कॉकरोच आंदोलन को लेकर मशहूर लेखिका अरुंधति रॉय का भ्रम कैसे टूटा?

By अरुंधति रॉय
बरसों बाद अपने हिंदुस्तानी होने पर इतना गर्व महसूस हो रहा है। जब लगा कि अब कोई उम्मीद नहीं बची है, वो आ गए। बरसात के साथ नन्हें, जवान ‘कॉकरोच’। वे जन्मे एक जज और एक चुटकुले के मिलन से।
अब तक तो हम सभी यह कहानी जान चुके हैं मगर फिर भी रिकॉर्ड रखने के लिए इसे यहां दर्ज करने में कोई गुरेज़ नहीं है।
भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की गुरूर भरी, ज़लील करने के मक़सद से की गई टिप्पणी कि ‘कुछ बेरोज़गार भारतीय युवा ‘कॉकरोच’ और ‘परजीवी; हैं, इसकी प्रतिक्रिया में अमेरिका के बोस्टन में रहने वाले छात्र अभिजीत दीपके ने सोशल मीडिया पर अंग्रेज़ी में लिखा- ‘क्या हो कि अगर सारे कॉकरोच एक साथ आ जाएं?’
लाखों लोगों ने इस पर प्रतिक्रिया दी, और इस तरह ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ अस्तित्व में आ गई। दीपके उस कहानी वाले बांसुरी वादक की तरह आगे चले और पीछे-पीछे ढेरों नौजवान नागरिक आ गए।
पहली मांग उठी केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफ़े की। वही मंत्री, जो एक भ्रष्ट, सड़ रहे रहे मंत्रालय के मुखिया हैं, जिसकी निगेहबानी में आए दिन अलग-अलग इम्तिहानों के परचे लीक हो जा रहे हैं।
विपक्षी दलों के अनुसार, साल 2014 से अब तक लगभग 152 बार पेपर लीक हुए हैं। इन पेपर लीक ने उन लाखों युवाओं का जीवन बर्बाद किया है, जिन्होंने इन परीक्षाओं की तैयारी में कई साल लगाए।
इनमें से कुछ के माता-पिता को बच्चों की पढ़ाई और परीक्षा में बैठने की फ़ीस- जो एक तरह की क़ानूनी वसूली है, भरने के लिए अपनी ज़मीन या घर तक बेचना पड़ा।
इसी साल मई में मेडिकल कोर्स में प्रवेश के लिए होने वाली में नेशनल एलिजिबिलिटी कम एंट्रेंस परीक्षा (नीट) का पेपर लीक होने के बाद निराश हुए कम से कम 12 विद्यार्थियों के ख़ुदकुशी करने की ख़बर सामने आई है।
जब ‘कॉकरोचों’ का गुस्सा ऑनलाइन सुनामी में तब्दील हो रहा था, तभी दीपके ने स्वदेश वापसी की सोची। 6 जून को दिल्ली के एयरपोर्ट से वो इस शहर की मशहूर प्रतिरोध स्थली- जंतर-मंतर पहुंचे। जाने-माने एक्टिविस्ट और लद्दाख के शिक्षा सुधारक सोनम वांगचुक भी उनके समर्थन में आगे आए और अनिश्चितकालीन अनशन पर बैठ गए।
इसी के साथ भाकपा (माले) की छात्र इकाई- ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (आइसा) के छह विद्यार्थियों- नेहा बोरा, मनीष कुमार, आमीन अमितोश, दानिश अली, ऋषिकेश और दीपक ने भी अनशन का ऐलान किया और सोनम के पास में ही एक कोने में बैठ गए।
इस बीच दूसरे शहरों में भी विरोध-प्रदर्शन शुरू हो गए। जैसे-जैसे अनशन पर बैठे लोगों की हालत गंभीर होती गई, इंटरनेट पर छाए हुए युवा सचमुच जंतर-मंतर पर पहुंचने लगे।
