नोएडा प्रोटेस्टः जेल से रिहा होने पर भी फ़ोन नहीं लौटा रही नोएडा पुलिस, आर्थिक ज़िंदगी का एक मात्र साधन कब मिलेगा?
By राखी सहगल
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 170 के तहत उत्तर प्रदेश पुलिस की हिरासत में लिए गए लगभग 1,100 मज़दूरों में से ज़्यादातर को रिहा कर दिया गया है। यह प्रावधान सज़ा नहीं बल्कि एहतियाती हिरासत के लिए बनाया गया है।
लेकिन यह लेख लिखे जाने तक (छह मई), रिहाई के 15 दिन से ज़्यादा समय बाद भी मज़दूरों के फ़ोन और निजी सामान वापस नहीं किए गए थे।
(नोटः 1100 मज़दूरों के गिरफ़्तार होने और 1000 के छोड़े जाने का आंकड़ा, जेल के सूत्रों, मज़दूरों की मदद कर रहे सामाजिक संगठनों और मज़दूरों के खुद के बयानों पर आधारित है। यह सत्यापित संख्या नहीं है क्योंकि नोएडा पुलिस ने अभी तक कुल आंकड़े नहीं जारी किए हैं। पुलिस कमिश्नर लक्ष्मी सिंह ने 14 अप्रैल को बताया था कि 300 मज़दूरों को पहले दिन गिरफ़्तार किया गया था। और आने वाले समय में और गिरफ़्तारियां होने की बात कही थी। सं.)
इन मज़दूरों को 9 अप्रैल से छह दिनों तक नोएडा की औद्योगिक इकाइयों में ठेका मज़दूरों के नेतृत्व में हुए विरोध प्रदर्शनों के बाद हिरासत में लिया गया था।
मज़दूर कम वेतन, बिगड़ती कामकाजी परिस्थितियों और क़ानूनी सुरक्षा की कमी की तरफ़ ध्यान दिला रहे थे। उनकी परेशानियों में ईरान के साथ युद्ध शुरू होने के बाद रसोई गैस की बढ़ती क़ीमतों ने और इज़ाफ़ा किया।
मज़दूरों की बुनियादी अधिकारों से जुड़ी इन मांगों को श्रम विवाद के रूप में देखने के बजाय पुलिस कार्रवाई से दबाया गया और औद्योगिक संबंधों के मुद्दे को क़ानून-व्यवस्था का सवाल बना दिया गया।
रिहाई के बाद भी मज़दूरों के फ़ोन वापस न करना, हिरासत ख़त्म होने के बाद भी जारी सज़ा जैसा है।
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फ़ोन पर टिकी आर्थिक ज़िंदगी
ज़्यादातर कामकाजी भारतीयों के लिए फ़ोन उनकी आर्थिक ज़िंदगी और पहचान का एकमात्र माध्यम है। यूपीआई, मोबाइल बैंकिंग और डिजिटल वॉलेट में उनकी थोड़ी-बहुत बचत रहती है, जबकि आधार, ड्राइविंग लाइसेंस और मेडिकल रिकॉर्ड भी फ़ोन में ही सेव होते हैं।
पुलिस ने मज़दूरों का सामान लौटाने को लेकर कोई समयसीमा नहीं बताई है। न कोई सूचना दी गई है, न कोई प्रक्रिया अपनाई गई है और न ही यह स्वीकार किया गया है कि यह सामान किसी का निजी है। वकीलों का कहना है कि अगर ज़ब्त किए गए सामान का कोई रिकॉर्ड होता तो वे अदालत में आवेदन दे सकते थे।
डिजिटल अनिश्चितता में फंसे लोगों में एक गर्भवती महिला भी शामिल है, जिसने आरोप लगाया कि फ़ैक्टरी के बाहर सड़क पर हुई धक्का-मुक्की के दौरान पुलिस ने उसके पेट में लात मारी। उसने कहा कि जब वह किसी तरह यह बता पाई कि वह गर्भवती है, तभी उसे जाने दिया गया। औपचारिक तौर पर हिरासत में नहीं लिए जाने के बावजूद उसका फ़ोन वापस नहीं किया गया।
उसे बातचीत के लिए फ़ोन की ज़रूरत है, लेकिन यह उसकी मेडिकल ज़रूरत भी है क्योंकि उसमें उसकी पिछली गर्भावस्था से जुड़े मेडिकल रिकॉर्ड और अल्ट्रासाउंड के लिए रखे 3,000 रुपये मौजूद हैं।
