लेबर कोड, निजीकरण के खिलाफ़ दिल्ली में देशभर के मज़दूरों का विशाल प्रदर्शन

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मज़दूर अधिकार संघर्ष अभियान (मासा) के बैनर तले देश भर से जुटे दर्जनों मज़दूर संगठनों, ट्रेड यूनियनों, चाय बागान वर्कर, मनरेगा, आंगनबाड़ी वर्करों ने 13 नवंबर को दिल्ली में लेबर कोड के ख़िलाफ़ विशाल प्रदर्शन किया।

प्रदर्शन व ‘मज़दूर आक्रोश रैली’ का आह्वान देश के 16 मज़दूर संगठनों के साझा मंच मासा ने किया था।

भारी पुलिस बल के बीच रामलीला मैदान से रैली निकली और मज़दूर विरोधी नए लेबर कोड को वापस लेने, देश की सरकारी-सार्वजनिक उद्योगों-संपत्तियों को बेचने पर रोक लगाने आदि माँगों को उठाया और राष्ट्रपति के नाम ज्ञापन दिया।

इस रैली को राष्ट्रपति भवन न जाने देने पर तुली दिल्ली पुलिस ने रामलीला मैदान के पास ही रैली को रोक लिया और अंततः पांच प्रतिनिधि मंडल को राष्ट्रपति भवन जाकर ज्ञापन देने की अनुमति दी गई।

इस दौरान उस समय प्रदर्शनकारी मजदूरों और प्रशासन के बीच तनाव की स्थिति पैदा हो गई जब पुलिस आगे नहीं जाने देना चाहती थी और प्रदर्शनकारी आगे जाने पर अड़ गए। इस बीच नई दिल्ली की भीड़भाड़ वाली सड़क पर ही सारे प्रदर्शनकारी बैठ गए।

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पुलिस ने आखिरकार पांच प्रतिनिधिमंडल को ज्ञापन देने की इजाज़त दी, और रैली को रामलीला मैदान के दूसरी ओर पुरानी दिल्ली की व्यस्त सड़क की ओर मोड़ दिया। प्रशासन की ओर से कहा गया कि रैली को फिर से रामलीला मैदान में ले जा जाए।

लेकिन ट्रेड यूनियन लीडरों ने रामलीला मैदान में फिर से जाने से इनकार कर दिया। और जब रैली घूम कर रामलीला मैदान के मुख्य गेट पर पहुंची, प्रदर्शनकारी सड़क पर ही रुक गए। वहां से फिर रैली उस जगह पहुंची जहां बैरिकेट लगाकर रैली को पहली बार रोका गया था।

ज्ञापन देकर नेताओं के लौटने के बाद ही रैली के समापन की घोषणा की गई। नेताओं ने कहा कि “यह आक्रोश रैली चेतावनी रैली थी, और आने वाले समय अगर मांगों पर सरकार कोई सुनवाई नहीं करती है तो मज़दूर अगली बार रुकने वाले नहीं।”

वीडियो देखें-

  • ज्ञापन देने के बाद नेताओं ने क्या कहा यहां फेसबुक लाईव में देखें
  • रैली की शुरुआत का लाईव वीडियो

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रैली में दिल्ली एनसीआर के साथ उत्तर प्रदेश, हरियाणा, उत्तराखंड, पंजाब, राजस्थान, बिहार, बंगाल, असम, हिमाचल, छत्तीसगढ़ से लेकर कर्नाटका, तमिलनाडु, आंध्रप्रदेश, तेलंगाना, महाराष्ट्र, गुजरात आदि राज्यों से हजारों मज़दूर, छात्र व मज़दूर पक्षधर लोग पहुंचे थे। कार्यक्रम में भारी पैमाने पर महिलाओं ने भागीदारी की।

रैली से पहले रामलीला मैदान में तमाम मज़दूर नेताओं ने संबोधित किया। मोदी सरकार द्वारा थोपे जा रहे नए लेबर कोड्स को मज़दूरों को बंधुआ बनाने वाला बताया। सरकार के देश बेचो अभियान पर हल्ला बोला।

