नोएडा में गिरफ़्तार 300 लोगों को सीधे जेल भेजा, बुधवार को और क्या कुछ हुआ

नोएडा में गिरफ़्तार 300 लोगों को सीधे जेल भेजा, बुधवार को और क्या कुछ हुआ

(एडवोकेट विनोद भाटी, एडवोकेट वर्तिका, एडवोकेट सूर्य प्रकाश)

बीते सोमवार को नोएडा में मज़दूरों के व्यापक विरोध प्रदर्शन के बाद गिरफ़्तार सैकड़ों लोगों के परिजन बुधवार को दरदर भटकते रहे।

मज़दूरों और मज़दूर अधिकार कार्यकर्ताओं को छुड़ाने के लिए वालंटियर वकीलों ने एक पैनल गठित किया है और ग्रेटर नोएडा के सूरजपुर स्थित मजिस्ट्रेट कोर्ट से ज़मानत दिलाने के प्रयास किए जा रहे हैं।

बुधवार को जब वर्कर्स यूनिटी की टीम सीजेएम कोर्ट पहुंची तो वहां मौजूद वकीलों के पैनल और कई सामाजिक कार्यकर्ता मिले।

इस पैनल का कोआर्डिनेशन एक्टू से जुड़े वकील सूर्य प्रकाश कर रहे हैं, जिन्होंने बताया कि गिरफ़्तार किए गए कुछ लोगों के परिजन ढूंढते हुए सीजेएम कोर्ट आए थे। उनके संपर्क में ऐसे क़रीब एक दर्जन लोग हैं।

उन्होंने बताया कि गिरफ़्तार लोगों में से एक मज़दूर के परिजन के पास पुलिस का एक नोटिस आया है जिसमें 50,000 रुपये मुचलका भरने की बात कही गई है।

सूर्य प्रकाश के मुताबिक़, सीजेएम कोर्ट में मज़दूरों को छुड़ाने की कोशिश का काम एडवोकेट विनोद भाटी देख रहे हैं।

गिरफ़्तार एक मज़दूर के परिजन को यह नोटिस भेजा गया है।

विनोद भाटी ने बताया कि सूरजपुर सीजेएम कोर्ट से अभी तक किसी को न्यायिक हिरासत में नहीं दिया भेजा गया है।

उन्होंने कहा, “तीन चार दिन से पुलिस लोगों को बंद कर रही है। वो न तो कोई सूचना कोर्ट को दे रहे हैं, न तो घरवालों को बता रहे हैं। तक़रीबन 300 से 400 लोगों को गिरफ़्तार किया गया है।”

मंगलवार को गौतम बुद्ध पुलिस कमिश्नर लक्ष्मी सिंह ने बताया है कि 300 से अधिक लोगों को गिरफ़्तार किया गया है और सोशल मीडिया पर आए वीडियो के माध्यम से पहचान करके और गिरफ़्तारियां हो रही हैं।

विनोद भाटी ने कहा, “नोएडा में पुलिस कमिश्नर मैम (लक्ष्मी सिंह) की तानाशाही है। इसमें उन्हीं का पूरा रोल है और उन्हीं के आदेश से ये सबकुछ हुआ है।”

वकीलों के पैनल से पता चला कि सभी गिरफ़्तार लोगों को कासना जेल में रखा गया है।

apoorva Noida
एक्टू से जुड़ीं मज़दूर अधिकार कार्यकर्ता अपूर्वा ने बताया कि कई मज़दूरों को बिना किसी कारण गिरफ़्तार किया गया। कोई घर जा रहा था, कोई दवा लेने।

गिरफ़्तार मज़दूरों को कोर्ट में पेश नहीं किया

मानवाधिकार संगठन से जुड़ी एडवोकेट वर्तिका ने वर्कर्स यूनिटी को बताया कि 24 घंटे से अधिक समय होने के बावजूद सीजेएम कोर्ट में पेश न किये जाने से यही पता चलता है कि सभी मज़दूरों की गिरफ़्तारी प्रिवेंटिव डिटेंशन के तहत की गई है।

उन्होंने कहा कि प्रिवेंटिव डिटेंशन का अर्थ यह है कि पुलिस अपने अधिकार का इस्तेमाल करके बिना न्यायालय में पेश किये किसी को भी 14 दिन तक जेल भेज सकती है।

