कॉकरोच जनता पार्टी की नियति जंतर मंतर के पुराने आंदोलनों से कितनी अलग होगी?

By आनंद तेलतुमड़े
यह लेख फ़्रंट लाइन में आठ जुलाई यानी आंदोलन जोर पकड़ने के 10 दिन पहले प्रकाशित हुआ था। इसे यहां अद्यतन प्रकाशित किया जा रहा है-
हाल के वर्षों में बहुत कम राजनीतिक नारों ने लोगों की कल्पना को उतनी ताकत से प्रभावित किया है जितना अभिजीत दीपके का यह सवाल- “अगर सारे कॉकरोच एक साथ आ जाएं तो?”
यह सवाल 15 मई 2026 को खुली अदालत में हुई सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की उस कथित टिप्पणी के जवाब में एक्स पर पोस्ट किया गया था, जिसमें उन्होंने बेरोजगार युवाओं को “कॉकरोच” और “समाज के परजीवी” बताया था।
यह टिप्पणी इसलिए लोगों के दिल को छू गई क्योंकि इसमें वह बात दिखाई दी, जिसका शक अब बहुत से भारतीयों को होने लगा है कि सत्ता प्रतिष्ठान—राजनेता, नौकरशाह, न्यायाधीश और विशेषाधिकार प्राप्त वर्ग, आम नागरिकों को अधिकार वाले देश के नहीं, बल्कि ऐसे प्रजा-समूह के रूप में देखते हैं जिन्हें जरूरत के हिसाब से संभाला या दरकिनार किया जा सकता है।
यह टिप्पणी बेहद आपत्तिजनक थी। लेकिन उसकी साफगोई में एक गहरी सच्चाई भी छिपी थी। 15 से 25 साल के लगभग 40 प्रतिशत भारतीय ग्रेजुएट बेरोजगार हैं। वे परजीवी नहीं हैं, बल्कि आर्थिक कुप्रबंधन, घटते अवसरों और उस राजनीतिक संस्कृति के शिकार हैं जो रोज़गार पैदा करने की कठिन ज़िम्मेदारी की जगह राष्ट्रवादी तमाशे को आगे रखती है।
दीपके की सबसे बड़ी समझदारी यह थी कि उन्होंने अपमान को राजनीतिक संभावना में बदल दिया। उन्होंने गाली को पहचान बना दिया और कलंक को एकजुटता में बदल दिया।
यह रूपक इसलिए असरदार बना क्योंकि उसने उस वास्तविक अनुभव को पकड़ा जिसमें लाखों युवा बेरोज़गारी, परीक्षा घोटालों और इस बढ़ती भावना से जूझ रहे हैं कि व्यवस्था में उनके लिए कोई जगह नहीं बची है।
इससे मिली प्रतिक्रिया से उत्साहित होकर दीपके ने वर्चुअल कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) शुरू की, जिसे कुछ ही दिनों में कथित तौर पर 2 करोड़ इंस्टाग्राम फॉलोअर मिल गए।
सरकार की जवाबी प्रतिक्रिया यही दिखाती है कि यह विचार सत्ता को चुभ गया था। इस प्रतिक्रिया में भारत में उसके एक्स हैंडल को ब्लॉक करना, उसकी ऑनलाइन मौजूदगी को निशाना बनाना और दीपके के परिवार को धमकाना आदि शामिल है।
जो सरकारें अपनी वैधता को लेकर निश्चिंत होती हैं, वे व्यंग्यात्मक आंदोलनों को सुरक्षा खतरे की तरह नहीं देखतीं।
लेकिन नारे बनाना आसान है, आंदोलन बनाना नहीं। सीजेपी के सामने असली सवाल यह है कि क्या वह भारतीय राजनीति की परंपरागत सीमाओं से आगे जा पाएगी, या उससे पहले के कई आंदोलनों की तरह उसी व्यवस्था में समा जाएगी।