भयावह स्थितियों में जी रहे संगठित व असंगठित मज़दूरों, खेतिहर मज़दूरों, स्वीजी, जोमैटो, ऑल-उबर जैसे गिग व प्लेटफ़ॉर्म वर्कर, आईटी-आइटीएस वर्कर आदि के बुनियादी अधिकारों और महँगाई-बेरोजगारी, छँटनी-बंदी पर लगाम लगाने आदि माँगें उठीं।

वक्ताओं ने कहा कि वर्तमान कानूनों के मौजूद रहते मज़दूरों के हालात बेहद खराब बन गए हैं। कोरोना-पाबंदियों के दौर में सारा कहर मज़दूरों ने झेला। नए कानून मज़दूरों के शोषण के लिए मालिकों को खुली छूट देंगे। ऐसे में मज़दूरों की व्यापक गोलबंदी के साथ बड़ी लड़ाई में जुटाना होगा। यह नव उदारवादी नीतियों और फासीवाद के खिलाफ लड़ाई है।

क्या हैं मांगें और क्या कहते हैं मासा के लीडर, देखें वीडियो

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वक्ताओं ने कहा कि वर्तमान संघर्ष केवल श्रम कानून तक ही नहीं, नया समाज बनाने का भी है। श्रम कोड के ख़िलाफ़ संघर्ष को राजनीतिक आंदोलन के तहत लड़ना होगा। मज़दूर वर्ग पर व्यापक असर डालने वाली विचारहीनता के खिलाफ वैचारिक काम को रचनात्मक ढंग से पूर्ण करना और मज़दूरों को वर्ग के रूप में संगठित करना होगा।

वक्ताओं का कहना था कि भाजपा-आरएसएस ने धर्म-जाति-राष्ट्र का घातक माहौल बनाकर मज़दूर अधिकारों पर हमले तेज किए हैं। ऐसे में फासीवादी और नवउदारवादी कॉरपोरेट पूँजी के संयुक्त हमले के खिलाफ व्यापक संग्रामी एकता बनाना होगा।

केंद्र की मोदी सरकार सहित तमाम राज्य सरकारों द्वारा मज़दूर वर्ग पर बड़े हमले के खिलाफ कुछ एक सालाना हड़तालों और प्रदर्शनों की रस्मी कवायद से बाहर निकलकर मज़दूर आंदोलन को निरंतर, जुझारू और निर्णायक संघर्ष की दिशा में बढ़ाने का आह्वान हुआ।

रैली में महिलाओं की भागीदारी और लेबर कोड को लेकर उनकी प्रतिक्रिया- वीडियो देखें 

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प्रदर्शन के दौरान मज़दूर विरोधी चारों लेबर कोड (श्रम संहिताएं) रद्द करके मज़दूर हित में श्रम कानूनों में संशोधन करने; सार्वजनिक व सरकारी कंपनियों-संपत्तियों पर रोक लगाने व बुनियादी उद्योगों का राष्ट्रीयकरण करने; महँगाई पर रोक लगाने; ठेका प्रथा, नीम ट्रेनी-फिक्स टर्म जैसे धोखाधड़ी वाले रोजगार को समाप्तकर सबको स्थायी रोजगार देने; छँटनी-बंदी पर क़ानूनन रोक लगाने; सभी श्रेणी के मज़दूरों को यूनियन बनाने, आंदोलन करने आदि अधिकारों को बहाल करने; मज़दूर आंदोलनों व जनवादी शक्तियों का दमन बंद करने; एक हजार रुपये न्यूनतम दैनिक मज़दूरी और सभी बेरोजगारों को रुपए पंद्रह हजार मासिक भत्ता देने; नीम ट्रेनी, स्कीम, गिग, प्लेटफ़ॉर्म, घरेलू आदि समस्त मज़दूरों को कामगार का दर्ज देने; कार्यस्थल व सामाजिक सुरक्षा मजबूत करने; समान काम पर समान वेतन देने; आवास, शिक्षा, स्वास्थ्य व खाद्य सुरक्षा मजबूत करने और जाति-धर्म, लिंग आधारित भेदभाव व नफरत की राजनीति बंद करने आदि की मांग बुलंद हुई।