इसी बीच कॉकरोच जनता पार्टी ने घोषणा की कि वे सब 20 जुलाई, संसद का मानसून सत्र शुरू होने से ठीक एक दिन पहले, संसद की तरफ मार्च करेंगे। लेकिन इस मार्च से दो दिन पहले, 18 जुलाई की सुबह दिल्ली पुलिस ने मंच से सोनम को जबरन उठा लिया और वो पहले एक सरकारी अस्पताल में, बाद में उनकी पत्नी के आग्रह पर एनसीआर के एक निजी अस्पताल में हिरासत में क़ैद कर दिए गए।
उनका अनशन 23 जुलाई की देर रात ख़त्म हुआ है। इससे पहले 20 जुलाई को मार्च से पहले आइसा के छात्रों ने अपना उपवास तोड़ दिया।
इसके बाद पूरे शहर में ‘कॉकरोच’ छा गए। वे ट्रेन, बस, फ्लाइट, मेट्रो हर साधन से आ रहे थे, हर घंटे उनकी संख्या बढ़ती ही जा रही थी।
दिल्ली के आसमान को सूरज की पहली किरन ने छुआ भी नहीं था, और जंतर-मंतर पर सिर्फ वही थे- हज़ारों हज़ार। सूरज निकलते-निकलते यह साफ़ हो गया था कि हताशा और गुस्से भरी यह पीढ़ी, जिसने अपनी आंखों के सामने अपना भविष्य ख़त्म होते देखा है, अब वो सब वापस लेने जा रही थी जो उनके मां-पिता, दादा-दादी की पीढ़ियों ने गंवाया था- एक समाज और देश के तौर पर हमारी गरिमा। एक लोकतांत्रिक देश के नागरिक के बतौर हमारे अधिकार।
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मज़ाक मज़ाक में सालों का डर ख़त्म किया
प्रदर्शनकारियों ने अपनी बेमिसाल हिम्मत और शाइस्तगी से उस ज़हरीले डर को दूर कर डाला, जो इतने सालों में हम सबकी आदत में शुमार हो गया था।
दिलचस्प यह भी है कि उन्होंने ऐसा मज़ाक ही में ऐसा कर दिखाया है। दिन ढलने तक यह बात तो साफ़ हो चली थी कि अब यह आंदोलन उन सब बातों से कहीं बड़ा हो चुका था, जिनकी मांग प्रदर्शन की अगुवाई कर रहे नेता कर रहे थे। धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफ़ा अब छोटी बात है, अब बहुत कुछ दांव पर है।
पूरी शासन व्यवस्था में ऊपर से नीचे तक फैली सड़ांध साफ़ नज़र आ रही है और इससे किसी सड़ते मुर्दे जैसी बू आ रही है। यहां आए कुछ बेहद छोटे ‘कॉकरोचों’, जो महज़ सात या आठ साल के रहे होंगे, को भी अब यह साफ़ समझ में आने लगा है।
इस मार्च से ठीक पहले ही शहर के पुलिस प्रमुख तेज़ी से और लगभग गुपचुप तरीके से बदले गए थे, और हमारे डरावने केंद्रीय गृह मंत्री की ख़तरनाक काबिलियत को लेकर भी लोगों में दबी चिंताएं थीं; बावजूद इसके पुलिस और गृह मंत्रालय दोनों ही 20 जुलाई को दिल्ली पहुंचे उस जनसैलाब के पैमाने का सही अंदाज़ा नहीं लगा पाए।
उन्होंने हरसंभव कोशिश की- बसें, सड़कें और मेट्रो स्टेशन बंद कर दिए मगर कोई फायदा नहीं हुआ।
उन्होंने इंटरनेट बंद करने की भी कोशिश की, पर इंटरनेट पर ही पले-बढ़े युवाओं ने मीम्स और वीडियो की बाढ़ लाते हुए उस कोशिश को भी नाकाम कर दिया- ऐसे मीम्स और वीडियो जो आपको एक ही साथ हंसाते भी हैं और रुलाते भी।