अब तक आंदोलन का सबसे बड़ा क्षण नई दिल्ली के जंतर-मंतर पर हुआ जुटान रहा, जहां हजारों लोग शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग को लेकर इकट्ठा हुए।
उनका आरोप था कि लगातार पेपर लीक, ऑन-स्क्रीन मूल्यांकन में गड़बड़ियां और भर्ती घोटालों की लंबी श्रृंखला ने उन लाखों युवाओं का भविष्य बर्बाद कर दिया है जिन्होंने यह भरोसा किया था कि कम से कम योग्यता का सम्मान होगा।
सोनम वांगचुक भी इस प्रदर्शन में शामिल हुए और कई अन्य लोगों ने भी समर्थन दिया। ऊर्जा साफ़ दिखाई दे रही थी और गुस्सा पूरी तरह जायज था।
फिर भी इस उत्साह को यथार्थवाद से संतुलित करना जरूरी है। यह जुटान प्रभावशाली जरूर था, लेकिन अभूतपूर्व नहीं। 1.5 अरब की आबादी वाले देश में हज़ारों लोगों का इकट्ठा होना अपने आप में राजनीतिक भूकंप नहीं कहलाता।
उससे भी महत्वपूर्ण यह है कि विरोध का तरीका और मांग की प्रकृति दोनों में परंपरागत राजनीति की स्पष्ट छाप दिखाई दी और इससे यह भी लगा कि देश को जकड़ चुकी सड़ांध की गहराई को पूरी तरह समझा नहीं गया है।
परीक्षा घोटाले केवल किसी एक मंत्री की विफलता का परिणाम नहीं हैं। वे एक गहरी बीमारी के लक्षण हैं यानी सार्वजनिक संस्थानों का पतन, शिक्षा का बाजारीकरण, जवाबदेही का क्षरण और ऐसी राजनीतिक संस्कृति जिसमें शासन को तमाशा बना दिया गया है।
धर्मेंद्र प्रधान की जगह किसी और को बैठा देने से ये ढांचागत समस्याएं जस की तस बनी रहेंगी।
जंतर मंतर के आंदोलनों की नियति
जंतर-मंतर के चुनाव पर भी यही बात लागू होती है। दशकों से वहां अनगिनत आंदोलनों ने जन्म लिया और फिर राजनीतिक विस्मृति में खो गए। इस स्थान का प्रतीकात्मक महत्व जरूर है, लेकिन यह असहमति को नियंत्रित कर देने का प्रतीक भी बन चुका है।
राज्य ने व्यवहार में एक ऐसा क्षेत्र तय कर दिया है जहां नागरिक विरोध तो कर सकते हैं, पर सत्ता के सामान्य कामकाज को चुनौती नहीं दे सकते। सरकारें वहां प्रदर्शनों से निपटने में माहिर हो चुकी हैं।
पुलिस जानती है कि उन्हें कैसे नियंत्रित करना है। टीवी चैनल जानते हैं कि उन्हें कैसे पैकेज करना है। राजनीतिक दल जानते हैं कि उनका इस्तेमाल कैसे करना है। यह पूरी व्यवस्था दशकों से अपने जवाबों का अभ्यास करती रही है।
नतीजा यह हुआ है कि जंतर-मंतर के प्रदर्शन अक्सर व्यवधान की जगह रस्म बनकर रह जाते हैं। वे सुर्खियां और सोशल मीडिया सामग्री तो पैदा करते हैं, लेकिन सत्ता के मूल संतुलन को बहुत कम बदलते हैं। शायद उसे आंदोलनों की जन्मभूमि से ज्यादा उनकी कब्रगाह कहना अधिक सही होगा।
सीजेपी की यात्रा एक बड़े संकट को सामने लाती है जिसने दशकों से भारतीय असहमति को परेशान किया है- रचनात्मक शुरुआतें बार-बार परंपरागत राजनीति द्वारा निगल ली जाती हैं।
