ईपीएफओ की वेतन सीमा बढ़ाकर 25,000 रुपये किया, क्या यह मोदी सरकार का नया ‘जुमला’ है?

मोदी सरकार ने आखिरकार 12 साल बाद कर्मचारी भविष्य निधि संगठन (ईपीएफओ) के तहत अनिवार्य कवरेज के लिए वेतन सीमा को 15,000 रुपये से बढ़ाकर 25,000 रुपये प्रति माह करने की बुधवार को मंज़ूरी दे दी। नई सीमा 17 सितंबर 2026 से लागू होगी। गौरतलब है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का इसी दिन 76वां जन्मदिन भी है।
दिलचस्प है कि मोदी सरकार ने 17 सितंबर 2014 में ही इस सीमा को 6,500 रुपये से बढ़ाकर 15,000 रुपये की थी। इसके बाद 12 साल तक इसमें कोई बदलाव नहीं किया गया। हालांकि इस दौरान चार लेबर कोड लाकर मोदी सरकार ने मज़दूरों के हक़ को कतरने की भरपूर कोशिश की।
मोदी सरकार इसे प्रधानमंत्री के जन्मदिन के तोहफ़े के तौर पर पेश कर रही है और इसे देश में बढ़ते रोज़गार, बढ़ती सैलरी, मज़दूरों में ख़ुशहाली के तौर पर पेश कर रही है लेकिन हकीक़त ये है कि भारत में वास्तविक सैलरी पिछले दस सालों में कम हुई है।
और आईएलओ की एक ताज़ा रिपोर्ट में तो कहा गया है कि खरीदने की क्षमता के आधार पर भारत, दुनिया के 130 देशों में 111वें स्थान पर है, यानी नेपाल और बांग्लादेश से भी नीचे।
लेकिन इससे पहले कि हम सरकार के फैसले की तह में जाएं, आईए ज़रा मोदी सरकार की इस दयानतदारी की बारीकियों को समझ लें।
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फ़ैसले में क्या है?
नई व्यवस्था के तहत 15,000 से 25,000 रुपये प्रति माह वेतन पाने वाले कर्मचारी भी अनिवार्य ईपीएफओ कवरेज के दायरे में आएंगे।
इससे उन्हें कर्मचारी भविष्य निधि (ईपीएफ), कर्मचारी पेंशन योजना (ईपीएस) और एम्प्लाई डिपाजिट लिंक्ड बीमा स्कीम (ईडीएलआई) से जुड़े सामाजिक सुरक्षा लाभ मिलेंगे।
सरकार के मुताबिक, 51 लाख से अधिक अतिरिक्त कर्मचारी इसके दायरे में आ सकते हैं.
सरकार के अनुसार, नई वेतन सीमा के तहत 8 करोड़ से अधिक कर्मचारियों के लिए 25,000 रुपये तक के वेतन पर अनिवार्य योगदान लागू होगा। 25,000 रुपये से अधिक वेतन वाले हिस्से पर योगदान स्वैच्छिक रहेगा यानी ये आपके ऊपर होगा कि आप अतिरिक्त योगदान देना चाहते हैं या नहीं।
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हर महीने कितना योगदान होगा?
ईपीएफ में कर्मचारी और कंपनी दोनों कर्मचारी के मूल वेतन और महंगाई भत्ते समेत संबंधित वेतन के अन्य हिस्सों का 12-12 प्रतिशत योगदान करते हैं.
कर्मचारी का पूरा 12 प्रतिशत योगदान ईपीएफ़ में जाता है। जबकि कंपनी के 12 प्रतिशत में से 3.67 प्रतिशत ईपीएफ़ में और 8.33 प्रतिशत कर्मचारी पेंशन योजना यानी ईपीएस में जाता है।
सरकार कर्मचारी की पेंशन के लिए 1.16 प्रतिशत का योगदान करती है। कर्मचारी अपनी तरफ से ईपीएस में अलग से योगदान नहीं करता है।
नई वेतन सीमा के साथ ईपीएस में मासिक पेंशन योगदान की सीमा 1,250 रुपये से बढ़कर करीब 2,080 रुपये हो जाएगी।
यानी औसतन, एक कर्मचारी के लिए कुल ईपीएफ योगदान में प्रति माह 600 रुपये की वृद्धि होने की उम्मीद है।
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कर्मचारियों और कंपनियों पर क्या असर पड़ेगा?
