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वर्कर्स यूनिटी के समर्थकों से एक अर्जेंट अपील, मज़दूरों की अपनी मीडिया खड़ी करने में सहयोग करें

हर मज़दूर, हर समर्थक से अपील चाहे छोटा सहयोग करें लेकिन ज़रूर करें

वर्कर्स यूनिटी मीडिया प्लेटफ़ार्म को दो साल पूरे हो चुके हैं और ऐसे समय में ये संस्थान आर्थिक दिक्कतों में घिर गया है, जब इसकी सबसे अधिक ज़रूरत महसूस हो रही है।

इस संकट को दूर करने के लिए क्राउड फंडिंग यानी जनता से पैसे इकट्ठा करने की एक मुहिम की शुरुआत की गई है।

ये मुहिम क्राउड फंडिंग वेबसाइट मिलाप के माध्यम से शुरू की गई है और साल भर के खर्च के लिए कुल 10 लाख रुपये का लक्ष्य रखा गया है।

अपने पाठकों, दर्शकों, स्रोताओं, फॉलोअर्स से अपील है कि वो चाहे छोटी से छोटी मदद करें लेकिन आर्थिक सहयोग ज़रूर करें।

यक़ीन जानिए एक छोटे से छोटा सहयोग भी हमारे लिए सबसे बड़ा हौसला अफज़ाई होगा और हमें मज़दूर वर्ग के प्रति और जवाबदेह बनाएगा।

लॉकडाउन के दौरान जब लाखों मज़दूर सड़क पर थे तो वर्कर्स यूनिटी के चाहने वालों से ही पैसा इकट्ठा कर दिल्ली-एनसीआर समेत देश के कई हिस्सों में मदद पहुंचाने की कोशिश की गई और यह मुहिम क़ामयाब रही।

आर्थिक मदद देने के लिए यहां क्लिक करें

बहुत कम समय में दसियों लाख तक पहुंच

मज़दूरों की मीडिया बनाने के मक़सद से खड़े किए गए इस डिज़िटल प्लेटफ़ार्म को दो साल तक संस्थापक सदस्यों ने अपने निजी संसाधनों से संचालित किया।

विचार ये था कि देश में मज़दूर वर्ग की इतनी बड़ी संख्या है कि अगर वो चाहे तो एक ऐसी मीडिया खड़ा कर सकता है जो कारपोरेट घराने के पैसे पर न चलता हो और इसलिए उनकी बात को पुरज़ोर तरीक़े से उठा सके।

ऐसा तभी संभव है, जब मज़दूर वर्ग का एक बड़ा हिस्सा इस विचार को अपनाए और आगे बढ़कर मदद करे। इसमें ट्रेड यूनियनों की एक महत्वपूर्ण भूमिका है।

वर्कर्स यूनिटी के मार्फ़त हमने ये दिखाने की कोशिश की कि अगर ऊंचाईयों को नापने की चाह है तो कुछ भी असंभव नहीं है। दो साल की कड़ी मेहनत से वर्कर्स यूनिटी की मज़दूर वर्ग के बीच एक पहचान बनी है, ज़मीनी मुद्दों को न केवल उठाने की बल्कि मज़दूर वर्ग में एकता स्थापित करने की।

इस छोटी लेकिन तूफ़ानी अवधि में वर्कर्स यूनिटी की पहुंच दसियों लाख लोगों तक हुई है। वेबसाइट पर अबतक आठ लाख पाठक आ चुके हैं। फ़ेसबुक पर महीने में 50 लाख से ज़्यादा दर्शकों तक पहुंच बन चुकी है और मज़दूर वर्ग में चेतना भरने वाले कई कई वीडियो लाखों में देख-सुने गए हैं।

वर्कर्स यूनिटी को पढ़ने देखने सुनने वालों में केवल भारत से नहीं बल्कि एक अच्छी खासी संख्या अमेरिका, कनाडा, यूरोप और सउदी अरब से भी हैं।

मज़दूरों की अपनी मीडिया की अहमियत

इसीलिए हिंदी के अलावा वर्कर्स यूनिटी की अंग्रेज़ी, गुजराती, बंगाली वेबसाइट भी लांच की जा चुकी है जो संसाधन की कमी के चलते अभी ठप पड़ गई है।

ये अपील ऐसे समय में की जा रही है जब देश का मज़दूर वर्ग लॉकडाउन के कारण एक ऐतिहासिक संकट से गुजर रहा है। धड़ाधड़ नौकरियां जा रही हैं, श्रम क़ानून को रद्दी की टोकरी में फेंका जा चुका है और मज़दूर वर्ग में एक भारी निराशा छाई हुई है।