जब दीपके ने अपने मूल ट्वीट के 24 घंटे के भीतर एआई टूल्स की मदद से सीजेपी का स्वरूप और घोषणापत्र तैयार कर उसे लॉन्च किया, तब आंदोलन की कल्पना सचमुच नई थी।
लेकिन बाद में जारी पांच सूत्री घोषणापत्र किसी भी सामान्य सुधारवादी संगठन जैसा लगा- सेवानिवृत्त मुख्य न्यायाधीशों को राज्यसभा सीट देने पर रोक, संसद में महिलाओं के लिए 50 प्रतिशत आरक्षण, वोट हटाने के आरोप में मुख्य चुनाव आयुक्त को यूएपीए के तहत गिरफ्तार करने की मांग और अंबानी व अडानी समूह के स्वामित्व वाले मीडिया संस्थानों के लाइसेंस रद्द करने की मांग।
ये मांगें अनुचित नहीं हैं, लेकिन वे परिवर्तनकारी भी नहीं हैं।
आंबेडकर के बारे में दीपके की समझ
जिस देश में राज्य तंत्र लगभग पूरी तरह एक राजनीतिक शक्ति के कब्जे में चला गया हो और औपचारिक विकल्प लगभग असंभव हो गए हों, वहां केवल एक और पांच सूत्री घोषणापत्र काफी नहीं है। वहां राज्य और नागरिक के रिश्ते की बुनियादी पुनर्कल्पना की ज़रूरत है।
इसके बाद दीपके भारत आए और आंदोलन की संभावनाओं पर एक और सीमा दिखाई दी। उनकी तस्वीरें बीआर आंबेडकर की कथित पुस्तक My Autobiography की प्रति हाथ में लिए हुए सामने आईं।
ऐसी कोई आत्मकथा आंबेडकर ने उस रूप में नहीं लिखी थी, दरअसल यह पुस्तक प्रभात प्रकाशन द्वारा प्रकाशित है, जिसे आरएसएस से जुड़ा माना जाता है और जो संघ साहित्य की अलग श्रृंखला भी प्रकाशित करता है।
इसे दीपके और आरएसएस के बीच वैचारिक संबंध के रूप में नहीं पढ़ा जाना चाहिए; अधिक संभावना यही है कि वे आंबेडकर के वास्तविक लेखन से पर्याप्त परिचित नहीं थे।
लेकिन यह प्रतीकात्मक कदम एक रणनीतिक भूल को जरूर उजागर करता है। आंबेडकर भारतीय इतिहास के महानतम विचारकों में से एक हैं, लेकिन बहुसंख्यक भारतीयों की सामाजिक चेतना में वे आज भी मुख्य रूप से जाति-प्रतीक के रूप में देखे जाते हैं, न कि सार्वभौमिक लोकतांत्रिक दार्शनिक के रूप में।
ऐसे आंदोलन के केंद्र में आंबेडकर को प्रतीक के रूप में रखना, जो पूरे भारत के असंतुष्ट युवाओं से संवाद करना चाहता है, उसके दायरे को संकुचित कर सकता है, जबकि इस समय उसकी सबसे बड़ी राजनीतिक ताकत उसका व्यापक फैलाव हो सकता है।
इसके अलावा आंबेडकर को प्रतिद्वंद्वी राजनीतिक खेमों ने लंबे समय से मौजूदा व्यवस्था के प्रतीकात्मक सहारे के रूप में इस्तेमाल किया है; इसलिए उनका आह्वान उस व्यापक और मूलगामी परिवर्तन के क्षितिज को भी सीमित कर सकता है जिसकी आज भारत को ज़रूरत है।
प्रतिद्वंद्वी की कल्पना को चुनौती देना
यहीं हाल के वर्षों के दूसरे देशों के उथल-पुथल भरे अनुभव तुलना के लिए उपयोगी भी हो जाते हैं और असहज भी।