लेबर कोड के ख़िलाफ़ दिल्ली में हुई मासा की रैली की झलकियां- फ़ोटो गैलरी

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सभा को ऑल इंडिया वर्कर्स काउंसिल, ग्रामीण मजदूर यूनियन (बिहार), इंडियन काउंसिल ऑफ़ ट्रेड यूनियंस, इंडियन फेडरेशन ऑफ़ ट्रेड यूनियंस (आइएफटीयू), आइएफटीयू (सर्वहारा), इंकलाबी मज़दूर केंद्र, इंकलाबी मज़दूर केंद्र पंजाब, जन संघर्ष मंच हरियाणा, कर्नाटक श्रमिक शक्ति, लाल झंडा मज़दूर यूनियन (समन्वय समिति), मज़दूर सहायता समिति, मज़दूर सहयोग केंद्र, एंडीएलएफ (स्टेट कोऑर्डिनेशन कमिटी), सोशलिस्ट वर्कर्स सेंटर तमिलनाडु से , स्ट्रगलिंग वर्कर्स कोआर्डिनेशन सेंटर (एसडब्लूसीसी, पश्चिम बंगाल), ट्रेड यूनियन सेंटर ऑफ इंडिया (टीयूसीआई) के नेताओं ने संबोधित किया।

गौरतलब है कि दिल्ली रैली मुहिम के तहत कोलकाता, हैदराबाद व दिल्ली में तीन कन्वेन्शन हुए; देश के विभिन्न हिस्सों में मासा के घटक संगठनों द्वारा और संयुक्त रूप से फैक्ट्री गेटों, मज़दूर बस्तियों और खेतों-खदानों आदि में व्यापक प्रचार अभियान चलाया गया। इसी के साथ सोशल मीडिया पर भी लगातार प्रचार के साथ माहौल बनाने का काम काफी आवेग और ऊर्जा के साथ किया गया था।

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प्रमुख माँगें

  1. मज़दूर विरोधी चार श्रम संहिताएं तत्काल रद्द किया जाए, श्रम कानूनों में मज़दूर-पक्षीय सुधार किया जाए
  2. बैंक, बीमा, कोयला, गैस-तेल, परिवहन, रक्षा, शिक्षा, स्वास्थ्य आदि समस्त सार्वजनिक क्षेत्र-उद्योगों-संपत्तियों का किसी भी तरह का निजीकरण बंद किया जाए
  3. बिना शर्त सभी श्रमिकों को यूनियन गठन व हड़ताल-प्रदर्शन का मौलिक व जनवादी अधिकार दिया जाए, छटनी-बंदी-ले ऑफ गैरकानूनी घोषित किया जाए
  4. ठेका प्रथा ख़त्म करो, फिक्स्ड टर्म-नीम ट्रेनी आदि संविदा आधारित रोजगार बंद किया जाए– सभी मज़दूरों के लिए 60 साल तक स्थायी नौकरी, पेंशन-मातृत्व अवकाश सहित सभी सामाजिक सुरक्षा और कार्यस्थल पर सुरक्षा की गारंटी दी जाए। गिग-प्लेटफ़ॉर्म वर्कर, आशा-आंगनवाड़ी-मिड डे मिल आदि स्कीम वर्कर, आई टी, घरेलू कामगार आदि को ‘कर्मकार’ का दर्जा व समस्त अधिकार दिया जाए
  5.  देश के सभी मज़दूरों के लिए दैनिक न्यूनतम मजदूरी ₹1000 (मासिक ₹26000) और बेरोजगारी भत्ता महीने में ₹15000 लागू किया जाए
  6.  समस्त ग्रामीण मज़दूरों को पूरे साल कार्य की उपलब्धता की गारंटी दी जाए। प्रवासी व ग्रामीण मज़दूर सहित सभी मज़दूरों के लिए कार्य स्थल से नजदीक पक्का आवास-पानी-शिक्षा-स्वास्थ्य-क्रेच की सुविधा और सार्वजनिक राशन सुविधा सुनिश्चित की जाए।

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