जंतर मंतर प्रोटेस्टः मंच से दूर बैरिकेड के पास, छात्रों का रवैया कैसे बदला दिखा?

जंतर मंतर प्रोटेस्टः मंच से दूर बैरिकेड के पास, छात्रों का रवैया कैसे बदला दिखा?

By प्रोफ़ेसर सरोज गिरी

अभी-अभी खबर आई है कि शिक्षा मंत्री ने इस्तीफा दे दिया है। आखिर इस प्रदर्शन में ऐसी कौन-सी ताकत है जिसने सरकार को झुकने पर मजबूर कर दिया?

हमने पहले कहा था कि सीजेपी अपनी मध्यवर्गीय विचारधारा के बावजूद खुद उस ‘फेरल अंडरक्लास’ की पीठ पर सवार था, जिसने पूरे आंदोलन में जान फूंकी।

(फेरल अंडरक्लास- समाज से अलग-थलग, लंबे समय से बेरोज़गार या आबादी का वह वर्ग जो समाज के हाशिए पर है और जिसमें असामाजिक तत्व भी हो सकते हैं)

जैसे-जैसे आप मुख्य मंच और जंतर-मंतर के आयोजन स्थल से दूर जाते हैं, प्रदर्शन का स्वभाव बदलता जाता है।

बैरिकेड के करीब पहुंचते-पहुंचते प्रदर्शनकारी एक तरह के अलगाव और उभार से गुजर रहे हैं।

मामला अब सर्वव्यापी रंग लेने लगा है।

दरअसल, प्रदर्शनकारियों का सबसे अहम हिस्सा चेतना की पांचवीं, छठी या शायद नौवीं अवस्था तक पहुंच चुका है और उसी में जी रहा है। कोई अजीब-सा उभार काम कर रहा है। उस ऊपरी स्तर पर उन्होंने तमाम दीवारें और पहचानें आपस में मिला दी हैं।

हिंदू-मुस्लिम एकता यहां बिना सांप्रदायिक सद्भाव की बात किए, बिना प्रेम और भाईचारे का उपदेश दिए हासिल होती दिख रही है। यहां “हिंदू-मुस्लिम एकता” का मतलब इन तीनों शब्दों को ही घोल देना है, ताकि हम किसी अनजानी दिशा की ओर खुल सकें।

फोमो (फ़ियर ऑफ़ मिसिंग आउट- किसी जानकारी से महरूम होने का डर) की ताकत को शायद ही कभी इतनी ऊंचाई पर देखा गया हो। सरहद के उस पार के दोस्त वायरल रीलों में कह रहे हैं कि वे प्रदर्शन की रीलें देखना बंद नहीं कर पा रहे और काश वे भी इसमें शामिल हो पाते।

ये भी पढ़ें-

यह कैसे संभव है? इन प्रदर्शनों की इस ताकत से क्या पता चलता है?

Sansad march at parliament street

सिख धर्मग्रंथों की वह कथा याद कीजिए जिसमें गुरु नानक कबीर और शायद पैगंबर मोहम्मद जैसे पूर्व गुरुओं से मिलते हैं। जिसे हम टाइम ट्रैवल कह सकते हैं, वह उभार के जरिए होती है। धर्मग्रंथ इसे “ज्योति का ज्योति में मिल जाना” कहते हैं।

आम तौर पर प्रदर्शन का मतलब होता है कि नागरिक सरकार से अपने अधिकार मांग रहे हैं, लेकिन यहां प्रदर्शन अभिव्यक्ति के बारे में है।

यह किसी कलाकार की रचनात्मक अभिव्यक्ति नहीं है, क्योंकि कलाकार भी प्रदर्शन कर रहा होता है, “रचनात्मक” बन रहा होता है, अपने विचार रख रहा होता है। वह उसके मन के भीतर की यात्रा होती है।

लेकिन यहां, इन प्रदर्शनों में, बात सामूहिक रूप से “हम कौन हैं” यह व्यक्त करने की है।

यहां प्रदर्शनकारी कह रहे हैं- हम सब कुछ हैं, तुम कुछ भी नहीं।

असल में यह बात सरकार की सत्ता को ही चुनौती देने तक पहुंच जाती है, यानी सरकार को गैर-वाजिब सत्ता की तरह देखा जा रहा है। हालांकि शुरुआत ऐसी नहीं थी।

शुरुआत में एक “सामान्य” प्रदर्शन था। हम तुमसे बात कर रहे हैं। हमने तुम पर भरोसा किया था और तुमने हमें धोखा दिया। तुम्हारे अपने स्वार्थ हैं। हम तुमसे बात कर रहे हैं। तुम्हें हमारी बात सुननी चाहिए क्योंकि हमने ही तुम्हें वहां बैठाया है। तुमने कानून तोड़ा है। तुमने संविधान तोड़ा है। तुमने उस भरोसे को तोड़ा है जो हमने तुम पर किया था।