2024 में शेख हसीना शासन को समाप्त करने वाला बांग्लादेश का युवा विद्रोह और 2025 का नेपाल का लोकतांत्रिक आंदोलन केवल बड़ी भीड़ या तयशुदा स्थानों पर घोषित प्रदर्शनों की वजह से प्रभावी नहीं बने।
उनकी ताकत इस बात में थी कि उन्होंने राज्य की कल्पना को ही चुनौती दे दी। वे सरकारों की प्रतिक्रिया तैयार करने की गति से तेज चले।
उन्होंने उन जगहों पर कब्जा किया जिनकी सत्ता ने कल्पना नहीं की थी। उन्होंने संघर्ष की उन शर्तों को मानने से इनकार कर दिया जिन्हें राज्य पहले से नियंत्रित करने के लिए तैयार कर चुका था। वे सही मायने में “अनियंत्रित” थे।
इसके विपरीत सीजेपी के बारे में खतरा यह है कि वह अनुमान लगाने योग्य बनती जा रही है। पहले से घोषित प्रदर्शन, तय स्थान, मंत्रियों की जवाबदेही की मांग, पारंपरिक संगठनात्मक ढांचा, ये सब उस राजनीतिक व्याकरण का हिस्सा हैं जिसे भारतीय राज्य भलीभांति समझता है और दशकों से संभालता आया है।
एक और खतरा यह भी है कि कहीं दीपके खुद को अगले अरविंद केजरीवाल के रूप में न देखने लगें- वह बाहरी व्यक्ति जिसने व्यवस्था को चुनौती दी, डिजिटल ऊर्जा और सत्ता-विरोधी शैली से जनसमर्थन हासिल किया, और अंततः लगभग उसी ढांचे के भीतर समा गया।
आम आदमी पार्टी इस बात की चेतावनी है कि रचनात्मक विघटन से जन्मा आंदोलन जब उन्हीं संस्थाओं के तर्क के आगे झुक जाता है जिन्हें वह बदलना चाहता था, तो उसका क्या हश्र होता है।
कॉकरोच की असली ताकत
कॉकरोच का रूपक खुद एक ऐसी सीख देता है जिसे आंदोलन ने अभी तक पूरी तरह आत्मसात नहीं किया है। कॉकरोच इसलिए बचते हैं क्योंकि वे खुद को ढाल लेते हैं। वे नियंत्रण से बच निकलते हैं, उन जगहों पर फैलते हैं जिन्हें सत्ता नजरअंदाज करती है और उनकी प्रकृति विकेंद्रीकृत होती है।
उनका कोई मुख्यालय नहीं होता, कोई सर्वोच्च नेता नहीं होता, और ऐसा कोई घोषणापत्र नहीं होता जिसे निशाना बनाकर उन्हें खत्म किया जा सके। उनका अनुमान लगाना कठिन होता है और उन्हें पूरी तरह मिटा देना उससे भी कठिन।
यदि कोई आंदोलन इस रूपक से प्रेरणा लेता है, तो उसमें भी यही गुण दिखाई देने चाहिए। उसकी असली ताकत अभिजीत दीपके में नहीं, चाहे वे कितने भी सक्षम या ईमानदार क्यों न हों, बल्कि उन लाखों लोगों में है जिन्होंने उस छवि में खुद को पहचाना।
किसी एक व्यक्ति पर आधारित आंदोलन उसी व्यक्ति की सीमाओं को भी विरासत में लेता है; जबकि सामूहिक शक्ति पर आधारित आंदोलन टिकाऊ बनता है।
इसलिए सीजेपी को मीडिया का “चेहरा” खोजने की मांग, जनता की “नायक” पाने की इच्छा और राजनीतिक व्यवस्था की उस प्रवृत्ति, जो सामूहिक गुस्से को व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा में बदल देती है—तीनों का विरोध करना होगा।