सुरक्षा के लिहाज़ से दिल्ली की छवि किसी से छिपी नहीं है, मगर इस प्रदर्शन में शामिल हुई युवा महिलाएं कह रही हैं कि उन्हें भीड़ में भी सुरक्षित महसूस हुआ- हालांकि कुछ ने पुलिस द्वारा ग़लत तरह से छुए जाने की बात कही।
हमने मुसलमानों, हिंदुओं, ईसाइयों, सिखों, बौद्धों के साथ ही हर जाति, हर वर्ग के लोगों को साथ आते, एक-दूसरे की मदद करते और पुलिस के सामने एक-दूसरे को बचाते देखा।
किसी तरह के उपदेश या लंबे भाषण देने की बजाय उन्होंने हमें हमारे सपनों के खूबसूरत भारत की झलक दिखाई, और उसे साकार कर दिखाया।
इस ख़तरे से निपटने के लिए पुलिस ने अपने पीले बैरिकेड वेल्डिंग करवाकर एक साथ जोड़े, और अपना अब तक का आज़माया हुआ पैंतरा इस्तेमाल किया यानी पत्थरों से भरा ट्रक लाकर विरोध स्थल के पास खड़ा किया गया, पहले से टूटी-फूटी गाड़ियां लाई गईं, इस उम्मीद में कि बाद में ऐसा दिखाया जा सके कि युवा हिंसक हो गए और पुलिस ने जो कार्रवाई की, वो आत्मरक्षा में की।
वे सादे कपड़ों वाले गुंडों की सेना लेकर आए, जिनके हाथों में लाठी-डंडे थे। कार्रवाई की तैयारी में रैपिड एक्शन फोर्स (आरएएफ) के कर्मियों ने अपनी वर्दी से अपने नाम हटा दिए।
वफादार गोदी टीवी चैनल झूठ परोसने को मुस्तैद हो गए। कुछ तो इतने ‘त्रिकालदर्शी’ थे कि ऐसी बातों की भी ख़बरें बना दीं, जो हुई ही नहीं थीं। भारत में समाचार भविष्य के बारे में होते हैं, वर्तमान के नहीं। पर कुछ काम नहीं आया।
पुलिस और आरएएफ ने लाठियां भांजीं, कई बच्चों के सिर फोड़ दिए, तो कई के हाथ-पांव। उन्होंने आंसू गैस बरसाई। पर युवा आगे बढ़ते रहे, सीधे संसद की तरफ, वहीं जहां जाने को उन्होंने कहा।
जैसे-जैसे वो बढ़ रहे थे, सुरक्षाकर्मियों ने अपनी जगह संभाल ली, उनकी एके47 के निशाने पर निहत्थे विद्यार्थी थे। फिर भी ‘कॉकरोच’ चलते जा रहे थे। और जब वो ऐसा कर रहे थे, उन्होंने उस परदे को उघाड़ दिया, जिसके पीछे यह सरकार अपनी निर्ममता छिपाए रहती है; वो सत्ता जो कठोर और क्रूर है।
एक फासीवादी सरकार। ऐसे निर्दयी, निष्ठुर लोगों का मेल, जो जिस देश पर वो शासन कर रहे हैं, उसके इतिहास और विविधता को समझने की क्षमता ही नहीं है। ऐसे लोग जो केवल नफ़रत करना जानते हैं, उन्हें मालूम भी नहीं प्रेम क्या है, और न ये पता है कि सोचना क्या होता है।
जब यह प्रदर्शनकारी संसद की तरफ बढ़ रहे थे, हमारे साहसी, शेख़ीखोर प्रधानमंत्री को वहां से निकाल लिया गया। सांसदों को संसद की उस नई, चमचमाती इमारत को छोड़ने से रोक दिया गया, जिसका इरादा ही नित नए रूप में संविधान की जड़ खोदना लगता है।
शाम तक पुलिस ने प्रदर्शन स्थल का मुख्य स्टेज तोड़ डाला। हालांकि रात होते-होते पाश की घास की तरह कॉकरोच वहां उग आए। जब पुलिस अपना काम निबटाकर उस रात जा रही थी, तो इन कॉकरोचों ने ‘स्टैंडिंग ओवेशन’ दिया। बच्चों को पीटने के लिए। वाह मोदीजी वाह!
