के प्रधान मुकेश चंद्र बौद्ध ने नाई पट्टी के पटवारी को शिकायत की है। प्रधान ने दोनों सवर्णों के खिलाफ एससी एसटी एक्ट के तहत मुकदमा दर्ज करने की मांग की है। पटवारी ने ग्राम प्रधान पर कार्रवाई का भरोसा दिया है।

स्कूल में बने क्वारंटाइन सेंटर में खाना पकाकर देने की जिम्मेदादी भोजन माता को है, जो मिड डे मील भी तैयार करती हैं। इस सेंटर में पांच लोगों को क्वारंटाइन किया गया है, जिनमें तीन दलित और हिमाचल प्रदेश व हल्द्वानी से आए सवर्ण चाचा-भतीजे हैं। खाना न खाने वाले दो लोगों को घर से बना खाना मंगाया जा रहा है।

यहां बता दें, सवर्ण बहुल उत्तराखंड राज्य में दलित जातियों के साथ दुव्र्यहार और छुआछूत आज भी कायम है। दलितों में शिल्पकार जाति बहुल है, जो शिल्प संबंधी सभी कामों को परंपरागत तरीके से करती रही है। इसके अलावा समारोह में ढोल-बैंड बजाने का काम भी वही करते हैं। उनको मंदिरों में प्रवेश की इजाजत नहीं है।

पहाड़ के जिन गांवों के लिए मोटर मार्ग, पेयजल, मोबाइल सिग्रल की दिक्कत ज्यादा है, वे आमतौर पर दलित बहुल गांव ही हैं। छुआछूत की हालत का अंदाजा इसी से लगा सकते हैं कि सालभर पहले दो वारदातों ने देश को झकझोर दिया। एक घटना में दलित के कुर्सी पर बैठ जाने भर से हत्या कर दी गई और एक घटना में चक्की को छू लेने से दलित का गला रेत दिया गया।

लॉकडाउन के दौरान देहात में पहुंच रहे मजदूरों के साथ मैदानी क्षेत्र में जातिगत दुव्र्यहार की घटनाएं आम हैं। लखीमपुर खीरी में एक दलित पृष्ठभूमि के मजदूर को सरेआम पुलिस ने पीटा, जो कि गेहूं पिसाने के लिए क्वारंटाइन सेंटर से बाहर आ गया था। उसने खुदकुशी कर ली।

बरेली के नवाबगंज क्षेत्र में जैसे-तैसे घर पहुंचे युवक को ताकतवर बिरादरी के लोगों ने अछूत की हालत में डाल दिया। गन्ना छीलने की मजदूरी को पहुंचा तो उसे वहां से गालियां देकर भगा दिया गया।

ये भी सच है कि पलायन करके घर पहुंचने की जद्दोजहद करने वाले या पहुंचने वाले मजदूरों में अधिकांश दलित जातियों के ही हैं। उनको इस सदी में फिर से अछूत प्रथा से सामना करने की मजबूरी पेश हो रही है।

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