उससे भी अधिक ज़रूरी यह है कि वह उन चीजों को एक-दूसरे से जोड़कर देखे जिन्हें सरकारी विमर्श अलग-अलग समस्याओं की तरह पेश करता है- बेरोजगारी और पेपर लीक, कृषि संकट और लोकतांत्रिक क्षरण, संस्थागत पतन और बढ़ती असमानता, सांप्रदायिक तनाव और आर्थिक बदहाली।
ये अलग-अलग समस्याएं नहीं हैं, बल्कि एक ही तंत्रगत विफलता की अलग-अलग अभिव्यक्तियां हैं। जब तक इन संबंधों को स्पष्ट नहीं किया जाएगा, राजनीतिक सक्रियता बिखरी हुई शिकायतों और आसानी से संभाले जा सकने वाले प्रदर्शनों के चक्र में फंसी रहेगी।
असली काम कहीं धीमा और कम आकर्षक होता है- कॉलेजों, फैक्ट्रियों, गांवों और शहरों की अनौपचारिक अर्थव्यवस्था में नेटवर्क बनाना; लोगों को केवल उनकी तात्कालिक शिकायत नहीं, बल्कि उस आपस में जुड़ी हुई व्यापक संकट-व्यवस्था के बारे में जागरूक करना जो उनके जीवन को आकार देती है।
और उस राजनीतिक परिवर्तन की क्षमता विकसित करना जिसकी भारत को जरूरत है—सिर्फ एक पार्टी की जगह दूसरी पार्टी लाना नहीं, बल्कि राज्य और नागरिक के रिश्ते का बुनियादी पुनर्गठन करना आज की ज़रूरत है।
सत्ता प्रतिष्ठान ने “कॉकरोच” अपने तिरस्कार से पैदा किए। दीपके के ट्वीट पर आई प्रतिक्रिया बताती है कि लाखों लोगों ने उस पहचान में खुद को देखा। रचनात्मक चिंगारी निर्विवाद है; चुनौती यह है कि उसे भड़कती हुई आग में बदला जा सके।
अब भी अनिश्चित यही है कि क्या ये “कॉकरोच” उस कीट की तरह लचीले, विकेंद्रीकृत और अनियंत्रित साबित होंगे जिससे उन्होंने अपना नाम लिया है।
या फिर वे उसी पुराने रास्ते पर चल पड़ेंगे जहां उनसे पहले अनेक भारतीय आंदोलन पहुंच चुके हैं, एक ऐसी याद बनकर, जब कुछ सचमुच नया संभव होता हुआ दिखाई दिया था।
(लेखक आनंद तेलतुंबड़े पेट्रोनेट इंडिया लिमिटेड (पीआईएल) के पूर्व मुख्य कार्यकारी अधिकारी, आईआईटी खड़गपुर और गोवा इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट में प्रोफेसर, नागरिक अधिकार कार्यकर्ता और 30 से अधिक पुस्तकों के लेखक हैं।)
- सैलरी का ग़ुस्सा, नोएडा प्रोटेस्ट एक ख़तरे की घंटी क्यों है? नज़रिया
- मेरठ और नोएडा भारत के बारे में क्या बता रहे हैं?
- पानीपत के बाद अब नोएडा में उठी सैलरी बढ़ाने की मांग, हिंसक हुआ मज़दूरों का प्रदर्शन
- पानीपत के बाद अब नोएडा में उठी सैलरी बढ़ाने की मांग, हिंसक हुआ मज़दूरों का प्रदर्शन
- बजट का 60% आवंटन सिर्फ़ कर्ज़, रक्षा और सड़क पुल बंदरगाह में स्वाहा, सबसे अधिक खर्च कहां कर रही है मोदी सरकार?
- तमिलनाडु के सैमसंग कर्मचारियों की हड़ताल समाप्त, क्या निलंबित मज़दूरों को बहाल करेगी कंपनी?







