ग्रामीण महिला मज़दूरों पर क्या बीत रही है, मासा रैली में आईं महिलाओं ने बताया

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By शशिकला सिंह 

रविवार (13 नवंबर) को मासा के बैनर तले देश भर के सैकड़ों मजदूरों ने नए लेबर कोड के विरोध व अन्य मांगों को लेकर विशाल प्रदर्शन किया।

प्रदर्शन में दर्जनों मज़दूर संगठनों, ट्रेड यूनियनों, ग्रामीण मज़दूरों, चाय बागान वर्कर, मनरेगा, आंगनबाड़ी वर्कर, निर्माण मज़दूर, फैक्ट्री वर्कर्स, सफाई कर्मचारी, आंगनवाड़ी वर्कर्स, महिला घरेलू कामगार, खेतिहर मज़दूरों,  स्वीजी, जोमैटो, ऑल-उबर जैसे गिग व प्लेटफ़ॉर्म वर्कर, आईटी-आइटीएस वर्कर ने प्रदर्शन में हिस्सा लिया।

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वर्कर्स यूनिटी की टीम ने रैली सम्बन्धी तमाम वीडियो का फेसबुक पर विस्तार पूर्वक लाइव प्रसारण किया है। साथ ही रैली में शामिल हुई महिला मज़दूरों से उनकी समस्याओं और मांगों पर खुल कर चर्चा भी की।

बिहार के समस्तीपुर जिले में मनरेगा मज़दूर के रूप में काम करने वाली 50 वर्षीय तारामुनि कहती हैं कि न रहने को घर है और न खाने को अनाज। परिवार का पालन पोषण करना काफी मुश्किल हो गया है। हमारे घरों को ठेकेदारों ने तोड़ दिया है।

तारामुनि में बताया कि हम सभी मज़दूरों को पिछले दो सालों के मज़दूरी के नाम पर एक दिन के मात्र 250 रुपए दिए जाते हैं। कभी-कभी तो बस 50 रुपए ही मिलते हैं, जिसके कारण बच्चों को पढ़ाना – खिलाना बहुत कठिन हो गया है। इतना ही नहीं राशन के नाम पर केवल दिखावा किया जा रहा है। 5 सदस्यों के परिवार को एक महीने में केवल 15 किलो गेहूं ही दिया जाता है। पहले मिलने वाले चावल, चीनी, दाल और तेल को बंद कर दिया है।

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तारामुनि ने बताया कि गांव में मज़दूरों के घरों की बिजली भी काट दी गयी है। जब समय पर मज़दूरी नहीं मिलेगी तो बिजली बिलों का भुगतान करना एक दिहाड़ी मज़दूर के लिए मुश्किल है।

प्रदर्शनकारियों की मांग है कि ठेका प्रथा को खत्म कर मज़दूरों को 1000 रुपए प्रति दिन न्यूनतम वेतन दिया जाये।

बिहार ग्रामीण मज़दूर यूनियन के एक सदस्य ने बताया कि बिहार से लगभग 600 मज़दूरों ने मासा की रैली में हिस्सा लिया है जिसमें ज्यादातर महिला मज़दूर हैं। यह सभी मनरेगा में दिहाड़ी मज़दूर के तौर पर काम करती हैं।

‘परेशान हैं तभी गांव से इतनी दूर आये हैं’

अपनी दो साल की बेटी को गोद में लिए प्रदर्शन में बैठीं मात्र 18 वर्षीय दिहाड़ी मज़दूर चांदनी देवी, जिनके तीन बच्चे हैं सबसे बड़ा बेटा 6 और दूसरी बेटी साढ़े चार साल की है। उन्होंने कहा कि परेशान हैं तभी गांव से इतनी दूर आये हैं। वो आगे कहती हैं की उन्होंने कभी नहीं सोचा था कि वह कभी दिल्ली भी आएंगे। लेकिन बच्चों के लिए सब करना पड़ता है।

चांदनी के पति भी एक दिहाड़ी मज़दूर हैं, वो निर्माण क्षेत्र में मुंशी का काम करते हैं। जब एक व्यक्ति की कमाई से घर चलना मुश्किल हो गया, तो चांदनी ने भी दिहाड़ी मज़दूरी करनी शुरू कर दी।

उन्होंने बताया कि परिवार बढ़ा तो उनको पालने का दबाव भी बढ़ा। इसलिए मैंने भी काम करना शुरू किया, लेकिन अभी हालात वही हैं। चांदनी कहती है कि काम तो मिलता है, लेकिन ठेकेदार सही और समय पर मज़दूरी नहीं देता है। सरकार की ओर से जो मज़दूरी मनरेगा मज़दूरों के लिए सुनिश्चित की गयी है, उसको ठेकेदार ही हड़प लेता है। हम मज़दूरों के हाथ में बहुत कम पैसा आता है, जिसके कारण दो वक्त की रोटी खाना भी मुश्किल हो गया है।

