जंतर मंतर प्रोटेस्टः वो माहिर जेन ज़ी प्रदर्शनकारी जिन्होंने आंदोलन के तौर तरीक़े बदल दिए

जंतर मंतर प्रोटेस्टः वो माहिर जेन ज़ी प्रदर्शनकारी जिन्होंने आंदोलन के तौर तरीक़े बदल दिए

प्रोफ़ेसर सरोज गिरी

यह सवाल अब लगातार सामने खड़ा है और इससे बचना मुश्किल होता जा रहा है। क्या यह सचमुच मेहनतकश तबका है, या फिर शहर का वही बेलगाम और हाशिये पर धकेला गया तबका, जिसे अक्सर ‘फेरल अंडरक्लास’ कहा जाता है, जिसने आंदोलन की कमान अपने हाथ में ले ली और धरना स्थल पर ताकत और नियंत्रण हासिल कर लिया?

(फेरल अंडरक्लास- समाज से अलग-थलग, लंबे समय से बेरोज़गार या आबादी का वह वर्ग जो समाज के हाशिए पर है और जिसमें असामाजिक तत्व भी हो सकते हैं)

क्या लंबे सामाजिक-राजनीतिक इतिहास वाले, पढ़े-लिखे तबके के प्रदर्शनकारी अब जल्दी ही इस आंदोलन को समेटने की कोशिश करेंगे और आख़िरकार उन्हीं ताकतों के साथ खड़े हो जाएंगे, जिन पर 20 जुलाई की पुलिस बर्बरता का इल्ज़ाम है?

मैंने पहले कहा था कि यह लार्वा धीरे-धीरे बदल रहा है और कुछ नया जन्म ले रहा है। 20 जुलाई की रात जैसे अब तक ख़त्म ही नहीं हुई।

22 जुलाई की रात तक आते-आते यह फ़र्क़ इतना साफ़ हो चुका है कि कोई भी उसे देख सकता है। दो अलग-अलग दुनिया बन रही हैं, हालांकि अभी तक वे एक-दूसरे से गहराई से जुड़ी हुई हैं। एक तरफ़ वही पुराना, जाना-पहचाना धरना। वही आंदोलन जिससे हम वाक़िफ़ हैं। और दूसरी तरफ़ अब “बकचोदी वाला आंदोलन”।

वे आधी मुस्कान के साथ कहते हैं, “यह कोई आंदोलन नहीं है, यह तो बकचोदी है।” वे खुलकर कहते हैं कि मोदी ने ग़लत लोगों से पंगा ले लिया है।

पढ़े-लिखे लोग चाहें तो इसे “शरारत वाला आंदोलन” कह लें, लेकिन यह शरारत लड़ाई को और तेज़ करती जाती है और उसे वहां तक ले जाने की कोशिश करती है, जहां जाकर किसी को भी नहीं पता कि मंज़िल क्या होगी।

ऐसे में हांगकांग के प्रदर्शनकारियों की बात याद आती है, जो कहा करते थे, “पानी की तरह बनो।” और यहां भी बिल्कुल वही हो रहा है।

एक हिस्सा भीतर है, दूसरा “पानी की तरह” बाहर है, जो सीधे पुलिस और बैरिकेड के सामने खड़ा है। एक तरफ़ वह आधिकारिक आंदोलन है, जिसकी अपनी विरासत है, अपना घोषणा-पत्र है। दूसरी तरफ़ वह है जो खुला हुआ है, हर पल बदल रहा है, तेज़ है और बेहद उग्र भी।

सबवे सर्फर

jantar mantar youth protest fearless girl

भीतर फ़ैज़ गाए जा रहे हैं या दिनकर की कविताएं पढ़ी जा रही हैं। बाहर सबवे सर्फ़र जैसे वीडियो गेम के ट्रैक बज रहे हैं। अगर चाहें तो भीतर अब भी वामपंथी छात्र समूहों में गूंजते पुराने इप्टा के गीत तलाश सकते हैं।

बाहर आपको जिम जाने वाले लड़के कुछ ज़्यादा ही नज़र आएंगे। अब वे पुलिस से भिड़कर ख़ुद को आज़माना चाहते हैं।

बाहर पुलिस के हमलों का सामना करना उनके लिए एक दिलचस्प चुनौती बन चुका है, जबकि भीतर बैठे लोग पुलिस हिंसा के ख़िलाफ़ अदालत में याचिका दायर करने की तैयारी कर रहे हैं।

बाहर सरकार के ख़िलाफ़ सबसे तीखे और कड़े गाली-गलौज वाले अल्फ़ाज़ इस्तेमाल हो रहे हैं, जबकि भीतर वही पुराने, सलीकेदार लोग अब भी नपी-तुली तंज़भरी ज़बान में बात कर रहे हैं।