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बदलाव की उम्मीद और शंकाएं
इससे किसी बड़े राजनीतिक बदलाव की उम्मीद करना नासमझी होगी, मगर इसे क्षणिक आवेश मानकर ख़ारिज करना भी बेवकूफ़ी होगी। इस बात में भी कोई हैरानी नहीं होनी चाहिए कि न्यूज़ चैनल और मीडिया पर विदेशी फंडिंग और सीआईए या बाहरी साज़िशों की अटकलें, कॉन्सपिरेसी थ्योरी की चर्चाएं हो रही हैं।
ख़ुद पर नाज़ करने वाले एक पुराने आंदोलनजीवी के तौर पर मैं स्वीकार करती हूं कि इस आंदोलन की शुरुआत में मैं एहतियात बरत रही थी, चौकन्नी थी। मुझे चिंता थी कि कहीं हम एक और अन्ना आंदोलन की तरफ तो नहीं जा रहे हैं- 2011 का वही तथाकथित भ्रष्टाचार विरोधी जनांदोलन, जिसकी शुरुआती मंशा चाहे जो रही हो, लेकिन अंत में उसने हमें एक ऐसे राजनीतिक दल की सरकार दी, जिसने देश की हर संस्था को बर्बाद कर दिया; ऐसी पार्टी जो खुद में और भारत सरकार में अंतर नहीं मानती है; ऐसी पार्टी जो न तो देश की इज़्ज़त करती है और न ही इसके नागरिकों की; ऐसी पार्टी जिसने हमें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तो शर्मिंदा किया ही है, भारत को गर्त में लाकर फेंक दिया है।
लेकिन कॉकरोच जनता पार्टी को लेकर मेरा संदेह तब मिटा जब मैंने मुख्यधारा के मीडिया में उसके प्रति कड़वाहट और बैर का भाव देखा। मेरे लिए यह भरोसे का संकेत था। मुझे ख़ुशी हुई कि अभिजीत दीपके दलित समुदाय से ताल्लुक रखते हैं, इससे ज़्यादा ख़ुशी इस बात की थी कि इस बात पर किसी का फोकस ही नहीं था।
और फिर मेरे लिए सब तब बदला जब मैंने उन्हें कहते हुए सुना, ‘अगर मैं ख़ालिद होता या मुसलमान होता तो मैं जेल में होता।’
उनमें भारत के इस बदसूरत सच को कहने की हिम्मत थी- यह मानने की कि हमारे देश में सब कुछ (यहां तक कि क़ानून भी) सबके लिए एक समान नहीं हैं। सब कुछ पूरी तरह से आपके धर्म, जाति, वर्ग, नस्ल और लिंग पर निर्भर करता है। यह बेहद गहरी बात थी, जिसे सरलता के साथ बस कह दिया गया।
उनके इस बात को ऐसे समय में सार्वजनिक तौर पर कथन ने मुझे फ़ौरन जंतर-मंतर जाने पर मजबूर कर दिया, जब विपक्षी दलों के नेता भी ‘हिंदू प्रतिक्रिया’ के डर से ‘मुसलमान’ शब्द के बजाय ‘अल्पसंख्यक समुदाय’ बोलते हैं।
मुझे यह भी मालूम है कि जब दीपके ने ख़ालिद कहा तो उनका इशारा जेनएयू के स्कॉलर उमर ख़ालिद की तरफ था, जो शरजील इमाम और बाकी कइयों की तरह बिना सुनवाई के बीते क़रीब छह सालों से जेल में हैं।
अब पूछिए उमर का जुर्म क्या है? नागरिकता संशोधन कानून के ख़िलाफ़ साल 2020 के विरोध प्रदर्शनों के दौरान प्रदर्शनकारियों से शांति बनाए रखने की अपील करना, वो भी ऐसे वक़्त में जब दिल्ली आगजनी, हत्या और मस्जिदें जलाने की भयावह घटनाओं से दहल रही थी।
इन घटनाओं को पुलिस की निगरानी में हिंदू उपद्रवी गुंडों ने अंजाम दिया था। वही पुलिस, जो कभी ऐसी घटनाओं की मूकदर्शक बनी रही तो कभी ख़ुद इसमें शामिल दिखी। उमर की ज़मानत की एक के बाद अर्ज़ी उन जजों ने खारिज कर दीं, जिनमें शायद अब सही काम करने या सही बात को समझ लेने का साहस ही नहीं बचा है।
