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भाग-1ः ‘सीवरों, और सेप्टिक टैंकों में हमें मारना बंद करो’

हर साल देश में 22000 से अधिक लोग सीवर सफाई के दौरान मर जाते हैं

By राजकुमार तर्कशील

साल 2018 में दिल्ली के मोती नगर में सेप्टिक टैंक की सफाई करने के दौरान 5 मजदूरों की मौत हो गई।

गौरतलब है कि 5 मजदूरों की यह मौत ना तो किसी मीडिया की कवरेज बनी और ना ही किसी राजनीतिक दल के लिए विमर्श बनी। लेकिन यह घटना कोई पहली घटना नहीं थी और आखरी भी नहीं।

स्थान अलग अलग हो सकते हैं, लेकिन घटना में एक समानता यह है कि बगैर किसी सुरक्षा के नालों और सेप्टिक टैंक में सफाई करने की मजबूरी।

मानव मल  उठाना, मैला प्रथा राष्ट्रीय शर्म  है, लेकिन सफाई कर्मचारियों पर बने आयोग के हवाले से बताया गया है कि हर साल देश के अलग-अलग हिस्सों में 22000 से अधिक लोग सीवर सफाई के दौरान मर रहे हैं।

यह तो सरकारी आंकडा है, दरअसल सिवर की सफाई के दौरान मरने वालों की संख्या हमेशा विवादित रही है।

भीम यात्रा

इन हत्याओं को लेकर पूरे देश में आंदोलन भी होते रहे हैं, 10 दिसंबर 2015 को डिब्रूगढ़ से शुरू होकर, दिल्ली पहुंची सरकारी सफाई कर्मचारी आंदोलन की अगुवाई में निकली भीम यात्रा का विशेष फोकस सीवर एवं सेप्टिक टैंकों में होने वाली मौतों पर था।

इसका प्रमुख नारा था सूखे संडासों, सिवरों, और सेप्टिक टैंकों में हमें मारना बंद करो। लेकिन मैला प्रथा का अंत अब तक क्यों नहीं हो पाया ? अब तक  यह प्रथा क्यों बनी हुई है? जबकि हमारा संविधान हर नागरिक के सम्मान की बात करता है।

लेकिन मैला प्रथा के खिलाफ दो राष्ट्रीय कानून होने के बावजूद भी यह अमानवीय प्रथा जारी है। मैला ढोने की प्रथा खत्म करने से जुड़ा पहला कानून 1993 में आया था।

जिसके अनुसार हाथ से सफाई करने वाले कामगारों के रोजगार एवं शुष्क शौचालय प्रतिषेध अधिनियम के तहत मैला ढोने की प्रथा और सुखी लैट्रिन को स्पष्ट रूप से प्रतिबंधित कर दिया था।

विडंबना यह है कि इस अधिनियम मे मैला ढोने वालों की परिभाषा स्पष्ट नहीं थी। इसमें खाली शुष्क शौचालयों के साफ करने वालों को शामिल किया गया था।

अधिकारियों के बचाव का रास्ता छोड़ दिया गया, अधिनियम के अध्याय 4 अनुच्छेद 14 मैं दंड का प्रावधान है, लेकिन आज तक किसी को कोई दंड नहीं दिया गया।

सरकार  की गंभीरता देखिए 5 जून 1993 को एंप्लॉयमेंट आफ मैन्युअल स्कैवेंजर्स एंड कंस्ट्रक्शन आफ ड्राई लैटरीन प्रोहिबिशन एक्ट पारित हुआ , लेकिन भारत के राजपत्र में 1997 तक प्रकाशित नहीं हो पाया।

और 2000 तक किसी राज्य ने  इसकी घोषणा नहीं की थी। इससे संबंधित संसद में 2013 में एक और अधिनियम पारित किया।

जिसके अनुसार नाले, नालियों , सेप्टिक टैंक की सफाई के लिए रोजगार या ऐसे कामों के लिए लोगों  की सेवा लेना प्रतिबंध है।

हस्त सफाई कर्मियों के रोजगार निषेध एवं उसके पुनर्वास संबंधित अधिनियम 2013.. इस अधिनियम में सफाई कर्मियों को पहचानने और उनके पुनर्वास करने, उनको वैकल्पिक रोजगार देने पर जोर दिया गया।

इस अधिनियम में उन मजदूरों को भी हस्त सफाई कर्मियों की श्रेणी में रखा गया जो सीवर टैंक या रेलवे की पटरियां  साफ करते हैं।

इसके अलावा मार्च 2014 में सर्वोच्च न्यायालय ने सफाई कर्मचारी आंदोलन और अन्य बनाम भारत संघ में अपने फैसले में मैला ढोने की प्रथा को संविधान के अनुच्छेद 14, 17, 21 और 23 के खिलाफ बताया गया।

(लेखक हरियाणा से हैं और पत्रकारिता में स्वेच्छा से बदलाव के लिए लिखते हैं। ये इस सीरिज़ की पहली कड़ी है।)

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