इसके अलावा वे प्रवासी मज़दूर भी हैं जो काम करने और घर पैसे भेजने के लिए राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र आए थे। उनके परिवार अपने राज्यों से जेल में मिलने या क़ानूनी मदद की व्यवस्था करने नहीं आ सके क्योंकि यात्रा के लिए ज़रूरी पैसे उन फ़ोनों के ज़रिए भेजे गए थे जो अब भी पुलिस के पास हैं।
ऐसे में उनके सहकर्मी, जो ख़ुद भी बेहद मुश्किल हालात में रह रहे प्रवासी मज़दूर हैं, आगे आए और उन्होंने क़ानूनी मदद का इंतज़ाम किया। कई परिवार क़र्ज़ में डूब गए हैं और यह बोझ सालों तक बना रह सकता है।
प्रिवेंटिव डिटेंशन यानी एहतियाती हिरासत से रिहा हुए युवा मज़दूर अपने गांव लौटना चाहते हैं, लेकिन फंसे हुए हैं। वे अपने फ़ोन पीछे नहीं छोड़ सकते क्योंकि उन्हीं में पैसे, पहचान पत्र और आधार मौजूद हैं, जिनसे उन्हें मिलने वाली हर सुविधा जुड़ी है।
अप्रैल के आख़िर में नोएडा में उन्हें एक और संकट का सामना करना पड़ा जब किराया देने का समय आ गया, लेकिन उनका सारा पैसा उन फ़ोनों में बंद था जिन्हें पुलिस वापस नहीं कर रही थी।
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मज़दूर अभी भी पूरी तरह नहीं लौटे
इस बीच कई मज़दूर काम पर वापस नहीं लौटे हैं। यह बात फैल चुकी है कि एचआर विभाग फ़ैक्टरी गेट पर ही मज़दूरों की पहचान करवा कर गिरफ़्तार करवा रहे हैं। जब तक मज़दूरों को उनके फ़ोन वापस नहीं मिलते, उनके पास न पैसे हैं और न दस्तावेज़। वे उस पुलिस थाने और फ़ैक्टरी के बीच फंसे हैं, जहां अब भी प्रताड़ना जारी है।
क्या अब अपने फ़ोन तक पहुंच इंसानी अधिकार बन चुकी है? क्या मज़दूरों के फ़ोन वापस न करना उनके मानवाधिकारों का उल्लंघन है? अब इस मुद्दे को इसी नज़र से देखा जा रहा है।
अभिव्यक्ति की आज़ादी पर संयुक्त राष्ट्र के विशेष दूत लंबे समय से कहते रहे हैं कि डिजिटल संवाद के साधनों तक पहुंच, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और सार्वजनिक जीवन में भागीदारी के अधिकार से अलग नहीं की जा सकती।
भारत के सुप्रीम कोर्ट ने भी 2020 में अनुराधा भसीन मामले में माना था कि इंटरनेट तक पहुंच का अधिकार, संविधान के अनुच्छेद 19 और अनुच्छेद 21 से जुड़ा है। अनुच्छेद 19 अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की गारंटी देता है, जबकि अनुच्छेद 21 जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा करता है।
इस देश में और इस दौर में फ़ोन सिर्फ़ एक गैजेट नहीं है। यह किसी व्यक्ति की अपनी रकम, पहचान, स्वास्थ्य सेवाओं और परिवार तक पहुंच का ज़रिया है।
हिरासत में लिए गए मज़दूरों पर किसी अपराध का आरोप तय नहीं किया गया था। जिन क़ानूनों का इस्तेमाल उनके ख़िलाफ़ किया गया, वे साफ़ तौर पर एहतियाती हैं। इनमें न आपराधिक दोष सिद्ध होता है, न मुक़दमा चलता है और मजिस्ट्रेट के आदेश के बिना 24 घंटे के भीतर रिहाई ज़रूरी है। मज़दूर क़ानूनी तौर पर आज़ाद होकर बाहर आए, हालांकि उन्हें 24 घंटे की जगह पांच से सात दिन तक हिरासत में रखा गया। लेकिन पुलिस अब भी उनका सामान अपने पास रखे हुए है।
एक गर्भवती महिला अल्ट्रासाउंड का इंतज़ार कर रही है, जिसका ख़र्च वह अपने फ़ोन के बिना नहीं उठा सकती। शायद इतना सुनना ही काफ़ी होना चाहिए।
(राखी सहगल, लेबर रिसर्चर हैं। यह लेख स्क्रॉल वेबसाइट पर छह मई को प्रकाशित हुआ था, जहां से साभार छापा जा रहा है। सभी तस्वीरें सोशल मीडिया से ली गई हैं।)
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