ऐसा प्रदर्शन अब भी अंदर, मुख्य स्थल और मंच पर चल रहा है, जहां बड़े नेता आकर भाषण दे रहे हैं।

ये भी पढ़ें-

20 जुलाई के बाद चीजें बदल गईं

jantar mantar protest

 

शुरुआत में यह आंदोलन मुख्यतः पढ़े-लिखे तबकों के नेतृत्व में था, लेकिन अब इसमें ज्यादातर वही बेलगाम निम्नवर्ग दिख रहा है, जो सत्ता से सचमुच बात नहीं कर रहा, सरकार को संबोधित नहीं कर रहा, बल्कि बस यह ऐलान कर रहा है कि “हम यहां हैं।” “हम यहां हैं।” और हम यही हैं। तुम कुछ नहीं हो। हम सब कुछ हैं।

यह ऐसा ऐलान है जिसमें कोई ऐसी मांग नहीं है जिसे पूरा करके मामला खत्म किया जा सके।

सबसे अलग जो बात दिखाई देती है, वह यह है कि यहां किसी लेन-देन जैसी बात का, यहां तक कि न्याय की मांग जैसी बात का भी लगभग कोई जिक्र नहीं है। कोई कानूनी, संवैधानिक या ठोस आर्थिक मांग सामने नहीं रखी जा रही जिसे पूरा करके आंदोलन समाप्त किया जा सके।

अगर आप अब भी इस पुराने पड़ चुके प्रदर्शन-शब्द “मांग” का इस्तेमाल करना चाहें, तो वह शिक्षा मंत्री के इस्तीफे से आगे बढ़कर खुद मोदी के इस्तीफे तक पहुंच जाती है।

सरकार के सबसे ऊंचे प्रतिनिधियों को नीचे खींचा जा रहा है। हां, तुम वैध चुनावों के जरिए सत्ता में आए थे, लेकिन अब हम एक तरह का “वापस बुलाने का अधिकार” इस्तेमाल कर रहे हैं।

यहां हमें सबसे चरम मांग रखने की प्रवृत्ति दिखाई देती है। और क्योंकि उसका कोई स्पष्ट अंत संभव नहीं है, वह किसी अनजानी दिशा की ओर इशारा करती है, जो चिंता, डर और बेचैनी पैदा कर सकती है, लेकिन साथ ही उल्लास और दुस्साहस भी जगाती है।

उस अनजाने की “खाली जगह” को इस समय बेहिसाब शोरगुल वाली अभिव्यक्तियों, मीमों, हाथ-पैर हिलाने, नाचने और “मौज लेने” ने भर दिया है। प्रदर्शन जैसे मौज-मस्ती हो (“बकचोदी”)।

इस तरह “हम यही हैं”, “हम सब कुछ हैं” की अभिव्यक्ति अब एक ऐसी चरम वायरल और हवा में तैरती हुई, खुद को लगातार बढ़ाते रहने वाले भंवर में दाखिल हो चुकी है।

प्रदर्शनकारी पुलिस की बर्बरता से डरते हुए नहीं दिखते। लगता है वे शरीर की असुरक्षा वाली अवस्था से आगे निकल चुके हैं। वे जैसे नुकसान को खुद आमंत्रित करके डर को घोल देना चाहते हों।

पुलिस की ज्यादती पहले से मान ली गई है और किसी चमत्कार की तरह बेअसर कर दी गई है। असली पुलिस हिंसा तक को अब सिर्फ एक मीम की तरह बरता जा रहा है। राज्य की असली हिंसा अब केवल ऐसी तस्वीरों में बदल गई है जिन्हें एल्गोरिद्म को खिलाया जा सके।

एक पुलिसवाला प्रदर्शनकारियों पर हमला करने दौड़ता है। वीडियो में वह दृश्य अब आपको सिर्फ किसी सबवे सर्फर बीट की तरह याद रहता है।

ये भी देखें- 

“आओ मारो, आओ मारो”

youth protest INJURED

अब पुलिस की बर्बरता को सोशल मीडिया पोस्ट के अलावा किसी और रूप में देख पाना मुश्किल हो गया है। पुलिस कार्रवाई देखते समय अब आप सबवे सर्फर को न देखना, न सुनना मुश्किल पाते हैं।

हम सब उस प्रदर्शनकारी को जानते हैं जो पुलिस की लाठियों के सामने खड़े होकर चिल्ला रहा था, “आओ मारो, आओ मारो।”