नई सीमा के कारण जिन कर्मचारियों का वेतन अब तक 15,000 रुपये की सीमा से ऊपर होने के कारण अनिवार्य ईपीएफओ कवरेज में नहीं आता था, वे अब इसके दायरे में आएंगे।
सरकार के अनुमान के मुताबिक, कंपनी का योगदान औसतन करीब 600 रुपये प्रति कर्मचारी प्रति माह बढ़ सकता है। कुछ कर्मचारियों के मामले में कर्मचारी और कंपनी दोनों के योगदान में बढ़ोतरी होने से हाथ में आने वाली सैलरी पर असर पड़ेगा।
यानी अगर कर्मचारी का योगदान बढ़ता है तो उसकी टेक-होम सैलरी कम हो सकती है, हालांकि इसके बदले उसके ईपीएफ खाते में अधिक राशि जमा होगी।
सरकार के अनुसार, नई व्यवस्था से उसका सालाना खर्च करीब 11,339 करोड़ रुपये होने का अनुमान है। मौजूदा वार्षिक बजटीय सहायता करीब 10,250 करोड़ रुपये है। यानी अतिरिक्त सालाना खर्च लगभग 1,089 करोड़ रुपये बैठता है। पांच साल में अनुमानित खर्च करीब 56,696 करोड़ रुपये बताया गया है।
सरकार ने नई सीमा बढ़ाने के पीछे बढ़ती मजदूरी, आय में वृद्धि और औपचारिक रोजगार के विस्तार को वजह बताया है।
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एक नज़र में
- पुरानी वेतन सीमा: 15,000 रुपये प्रति माह
- नई वेतन सीमा: 25,000 रुपये प्रति माह
- लागू होने की तारीख: 17 सितंबर 2026
- अतिरिक्त कर्मचारी: 51 लाख से अधिक
- पेंशन योगदान की सीमा: 1,250 रुपये से बढ़कर करीब 2,080 रुपये
- सरकार का अनुमानित सालाना खर्च: 11,339 करोड़ रुपये
- अनुमानित अतिरिक्त सरकारी खर्च: करीब 1,089 करोड़ रुपये
- कंपनी के योगदान में औसत अनुमानित बढ़ोतरी: करीब 600 रुपये प्रति कर्मचारी प्रति माह
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मोदी सरकार का हृदय परिवर्तन कैसे हुआ?
बीते फरवरी से देश भर में जुझारू मज़दूर आंदोलनों की वजह से बीजेपी की सरकारों को हरियाणा और उसके बाद यूपी में न्यूनतम वेतन में बढ़ोत्तरी करनी पड़ी। नोएडा प्रोटेस्ट इसकी नज़ीर है। यहां तक कि तेलंगाना और अन्य राज्यों में भी न्यूनतम मज़दूरी बढ़ानी पड़ी।
बीते एक दशक में कर्मचारियों की सैलरी में, महंगाई के अनुपात में बहुत मामूली वृद्धि हुई है, जिसे वास्तविक वेतन या रीयल वेज़ कहा जाता है।
वास्तविक वेतन का मतलब है कि आपकी कमाई से आप वास्तव में कितनी चीजें खरीद सकते हैं। इसे महंगाई के हिसाब से देखा जाता है।
उदाहरण के लिए अगर वेतन 10% बढ़ा, लेकिन महंगाई 6% बढ़ी, तो आपकी वास्तविक वेतन वृद्धि लगभग 4% मानी जाएगी।
सरल शब्दों में, नॉमिनल वेज = आपको मिलने वाली रकम।
वास्तविक वेतन = उस रकम की खरीदने की क्षमता।
यह तथ्य है कि असंगठित क्षेत्र के वर्करों के वेतन में पिछले एक दशक में महंगाई से भी कम वेतन वृद्धि हुई है और की जगहों पर वेतन वृद्धि के लिए लंबे लंबे धरने हुए, प्रदर्शन हुए। लेकिन सरकारी दख़ल से इनका कोई नतीज़ा नहीं निकला। इस मामले में तमिलनाडु की कथित सामाजिक न्याय वाली स्टालिन की डीएमके सरकार रही हो या कट्टरपंथी बीजेपी की हरियाणा और यूपी की सरकार रही हो या राजस्थान में कांग्रेस की सरकार रही हो।
लेकिन बीते कुछ महीनों में मज़दूर आंदोलन के बढ़ते ज्वार में पूंजीपति वर्ग के लिए ये ज़रूरी हो गया था कि लेबर कोड और महंगाई और कम वेतन के ख़िलाफ़ गुस्से पर कुछ पानी डाला जाए।
अभी ईपीएफ़ओ के तहत अनिवार्य कवरेज के लिए वेतन की सीमा को 25000 रुपये तक बढ़ा दिया गया है लेकिन यह वैसा ही शिगूफा है जैसा पिछले साल वित्त मंत्री ने टैक्स फ़्री इनकम को 10 लाख रुपये कर दिया था। तब मीम्स बने थे कि टैक्स फ़्री लायक सैलरी भी कर देती सरकार तब तो इसका कोई मतलब था।
इसी तरह ईपीएफ़ओ की सीमा तो बढ़ा दी गई, लेकिन क्या मज़दूरों, कर्मचारियों की औसत सैलरी 25,000 रुपये है?
दिलचस्प है कि नोएडा में मज़दूरों के प्रदर्शन के दौरान वर्करों ने 20 हज़ार रुपये वेतन करने की मांग रखी थी। योगी सरकार ने अधिकतम 3,000 रुपये बढ़ाया वह भी बहुत मामूली कर्मचारियों को मिल पाया। वर्कर्स यूनिटी की पड़ताल में पता चला कि जिन अधिकांश मज़दूरों की प्रदर्शन के बाद सैलरी बढ़ी वो पांच सौ रुपये से लेकर 1500 रुपये तक थी।
तो क्या ईपीएफ़ की सैलरी सीमा बढ़ाना कोई और जुमला है?
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