चांदनी बताती हैं कि मज़दूर यूनियन के सदस्यों ने कहा कि यदि हम दिल्ली जा कर सरकार से अपनी समस्याओं को बताएँगे तो सरकार हमारी सभी समस्यों का समाधान कर देगी। उन्होंने कहा कि सरकार को मनरेगा योजना में से ठेकेदार को हटा देने चाहिए। तभी हमारे जीवन में कुछ बदलाव आएगा।

ज्ञात हो कि मासा की छह मांगों में ठेका प्रणाली को खत्म करना एक मुख्य मांग है जिसका जिक्र चांदनी में अपनी बातों में किया।

अगर हम ग्रामीण मज़दूरों की बात करते हैं, तो उसमें मुख्य भूमिका खेतिहर मज़दूरों की भी है। जो दिन रात खेतों पर काम करते हैं। इतना ही नहीं यह ऐसे मज़दूर हैं जिनको साल में कुछ महीनों के लिए ही काम मिलता है।

रात में भी करना पड़ता है काम

हरियाणा के हिसार जिले से मासा रैली का हिस्सा बनी प्रवीन कौर ने कहा कि खेतों में काम करना आसान नहीं होती। नराई, बुआई, कटाई और फिर फसल को गाड़ियों में लोड करना ऐसे बहुत से काम होते हैं। साथ ही सभी कामों को निर्धारित समय सीमा पर करना जरुरी है, नहीं तो फसल ख़राब हो जाएगी।जिसके कारण जो मज़दूरी हमको मिलती है वह भी नहीं मिलेगी । उन्होंने बताया कि खेतिहर मज़दूरों के लिए काम के समय की कोई सीमा नहीं है। कभी-कभी तो जमींदारों द्वारा रात को भी काम करने का दबाव बनाया जाता है।

प्रवीन ने बताया कि उनको एक दिन की 250 रुपए दिहाड़ी मिलती है, जो इस महंगाई के दौर में बहुत काम है। खाने-पीने का सामान इतना महंगा है कि एक खेतिहर मज़दूर के इतनी कम दिहाड़ी में गुजारा करना किसी संघर्ष से कम नहीं है।

उन्होंने कहा कि खेतों में रात को काम करना बहुत मुश्किल है, लेकिन फसल खराब होने के कारण मज़दूरी में भी कटौती होती है। इसलिए हम मज़बूरन रात को काम करने के लिए तैयार हो जाते हैं । प्रवीन का आरोप है कि रात में काम के दौरान मज़दूरों को कोई सुरक्षा नहीं दी जाती है। यहां तक कि किसी अनहोनी में यदि मज़दूर की मौत हो जाये, तो किसी तरह के मुआवजे का भी कोई प्रावधान नहीं है। खेतिहर मज़दूरों को अपनी जान की बाजी लगाकर काम करना पड़ता है।

एक खेतिहर मज़दूर होने के नाते प्रवीन ने कहा कि प्रति महीने मिलने वाली दिहाड़ी मज़दूरी को 250 से बढ़ा कर 1000 किया जाना चाहिए। साथ ही खेतिहर मज़दूरों की काम के दौरान होने वाली मौत पर मुआवजा दिया जाना चाहिए।

रैली के दौरान दिहाड़ी मज़दूरों के साथ बातचीत में एक और बात समय आई है कि जब ग्रामीण मजदूरों को सही से काम और मज़दूरी नहीं दी जा रही है जिसके कारण भारी संख्या में महिला मज़दूरों शहरों की ओर रुख कर रही है।

नहीं मिलती साप्ताहिक छुट्टी

दिल्ली के साऊथ एक्स में पिछले 3 साल से घरेलू कामगार के तौर पर काम करने वाली सरजीना बेबी का कहना कि वह गांव में दिहाड़ी मज़दूरी करती थी, लेकिन बहुत कम मज़दूरी मिलती थी। जिस वजह से उन्होंने दिल्ली में घरेलू कामगार के रूप में काम करने का निर्णय लिया। लेकिन यहां भी वही हालात है। उन्होंने बताया कि यहां और वहां के काम में बस इतना अंतर हैं कि यहां ठेकेदार के शोषण का शिकार नहीं होना पड़ता है। लेकिन इसकी कमी को मालिकों द्वारा पूरी कर दी जाती है।

बेबी ने कहा कि मालिक हमारी गरीबी का फायदा उठे हैं जहां एक तरफ घरेलू कामगार को काम वेतन दिया जाता है। वहीं साप्ताहिक छुट्टियां भी नहीं मिलती हैं।

बेबी में बताया कि अगर हम अपने हक़ की आवाज उठाते हैं, तो मालिक हमें काम से ही निकाल देता है। उनका मानना है कि दिल्ली में घरेलू कामगारों की कोई यूनियन नहीं है। इसलिए घरों में काम करने वाली महिलाएं कठिन परिस्थियों में भी काम करने को मज़बूर है।