फिर भी हमारा मानना है कि मज़दूर वर्ग अपने संघर्षों से इन विपदाओं पर आख़िरकार जीत हासिल करेगा और इन संघर्षों में मीडिया की भूमिका अहम होगी।

वर्तमान में कार्पोरेट पैसे से चलने वाले मीडिया संस्थानों ने मज़दूरों को दोयम दर्ज़े का नागरिक मान लिया है और इसीलिए उनके ख़िलाफ़ पूरी बेशर्मी से ज़हर उगलने में उनकी कोई बराबरी नहीं कर सकता।

मुख्य धारा की मीडिया, अख़बार, न्यूज़ चैनल, यूट्यूब चैनल, सोशल मीडिया फ़ेसबुक और ट्विटर सबकुछ कुछ चंद कारपोरेट घरानों के कब्ज़े में हैं। शायद यही कारण है कि लॉकडाउन के दौरान मज़दूरों की बिलखती ख़बरें पहले पन्ने पर छपीं लेकिन उनके संघर्षों की कहानियों को दबा दिया गया।

मुख्यधारा की मीडिया को बेबसी दिखानी थी, दिखाई

असल में वे ये दिखाना चाहते हैं कि मज़दूर वर्ग मजबूर है, बेबस और लाचार है। सड़क पर चलते चलते गिर कर मर जाना, पुलिस की लाठी गोली खाना उनकी क़िस्मत है। मीडिया ने दया, हीनता, वितृ्ष्णा का एक माहौल बनाने की कोशिश की।

लेकिन इतनी भी बात इस देश के मालिकों को बर्दाश्त नहीं हुई और अभी एक पखवाड़ा भी नहीं बीता कि मज़दूर चारों ओर से ग़ायब कर दिया गया।

जबकि रोज़ ख़बर आ रही है कि मज़दूर निकाले जा रहे हैं, तीन तीन महीने से सैलरी नहीं मिली है, बहुत से लोग आर्थिक तंगी के कारण अपनी जान ले ले रहे हैं। फ़ैक्ट्रियों में हालत पस्त है। लेकिन ये ख़बरें कहां हैं?

अचानक लॉकडाउन ख़त्म होने के बाद मीडिया कहां ग़ायब हो गया? क्या अब मज़दूरों की समस्याएं नहीं बची हैं?

ये और इन जैसे बहुत सारे सवालों का जवाब एक ही है कि जो जिसका नमक खाएगा, उसका गाएगा। कारपोरेट मीडिया को कारपोरेट घराने और सरकार विज्ञापन के रूप में करोड़ों रुपये चंदे देते हैं। मज़दूरों से उन्हें क्या मिलता है?

ऐसे में अगर वो देश के मालिकों की ख़बर को तवज्जो देते हैं तो ये उनकी ईमानदारी ही कही जाएगी।

मज़दूर मीडिया की ज़रूरत

मज़दूरों को बहुत पहले ही अपनी मीडिया खड़ी कर लेनी चाहिए थी, लेकिन कहावत है कि ‘शराब में डाला गया पानी फिर से अलग नहीं किया जा सकता लेकिन हर सांस के साथ एक नई शुरूआत ज़रूर की जा सकती है।’

मज़दूर वर्ग को आज नहीं तो कल एक समानांतर मीडिया खड़ा करना ही होगा। वर्कर्स यूनिटी ऐसी ही एक कोशिश है। ऐसी हज़ारों लाखों कोशिशें होनी चाहिए।

एक पैन इंडियन न्यूज़ चैनल तक खड़ा करने की ज़रूरत है जो सच्चाई दिखाए, मालिकों की तरफ़दारी करने की उसकी कोई मजबूरी न हो।

(ये अपील वर्कर्स यूनिटी के संस्थापक सदस्यों की ओर से जारी की जा रही है और आपसे अपील है कि इसमें दिल खोलकर मदद करें और हमारे मीडिया प्लेटफ़ार्मों को फॉलो करें।)

(वर्कर्स यूनिटी स्वतंत्र निष्पक्ष मीडिया के उसूलों को मानता है। आप इसके फ़ेसबुकट्विटर और यूट्यूब को फॉलो कर इसे और मजबूत बना सकते हैं। वर्कर्स यूनिटी के टेलीग्राम चैनल को सब्सक्राइब करने के लिए यहां क्लिक करें।)

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