बाहर ऐसा नारा ढूंढ़ना मुश्किल है जिसे राजनीतिक तौर पर ग़लत न कहा जाए। लेकिन यहां लोग यह जाने बिना बोल रहे हैं कि राजनीतिक तौर पर सही क्या है।

इसलिए इसे सीधे-सीधे ‘राजनीतिक रूप से ग़लत’ भी नहीं कहा जा सकता। यहीं आकर पढ़े-लिखे तबके की बनाई हुई समझ और श्रेणियां कम पड़ जाती हैं।

फिर भी जिस अंदाज़ में यह सब सामने आता है, वह बेहद माहिराना, साफ़ और बहता हुआ है। साफ़ दिखता है कि ये लोग इसका मज़ा भी ले रहे हैं। अब खाना “मोदी की तेरहवीं” के नाम पर बांटा जा रहा है। खाना खाना अब सिर्फ़ खाना नहीं रह गया, बल्कि आंदोलन का हिस्सा बन गया है।

एक और शोरगुल से भरा लड़कों का झुंड अपना तमाशा दिखा रहा है। आंसू गैस के गोले अब डर की चीज़ नहीं रहे। वे क्रिकेट में बैटिंग करने की गेंद बन गए हैं। उनके इस खेल पर चारों तरफ़ खड़े उतने ही जोशीले लोग ज़ोरदार तालियां बजा रहे हैं।

इसी बीच भीड़ लगातार बैरिकेड पर दबाव बना रही है, जिसका नतीजा रात में लाठीचार्ज और आंसू गैस के गोले छोड़ने के रूप में सामने आता है।

मुझे बताया गया कि मुंबई में प्रदर्शनकारियों ने नॉर्वे की फ़ुटबॉल टीम के रोइंग चैंट को नया रूप देकर “रिज़ाइन, रिज़ाइन” का नारा बना दिया है। सोशल मीडिया पर उसे कैप्शन दिया गया है, “वाइकिंग रो, लेकिन उसे इंक़लाबी बना दो।” और एक बार फिर वह वायरल हो जाता है।

अब उस पुराने, औपचारिक धरना स्थल तक पहुंचने के लिए पुलिस को इन्हीं माहिर प्रदर्शनकारियों के बीच से होकर गुज़रना पड़ता है, जो सबवे सर्फ़र की धुन पर पुलिस से भिड़ने को उतावले दिखाई देते हैं।

संसद मार्ग पर पुलिस पूरी सुरक्षा किट, हेलमेट और डंडों के साथ खड़ी है, जबकि प्रदर्शनकारी सामने बैठकर सिर्फ़ उसकी आंखों में आंखें डालकर देख रहे हैं।

इसी बीच एक मज़ेदार लम्हा आता है। एक प्रदर्शनकारी उठता है और हाथ वाला पंखा पुलिस की तरफ़ हिलाने लगता है, जैसे गर्मी में उन्हें ठंडी हवा भेजकर कोई मेहरबानी कर रहा हो। भीड़ ज़ोरदार तालियों और नारों से उसका साथ देती है।

पानी की तरह बहने वाले माहिर लोग

boy hold poster at jantar mantar display

“जय भीम” सबसे ज़्यादा सुनाई देने वाला नारा है और ज़्यादातर लड़ाई के ऐलान की तरह लगाया जाता है। लेकिन “जय संविधान” लगभग सुनाई नहीं देता। “भारत माता की जय” भी लोगों का पसंदीदा नारा है। सिर्फ़ तब, जब माहौल थोड़ा धीमा पड़ता है, “इंक़लाब ज़िंदाबाद” सुनाई देता है।

वहीं एक असली महात्मा गांधी की शक्ल में कोई शख़्स भी घूम रहा है, जो लोगों से बातें करता रहता है।

आपमें से जो पढ़े-लिखे लोग किसी भारी-भरकम वैचारिक जुमले की तलाश में हैं, वे चाहें तो इन लोगों को फ़्रांत्ज़ फ़ैनॉन का ‘लुम्पेन सर्वहारा’ कह सकते हैं।

शायद आप उन्हें इस ख़ाने में भी बंद करना चाहेंगे कि यही वे लोग हैं जिन्होंने मोदी को सत्ता तक पहुंचाया। लेकिन मैं इन्हें सिर्फ़ इतना कहना पसंद करूंगा कि ये बेहद माहिर लोग हैं। पानी की तरह बहने वाले। पुलिस को चकमा देने में उस्ताद। उन पुराने, सलीकेदार और विरासत वाले लोगों से बिल्कुल अलग।

सबसे दिलचस्प सवाल यह है कि भीतर के धरना स्थल और मुख्य मंच के आसपास उमड़ी भारी भीड़ को संभाल कौन रहा है। जवाब फिर वही है। यही गुमनाम मगर माहिर लोग।