कॉकरोच जैसे-जैसे आगे बढ़ रहे थे और उनकी संख्या भी बढ़ रही थी, मैं सोचने लगी: शुक्र है कि इनमें से ज़्यादातर मुस्लिम, सिख, ईसाई या आदिवासी नहीं हैं। वरना उन्हें कुचल दिया जाता, मारा जाता, गोली मार दी जाती या जेल में डाल दिया जाता। शुक्र है कि वे कश्मीरी नहीं हैं, वरना उनकी आंखें भी जा सकती थीं (हालांकि 20 जुलाई के प्रदर्शन के बाद कुछ लोगों को पैलेट गन जैसे हथियार से आनेवाली चोट जैसी चोटें ज़रूर लगी हैं) शुक्र है कि इनमें से ज़्यादातर हिंदू हैं।
भारत के लिए यह समय कितना दुखद है, यह इसी बात से ज़ाहिर होता है। हालांकि हालात एक पल में बदल सकते हैं। ऐसी खबरें आ रही हैं कि दूसरे राज्यों से हज़ारों अर्धसैनिक बलों के कर्मी लाए जा रहे हैं। हम नहीं जानते कि आने वाला वक़्त हमें क्या दिखाएगा।
इस आंदोलन के बारे में भ्रम और यथार्थ
तो इन सबका नतीजा क्या है? अन्ना आंदोलनल को कॉरपोरेट मीडिया में तब्दील हो चले सैकड़ों टीवी चैनलों पर हफ़्तों तक लगातार चौबीसों घंटे कवरेज मिली थी, उसके उलट ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ को अपने अलावा बस इंटरनेट का ही सहारा है।
अन्ना आंदोलन को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने घुसपैठ कर हथिया लिया था और मोदी की अगुवाई वाली बीजेपी टीवी चैनलों द्वारा तैयार किए गए उस माहौल का चुनावी फ़ायदा उठाने को पूरी तरह तैयार खड़ी थी; इसके बरक्स ‘कॉकरोचों’ के मामले में कोई संगठित विपक्षी दल इस तरह के इंतज़ार में नहीं है, जो इसे इतना आगे तक ले जाने का सोचे।
अगर कोई असली राजनीतिक काम शुरू नहीं होता, तो जो आक्रोश हम आज अचानक देख रहे हैं, वह गुम हो जाएगा। जब तक बड़े नेता और विपक्षी दल अपनी सियासी खींचतान और छोटी-मोटी लड़ाइयां दरकिनार कर एकजुटता नहीं दिखाते।
सरकार भी यह जानती है कि ऐसा होने की संभावना कम है। वह बेफिक्र है क्योंकि उसे लगता है कि उसे बस इंतज़ार करना है। सत्ता के पास प्रतीक्षा करने की ताकत होती है, लोगों के पास नहीं।
यह भी गौरतलब है कि कॉकरोचों की यह बग़ावत इस समय भारत भर में हो रहे कई विरोध प्रदर्शनों में से एक है। मध्य प्रदेश में आदिवासी समुदायों के लोग केन-बेतवा नदी-जोड़ो परियोजना का विरोध कर रहे हैं। उत्तराखंड में ग्रामीण बड़े पैमाने पर पेड़ काटे जाने के विरोध में हैं।
ग्रेट निकोबार द्वीप समूह के पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने का भी प्रतिरोध हो रहा है। मणिपुर तीन सालों से हिंसा की आग में झुलस रहा है।
नौकरियां नहीं हैं, महंगाई आसमान छू रही हैं। गुस्सा पनप रहा है। और बीजेपी-आरएसएस का ‘भगवान’ के नाम वाला खेल वही धोखा साबित हो रहा है, जो असल में वो था। गैंगस्टरों द्वारा चलाया जा रहा मुनाफ़े का धंधा। अयोध्या में राम मंदिर के नाम पर हुई लूट बॉलीवुड की किसी ख़राब स्क्रिप्ट सरीखी है, जो अब जनता की नज़रों के सामने आ चुकी है- शातिर धर्मगुरु और भ्रष्ट नेता मिलकर गरीब, भोली-भली जनता की आस्था पर फल-फूल रहे हैं- वे मिलकर होटल बना रहे हैं, रियल एस्टेट और तरह-तरह की संपत्तियां समेट रहे हैं, बड़ी, चमचमाती कारों में घूम रहे हैं।
इस भ्रष्टाचार और दिन-दहाड़े हो रही लूट का कनेक्शन यहीं सीमित नहीं हैं, इसके तार शीर्ष तक जा रहे हैं।
क्या कॉकरोच भारत को गर्त से निकाल सकते हैं?
