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अशोक लेलैंड ने सभी 4500 परमानेंट मज़दूरों को निकाला, छात्रों से कराया जा रहा काम

अस्थाई मज़दूरों को कंपनी के साथ काम करते हुए अभी 4 साल पूरे नहीं हुए थे

By खुशबू सिंह

देश की दूसरी सबसे बड़ी कमर्शियल व्हीकल मैनुफैक्चरिंग कंपनी  ‘अशोक लेलैंड’ ने उत्तराखंड के पंतनगर प्लांट से 5,800 मज़दूरों को अचनाक काम से निकाल दिया है।

कंपनी ने 4,500 परमानेंट और 1300 ठेका मज़दूरों को बिना किसी नोटिस पीरियड के 30 मई को काम से निकाला दिया।

अस्थाई कर्मचारियों को कंपनी के साथ काम करते हुए अभी 4 साल पूरे नहीं हुए थे कि कंपनी ने उन्हें पहले ही निकला दिया।

प्लांट में काम करने वाले मज़दूर मनोज सिंह रावत ने बताया कि कंपनी के नियम के अनुसार कॉन्ट्रैक्ट पर काम कर रहे वर्करों का, कंपनी के साथ चार साल का बॉन्ड साइन होता है।

लेकिन अपने ही बनाए हुए नियम का पालन न करते हुए कंपनी ने अधिकतर उन मज़दूरों को काम से निकाला है जिन्हें एक या दो साल ही हुआ था।

ट्रेनिंग लेने आये छात्रों को भी लगाया काम पर

इस प्लांट में लगभग 6,500 मज़दूर काम करते हैं, जिसमें से 4,500 परमानेंट हैं। यानी कंपनी ने सभी परमानेंट मज़दूरों को बाहर का रास्ता दिखा दिया है।

इन कर्मचारियों को 30 मई को निकालने के बाद कंपनी ने इनके वेतन का भुगतान 16 जून की शाम किया है।

मनोज सिंह रावत ने वर्कर्स यूनिटी को बताया, “लॉकडाउन के बाद कंपनी शुरू हुई, काम अच्छे से चल रहा था, पर 30 मई की शाम को कंपनी प्रबंधन की तरफ से एक घोषणा की गई। इसमें कहा गया कि, कंपनी आर्थिक तंगी से गुज़र रही है। हम इतने कर्मचारियों का भार संभाल नहीं पाएंगे इसीलिए आप लोगों को काम से बेदखल किया जाता है।”

हालांकि कंपनी प्रबंधन ने ये भी कहा कि ‘अगर अक्टूबर, नवंबर तक कंपनी के हालात में सुधार आता है तो आप लोगों को काम पर बुलाया जाएगा।’

मज़दूरों का कहना है कि कंपनी उन मज़दूरों से काम करा रही है जो छंटनी में बच गए थे। इसके अलावा जो छात्र कंपनी से डिप्लोमा कर रहे थे उन्हें प्रोडक्शन लाईन पर लगाकर काम कराया जा रहा है।

श्रम क़ानूनों को ख़त्म करने से कंपनियों का मन बढ़ा

लॉकडाउन की सैलरी देने के मोदी सरकार के आदेश वापस होने के बाद हरियाणा से लेकर उत्तराखंड और पश्चिम बंगाल से लेकर तमिलनाडु तक छंटनी, तालाबंदी, ले ऑफ़ की घटनाएं तेज़ी से बढ़ी हैं।

एक के बाद एक कंपनियां इसी तरह मंदी का हवाला देकर मज़दूरों को काम से निकाल रही हैं।

मोदी सरकार पिछले छह साल से जिस तरह श्रम क़ानूनों को ख़त्म कर रही थी और फ़िक्स टर्म एम्प्लायमेंट (एफ़टीई) और कौशल विकास योजनाओं के नाम पर कंपनियों को मुफ़्त का मज़दूर मुहैया कराने का बंदोबस्त कर रही थी, अब कोरोना के समय यही होने लगा है।

अभी फिर से नरेंद्र मोदी ने ‘संकट को अवसर में बदलने’ की अपील की है लेकिन ऐसा अंदाज़ा लगाना मुश्किल नहीं है कि ये अपील किससे लिए की जा रही है, मालिकों से या मज़दूरों से।

कंपनियां धड़ाधड़ दो दो तीन तीन दशक के काम कर रहे परमानेंट मज़दूरों को निकाल रही हैं और सुप्रीम कोर्ट ने इसमें मध्यस्थता करने या कोई फैसला देने से इनकार कर दिया है।

यूनियनें बेअसर

उधर यूनियनें इस कदर बेअसर साबित हो गई हैं कि जैसे लगता है कि उनके न होने पर कोरोना और लॉकडाउन ने मुहर सी लगा दी है।

लेकिन इन कंपनियों को इस तरह धड़ल्ले से ग़ैरक़ानूनी तरीके से मज़दूरों को निकालने के लिए साहस कहां से मिल रहा है, ये सवाल अब मज़दूरों के सामने आ खड़ा हुआ है।

‘आपकी जीत हमारी जीत’ ये नारा अशोक लेलैंड के ब्रांड प्रमोशन का है। लेकिन ऐसा लगता है कि कंपनी मज़दूरों की हार में अपनी जीत तलाश रही है।

अशोक लेलैंड, कमर्शियल व्हीकल मैनुफैक्चरिंग की दुनिया का दूसरा सबसे बड़ नाम है, जोकि हिंदुजा ग्रुप की कंपनी है। इसकी शुरुआत रघुनंदन शरन ने 1948 में की थी।

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