हमेशा की तरह नाम और पहचान वाले लोग मंच से बोल रहे हैं, जबकि असली काम करने वाली मधुमक्खियां ज़मीन पर कमाल कर रही हैं। नगर निगम ने कूड़ा उठाना बंद कर दिया है, जिससे सरकार के ख़िलाफ़ ग़ुस्सा और बढ़ रहा है।

ज़ोमैटो और स्विगी के ज़रिए लगातार पैक किया हुआ खाना और पानी पहुंच रहा है, लेकिन उसके साथ खाली प्लास्टिक की बोतलें, डिब्बे और गत्ते का कचरा भी ढेर होता जा रहा है।

इसी माहौल की अगली कड़ी में अब कोचिंग संस्थानों के शिक्षक आंसू गैस के गोलों से कैसे निपटा जाए, इस पर भौतिकी की मदद से समझा रहे हैं। अगर चाहें तो इसे नीट पेपर लीक और धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफ़े की मांग से जुड़ी शुरुआती वजह का नया रिश्ता भी कह सकते हैं।

कोचिंग संस्थानों का इस तरह माहिर विरोध की पाठशाला बन जाना। यह ऐसा मेल है जिसकी आम तौर पर कल्पना भी नहीं की जाती।

प्रदर्शन में मज़दूर आंदोलनों की झलक

girl hold poster of dharmendra pradhan at jantar mantar

अब सवाल यह है कि क्या ये माहिर प्रदर्शनकारी अपनी अलग अगुवाई खड़ी कर पाएंगे, या फिर लंबे इतिहास और पहचान वाले प्रदर्शनकारी आख़िरकार इन्हें भी मायूस कर देंगे?

इनके विरोध के तौर-तरीकों में नोएडा के मज़दूर दंगों और पानीपत व सिंगरौली की तेल रिफ़ाइनरियों में हुए मज़दूर आंदोलनों से काफ़ी समानता दिखाई देती है, ख़ास तौर पर सोशल मीडिया के बेहद अलग और सीमित लेकिन असरदार इस्तेमाल में।

याद कीजिए। शाहीन बाग़ के सीएए विरोधी आंदोलन का मंच उन दोनों धाराओं का मेल था। विरासत वाले और ये माहिर लोग।

हालांकि वहां पहली धारा का दबदबा ज़्यादा था। लेकिन जामिया में पुलिस कार्रवाई झेलने वाले मेहनतकश लोग आज संसद मार्ग पर उसी तजुर्बे को अपने जिस्म और अपनी यादों के साथ बयान कर रहे हैं। वे शाहीन बाग़ की वह कहानी नहीं सुना रहे जो नागरिक समाज या एक्टिविस्ट सुनाते हैं।

वे अपने शरीर से गुज़रे उस अनुभव को याद कर रहे हैं और उसे आज की लड़ाई से जोड़ रहे हैं।

यह बेलगाम और हाशिये का माहिर तबका साफ़ तौर पर साहित्य और कला से उधार लिए गए प्रतीकों, रूपकों और किरदारों को पसंद नहीं करता। वह तस्वीरों और संगीत से खेलता है। उसका सबसे पसंदीदा ज़रिया मीम है, नकल है, किसी चीज़ की हूबहू नयी शक्ल बनाना है, लेकिन उसमें अपना रंग भर देना है।

“मोदी की तेरहवीं” इसका बेहतरीन उदाहरण है। ठीक वैसे ही जैसे मोदी और मेलोनी की मुलाक़ात पर उन्होंने अनगिनत नए रूप तैयार किए।

यही आज की दास्तान है।

बेंजामिन कहा करते थे कि पुराने समाज और दस्तकारी की दुनिया में लोककथा की बड़ी अहम भूमिका होती थी।

कारीगरों के दौर की कहानी और दास्तान अपने इलाक़े के लोगों, वहां की चीज़ों और रोज़मर्रा की ज़िंदगी से गहराई से जुड़ी होती थी। उस कहानी का असली लुत्फ़ उठाने के लिए स्थानीय ज़िंदगी और उसकी समझ होना ज़रूरी था।

आज के दौर में मीम और स्लैम उसी पुरानी लोककथा की नई शक्ल हैं। उसी चीज़ को पलट दो, उसे नया मतलब दे दो।

अब कल्पना या किसी आदर्श दुनिया के ख़्वाब पर काम नहीं होता।

काम उसी पर होता है जो आपके चारों तरफ़ मौजूद है। ऐसी कहानी, जिसका मतलब तभी बनता है जब उसे ख़ास लोगों, जगहों, चीज़ों और घटनाओं के संदर्भ में समझा जाए।

यह लेख सब्सटैक में 23 जुलाई को प्रकाशित हुआ था और साभार यहां प्रकाशित किया जा रहा है.

(सरोज गिरी दिल्ली यूनिनवर्सिटी में पॉलिटिक्स पढ़ाते हैं।)

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