क्या ये कॉकरोच मिलकर हमें इस गर्त से निकाल सकते हैं? आसान नहीं होगा। भारत में अब तक हुए जन आंदोलनों के नतीजे उत्साहजनक नहीं रहे हैं। अगर इन्हें टूटे हुए सपनों और महत्वाकांक्षाओं का संक्षिप्त इतिहास कहें, तो ज़्यादा बेहतर होगा।
साठ और सत्तर के दशक में कई आंदोलनों में नक्सलियों का हथियारबंद विद्रोह भी शामिल था, उसने संपत्ति के पुनर्वितरण और खेती करने वाले को ही ज़मीन दिए जाने का अधिकार सुनिश्चित करने की मांग की थी। उन्हें कुचल दिया गया।
अस्सी-नब्बे के दशक में सामाजिक आंदोलनों, जिनमें सबसे चर्चित ‘नर्मदा बचाओ आंदोलन’ था और बाद में आंध्र प्रदेश, छत्तीसगढ़ और झारखंड में माओवादी आंदोलन ने किसानों और आदिवासी समुदायों को उनकी ज़मीन से बेदखल किए जाने के ख़िलाफ़ लड़ाई लड़ी। वे बस यही चाहते थे कि ग़रीबों के पास अब जो कुछ बचा है, उसे न छीना जाए, मगर उन्हें भी कुचल दिया गया।
2000 का दशक तक आते-आते उम्मीदें बस ‘राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी अधिनियम’ (नरेगा) तक ही सिमटकर रह गईं। इसमें कम से कम एक निश्चित मज़दूरी, जितने में शायद शहर के किसी महंगे रेस्तरां में एक वक़्त का खाना मिल सकता है, पर तीन महीने के रोज़गार का अधिकार मिलता था।
पर अब तो मौजूदा सरकार इसे भी ठंडे बस्ते में डालकर इसकी जगह बस गुज़ारे लायक राशन- जो मोदीजी की तस्वीर वाले थैलों में आता है- देने लगी है। ये थैले उन लोगों को ऐसे तिरस्कार से फेंककर दिए जाते हैं, जैसे चलती गाड़ियों से भिखारियों को ख़ैरात दी जाती है- ताकि बदले में उनका वोट मिल सके और वो इसके एहसानमंद भी रहें।
पर जिस हिसाब से देश की अर्थव्यवस्था लड़खड़ा रही है, इसका भविष्य भी ख़तरे में है।
अब साल 2026 है और हालात यहां तक आ गए हैं कि हम नागरिकों को अपने वोट देने के अधिकार और अपनी नागरिकता के लिए लड़ना पड़ रहा है।
नागरिकता संशोधन क़ानून (सीएए) और राष्ट्रीय नागरिक पंजी (एनआरसी) का मेल नाज़ी जर्मनी के 1935 के न्यूरेमबर्ग कानूनों का ‘हिंदू राष्ट्र’ वाला वर्ज़न है।
हिटलर के शासन के उन क़ानूनों के तहत जर्मन नागरिकों को उनके ‘लिगेसी पेपर्स’ (विरासत संबंधी कागज़ों) के आधार पर नागरिकता दी जाती थी। (आज की तारीख़ में भी ढूंढने निकलें तो भारत की कितनी आबादी के पास ऐसे दस्तावेज़ होंगे?)
सीएए-एनआरसी के ख़िलाफ़ आंदोलन तब धीमा पड़ा, जब बड़े पैमाने पर प्रदर्शनकारियों की मौत हुईं; कार्यकर्ता जेलों में ठूंसे गए। मगर एक बात यह ज़रूर हुई कि इन विरोध प्रदर्शनों की वजह से सरकार को इन नए क़ानूनों को अमल में लाने की रफ़्तार धीमी करनी पड़ी।
लेकिन अब यही सीएए-एनआरसी, जिसके बारे में बहुत से लोगों ने बिल्कुल सही अंदाज़ा लगाया था कि इसका इरादा मुख्य रूप से देश के मुसलमानों को निशाना बनाना था- वोटर लिस्ट के स्पेशल इंटेंसिव रिविज़न यानी एसआईआर की शक्ल में वापस आ गया है। कोई भी अधिकारी यूं ही आकर बता जाता है कि हमारा पासपोर्ट भी नागरिकता का सबूत नहीं हैं।
लाखों लोगों के नाम मतदाता सूचियों से हटाए जा रहे हैं। पूरा देश हड़बड़ाते हुए ‘लेगेसी पेपर्स’ तलाश रहा है। हम नहीं जानते कि हम क्या हैं- क्या हम वैध नागरिक हैं? या अवैध?
क्या हमारे पास कोई अधिकार हैं? हम सबमें से कौन उन बड़े-बड़े डिटेंशन केंद्रों में ले जाया जाएगा जो सरकारों द्वारा ‘संदिग्ध नागरिकों’ के लिए बनाए जा रहे हैं?
क्या हम इस ट्रिब्यूनल से उस ट्रिब्यूनल के बीच दौड़ते हुए ज़िंदगी गुज़ार देंगे? फासीवादियों को ऐसी अफरातफरी और भ्रम प्रिय होता है।
(द वॉयर में 24 जुलाई को छपे लेख को साभार यहां प्रकाशित किया जा रहा है।)
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