एक विद्वान ने कहा कि वह इसे गांधीवादी सत्याग्रही की अहिंसा और कष्ट-सहन की मिसाल के रूप में समझना चाहता है। क्यों नहीं? लेकिन यहां “सत्य” की कोई भूमिका दिखाई नहीं देती, जब तक कि आज की दुनिया में मीमों की दुनिया को ही सत्य का स्थान न मान लिया जाए।

जो प्रदर्शनकारी कहता है कि उसका आंदोलन “बकचोदी के रूप में प्रदर्शन” है, वह सत्य जैसी गंभीर धारणाओं की ओर धकेले जाने पर खुद को अपमानित महसूस करेगा।

ज्यादा से ज्यादा हम इतना कह सकते हैं कि यह पोस्ट ट्रुथ वाले वैकल्पिक ब्रह्मांड के दौर का एक तरह का सत्याग्रह है, जहां भीतर की मंथन और पीड़ा के जरिए सत्य को पकड़ा जाता है। लेकिन यह कैसे संभव है?

राज्य की ताकत को जान-बूझकर “कुछ भी नहीं” और बेबस मानकर पढ़ा जा रहा है। राज्य की निगरानी तक को बेअसर माना जा रहा है।

हर वास्तविक चिंता से आजाद, अपने ऊपर आने वाले नुकसान के डर से परे, हमें “वास्तविक” शब्द को भी उद्धरण चिह्नों में रखना पड़ता है। “वास्तविक।” इसलिए जो चीज हमारे सामने आती है, वह प्रदर्शन का एक ऐसे स्थल में बदल जाना है जहां उभार, ऊर्ध्वगति, अल-मिराज घटित हो रही है।

यह निश्चित ही अमर्त्य सेन वाला “तर्क करने वाला भारतीय” नहीं है, जो अब भी मुख्य मंच और सभा-स्थल के भीतर दिखाई देता है।

सामूहिक उभार का ‘स्व’

youth protest at jantar mantar tricolour

कई मायनों में यह तर्क से परे है, संवाद से परे है। यह बोलने वाला स्व नहीं है। यह सामूहिक उभार में मौजूद स्व है। हालांकि इसे बीमार मानसिक अवस्था कहकर खारिज करना भी जरूरी नहीं है।

एक तरह से उन्होंने राज्य और उसकी सत्ता को सौंदर्य और एल्गोरिद्म की चीज बना दिया है। उसे घटाकर सिर्फ तस्वीरों और मीमों की सामग्री में बदल दिया है।

खुद मोदी को भी उठाकर नए अर्थों में इस्तेमाल किया गया है, जैसे एक ऐसी औरत के रूप में जो 56 इंच की ब्रा ढूंढ़ रही हो। उनका 56 इंच के सीने वाला शौर्य अब सिर्फ एक मीम का ढांचा बन गया है।

हर चीज को संगीत और नृत्य के एक चरम शिखर में बदल देने की यह पूरी प्रक्रिया किसी ऊपर उठती हुई वायरल हवा जैसी लगती है।

यहां कुछ ऐसा मौजूद है जो दाग से परे, बिल्कुल निष्कलंक दिखता है। इसलिए उसे आने वाली अंतिम गिरावट का अंदाजा नहीं है, जो आगे कभी भी हो सकती है। और शायद वही अनजान रह जाना उसकी सबसे बड़ी ताकत है।

वास्तविकता एक वायरल तस्वीर में बदल जाती है, जो जंतर-मंतर पर किसी चरम सामूहिक उभार की ओर बढ़ते हुए सामूहिक मन की मुक्ति को लगातार ऊर्जा देती रहती है।

यह लेख सब्सटैक में 25 जुलाई को प्रकाशित हुआ था और साभार यहां प्रकाशित किया जा रहा है.

(सरोज गिरी दिल्ली यूनिनवर्सिटी में पॉलिटिक्स पढ़ाते हैं।)

https://i0.wp.com/www.workersunity.com/wp-content/uploads/2023/04/Line.jpg?resize=735%2C5&ssl=1

https://i0.wp.com/www.workersunity.com/wp-content/uploads/2023/04/Line.jpg?resize=735%2C5&ssl=1

(वर्कर्स यूनिटी स्वतंत्र निष्पक्ष मीडिया के उसूलों को मानता है। आप इसके फ़ेसबुकट्विटर और यूट्यूब को फॉलो कर इसे और मजबूत बना सकते हैं। वर्कर्स यूनिटी के टेलीग्राम चैनल को सब्सक्राइब करने के लिए यहां क्लिक करें)

Workers Unity Team

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.