उनका कहना है कि नए लेबर कोड्स के आने से मज़दूरों को यूनियन बनाने के अधिकार को खत्म कर दिया जा रहा है। जिस लड़ाई को हम लड़ने की तैयारी कर रहे हैं उसको सरकार ख़त्म करने की तैयारी कर रही है। बेबी ने कहा कि यही कारण है कि सभी घरेलू कामगार मासा इस प्रदर्शन का समर्थन करते हुए रैली का हिस्सा बने है।

स्थाई काम पर मिले स्थाई रोज़गार

पश्चिम बंगाल से आई 70 साल की पोदितो दास कपड़ा मिल में ठेका मज़दूर के रूप में काम करती हैं। उन्होंने बताया कि हम लम्बे समय से मिली मालिक से स्थाई काम पर स्थाई रोज़गार की मांग कर रहे हैं लेकिन मालिक हमारी मांगों को मामने के लिए तैयार ही नहीं है।

बुलंद आवाज में नारे बोल रहीं पोदितो की आवाज अचानक भारी हो जाती है। जब वह बताती है कि 4 साल पहले उनके पति की मौत हो गयी थी। जिसके कारण वो मज़बूर हैं जो इतनी ज्यादा उम्र में भी मज़दूरी कर रही हैं। उनके परिवार में चार बच्चे हैं। पोदितो ने बताया की अभी चारों की शादी भी नहीं हुई है। पोदितो को किसी तरह की पेंशन योजना का भी लाभ नहीं मिल रहा है।

उन्होनें कहा कि सरकार को ठेका प्रथा खत्म कर के स्थाई काम पर स्थाई रोज़गार की नीति सुनिश्चित करनी चाहिए। एक ठेका मज़दूर होने के कारण उनको किसी भी तरह की सामाजिक सुरक्षा नहीं उपलब्ध की जा रही है।

महंगाई बढ़ी लेकिन वेतन नहीं

दार्जिलिंग चाय बागानों में काम करने मज़दूरों के संघर्ष कर रहे चाय बागान संग्राम समिति की महिला प्रतिनिधि ने कहा कि महंगाई लगातार बढ़ रही है लेकिन चाय बागानों में काम करने वाले मज़दूरों के वेतन में पीछे 5 सालों में कोई बढ़ोत्तरी नहीं की गयी है।

मज़दूरों को 8 घंटो के बजाये 10 घटों तक काम करने का दबाव बनाया जा रहा है लेकिन उनको न्यूनतम वेतन भी नहीं दिया जा रहा है। उन्होनें बताया कि 2019 में मज़दूरों और बागान मालिकों के बीच आपसी समझौते के यह फैसला हुआ था कि चाय बागानों के मज़दूरों को प्रति दिन 682 रुपए दिया जाये, लेकिन अभी तक ऐसा नहीं किया गया है। आज भी मज़दूरों को प्रति दिन के 232 रुपए ही दिए जा रहे हैं।

प्रगतिशील महिला एकता केंद्र की सदस्य रानी ने बताया कि उत्तराखण्ड में राजा बिस्कुट फैक्ट्री के मज़दूरों को बिना कारण काम से निकाला जा रहा है। उन्होंने राजा बिस्कुट फैक्ट्री में काम करने वाली 35 वर्षीय अनीता से वर्कर्स यूनिटी की बात करवाई। उत्तराखण्ड की रहने वाली अनीता के चार बच्चे हैं और उनके पति की किसी कारणवश मौत हो गयी थी। जिसके बाद वो अकेली हैं, जो परिवार का लालन पालन कर रहीं है।

अनीता ने कहा कि फैक्ट्री मनेजमेंट लगातार वर्कर्स को काम से निकाल रहा है। इतना ही नहीं 12 घंटे काम करने के बाद मात्र 10,000 रुपए प्रति माह वेतन दिया जाता है। और यदि कोई मज़दूर 8 घंटे ही काम करता है उसे वेतन में भी कटौती की दी जाती है। उन्होंने कहा कि मासा इस रैली के माध्यम से हम सरकार से यह मांग करते हैं कि फैक्ट्री वर्कर्स को काम से काम 1000 रूपये प्रति दिन न्यूनतम वेतन दिया जाये।

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गौरतलब है कि देश में महिला मज़दूरों के हालात बहुत ख़राब हैं। इतना ही नहीं इस सभी महिला मज़दूरों को पुरुष मज़दूरों की तुलना में काम वेतन दिया जाता है। महिला सुरक्षा की लगातार धज्जियां उड़ाई जा रही हैं। जिस नए लेबर कोड मोदी सरकार पारित करना चाहती है उसने महिलाओं की सुरक्षा पर एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। नए लेबर कोड में महिलाओं को रात की पीला काम करने की छूट दी गयी है लेकिन इस बात का कहीं भी जिक्र नहीं किया गया है इस दौरान कंपनी मालिकों को किस तरह के सुरक्षा इंतजामों का सुनिश्चित करना होगा।

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One Comment on “ग्रामीण महिला मज़दूरों पर क्या बीत रही है, मासा रैली में आईं महिलाओं ने बताया”

  1. मजदूर, देश की रीढ़ हैं…

    इनका मजबूत होना जरूरी है…

    बढ़िया कवरेज…👍

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