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जयपुर से असम जाकर ईंट भट्ठे में काम करते थे, दोबारा लॉकडाउन के डर से वापस लौट रहे

प्रवासी मज़दूरों में भूमिहीन, दलित, आदिवासी मज़दूरों की अच्छी खासी संख्या

By खुशबू सिंह

प्रवासी मज़दूरों को पहले लॉकडाउन ने बेरोज़गार किया, अब आने वाली बरसात ईंट भट्ठों पर काम करने वाले मज़दूरों के लिए बेरोज़गारी लाने वाली है।

इन्हीं में से एक हैं असम के चराली ईंट के भट्ठों पर काम करने वाले गिरधारी नट।

असम से जयपुर अपने घर को लौटते हुए उन्होंने वर्कर्स यूनिटी को फ़ोन पर बताया कि बारिश और लॉकडाउन के ख़तरे की वजह से वे अपने साथियों के साथ घर जाने के लिए निकल पड़े हैं।

वो बताते हैं, “लॉकडाउन के बाद काम शुरू हो गया है। पर अब बरसात आने पर काम फिर बंद हो जाएगा इसीलिए हम अपने तीन साथियों के साथ जयपुर जा रहे हैं।”

गिरधारी नट की उम्र 19 साल है। ये अपने घर के इकलौते कमाने वाले हैं। घर में दो बहनें, माता-पिता हैं। ये राजस्थान के जयपुर के रहने वाले हैं।

उन्होंने बताया, “काम तो चल ही रहा है पर अंदर से डर लग रहा है कि कहीं दोबारा से लॉकडाउन हो गया तो हम घर नहीं जा पाएंगे। बरसात में काम भी बंद हो जाएगा। इसलिए घर जाना चाहते हैं।”

श्रमिक स्पेशल ट्रेन से यात्रा

गिरधारी नट पिछले पांच महीने से असम के चराली ईंट भट्ठों पर काम कर रहे हैं। एक हज़ार ईंटों को उठाने के बाद इन्हें 150 रुपया मिलता है।

उन्होंने आगे कहा “ एक दिन भट्ठे पर कुछ पुलिस वाले बताने आए थे कि यदि कोई घर जाना चाहता है तो हम उसकी व्यस्था कर देंगे। पुलिस वालों ने ही हमारा बस का टिकट बुक किया और ट्रेन का भी, पर एक रुपया भी नहीं लिया।”

गिरधारी अपने साथियों के साथ चराली से बस के जरिए 6 घंटे का सफर तय कर के गुहावटी पहुचे हैं।

दरसअसल गुहावटी से जयपुर के लिए श्रमिक स्पेशल ट्रेन चलाई जा रही है, जिसके ज़रिए गिरधारी और उनके साथी अपने गांव जाएंगे।

गिरधारी नट के पास गांव में खेती नहीं है। इन्हें डर सता रहा है कि अब गांव में जाकर करना क्या है।

असल में बहुत से प्रवासी मज़दूर इसलिए बाहर जाकर काम करने पर मज़बूर हैं क्योंकि गांव में उनके पास न खेत हैं और ना ही किसी अन्य प्रकार की ज़मीन।

भारत में ईंट भट्ठों पर काम करने वाले मज़दूरों की संख्य़ा करोड़ों में है, जिनमें अधिकांश भूमिहीन, दलित या आदिवासी हैं। अचानक लॉकडाउन के कारण मज़दूर वैसे ही बेरोज़गार हो गए हैं।

45-120  डिग्री की गर्मी में काम

ईंट भट्ठों पर काम करना इतना आसान नहीं होता है। ये लोग 45-120  डिग्री की गर्मी में काम करते हैं। और भारत में कड़ी धूप में काम करने वाले मज़दूरों की संख्या सबसे अधिक है।

देश में उच्च तापमान लगातार बढ़ रहा है। कई विशेषज्ञ इसे ग्लोबल वार्मिंग का कारण बताते हैं। इनका दावा है कि ग्लोबल वार्मिंग से अटपटे मौसमों की पुनरावृत्ति बढ़ जाएगी और इसका सबसे अधिक दंश विकासशील देस भुगतेंगे।

8 जुलाई 2019 में बीबीसी में छपी रिपोर्ट को अनुसार “संयुक्त राष्ट्र संघ की हालिया रिपोर्ट कहती है कि बढ़ती गर्मी के कारण साल 2030 तक भारत में ऐसी 3.4 करोड़ नौकरियां भी ख़त्म हो जाएंगी।”

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