विनोद भाटी ने कहा कि 14-14 दिन बढ़ाते हुए यह प्रिवेंटिव डिटेंशन छह माह तक खींचा जा सकता है और इसके लिए पुलिस का तर्क ये हो सकता है कि इन्हें छोड़ने से हालात फिर बिगड़ जाएंगे। यह पुलिस कमिश्नर की मर्ज़ी पर है कि मज़दूर कितने दिनों तक जेल में रहेंगे।

मज़दूर अधिकार कार्यकर्ता राखी सहगल ने बताया कि 12-13-14 तीन दिनों तक गिरफ़्तारी हुई है लेकिन, इन तीनों दिन में पुलिस ने किसी भी मज़दूर को ज्यूडिशियल रिमांड के लिए कोर्ट में पेश नहीं किया। गिरफ़्तार लोगों के संबंध में कोर्ट से अभी तक कोई सूचना नहीं मिल पाई है।

विनोद भाटी के अनुसार, “लोगों को किन किन धाराओं में बंद किया गया है ये भी नहीं बता रहे हैं। पुलिस को बताना चाहिए कि जो लोग लापता हैं, वो कहां हैं।”

आंदोलन कैसे हिंसक हुआ

एक्टू से जुड़ी मज़दूर अधिकार कार्यकर्ता अपूर्वा ने वर्कर्स यूनिटी को बताया कि यह पूरा मामला आठ अप्रैल से शुरू होता है जब सैलरी बढ़ाने को लेकर फ़ेज़-2 के होज़री और गार्मेंट क्लस्टर्स में मज़दूर प्रदर्शन करते हैं। इसके बाद 12 तारीख़ को भी काफ़ी विरोध प्रदर्शन होता है।

पुलिस ने 12 अप्रैल को ही मज़दूर संगठन बिगुल के कार्यकर्ताओं को सादे कपड़े में नोएडा से शाम 5-5.30 बजे उठा लिया था।

अपूर्वा के अनुसार, 13 अप्रैल को जब मज़दूर फ़ैक्ट्री से निकल कर सड़क पर आ गए तो मदरसन और अन्य कंपनियों के मज़दूर भी फ़ैक्ट्रियों से निकल कर आ गए।

कुछ मज़दूरों ने नाम न ज़ाहिर करने की शर्त पर वर्कर्स यूनिटी को बताया कि पुलिस ने बल प्रयोग किया, जिसके बाद आंदोलन भड़क गया और पुलिस की गाड़ियों को लोगों ने निशाना बनाना शुरू कर दिया।

सेक्टर 63, वो जगह जहां काफ़ी संख्या में मज़दूर इकट्ठा होकर एनएच-24 को जाम कर दिया था, वहां के कुछ मज़दूरों ने बताया कि सबसे पहले लोगों ने फ़ैक्ट्रियों के गेटों पर लगे कैमरों को निशाना बनाया। पुलिस ने लाठी चार्ज किया और आंसू गैस के गोले दागे तो मज़दूरों ने उन पर पत्थर फेंक कर उन्हें भागने को मज़बूर किया।

आक्रोशित मज़दूरों ने सेक्टर 63 में स्थित मारुति के एक शोरूम के सामने रखी कई गाड़ियों को आग के हवाले कर दिया।

फ़ेज़-2 में कई फ़ैक्ट्रियों के हज़ारों मज़दूर एक साथ आ गए और यहां से स्थिति बिगड़नी शुरू हो गई थी।

इस बीच राज्य की योगी सरकार ने नोएडा और गाज़ियाबाद में न्यूनतम मज़दूरी में बढ़ोत्तरी का आदेश दिया है जिसके अनुसार, अकुशल मज़दूरों को 13,690 रुपये, अर्धकुशल मज़दूर को 15,059 और कुशल मज़दूर को 16,868 रुपये दिया जाएगा। इसमें मूल वेतन और महंगाई भत्ता शामिल है।

हालांकि मज़दूर कम से कम 20,000 रुपये सैलरी की मांग कर रहे हैं और राहुल गांधी समेत कई विपक्षी दलों ने इसका समर्थन किया है। केंद्रीय ट्रेड यूनियनें कई महीनों से 26,000 रुपये सैलरी करने की मांग कर रही हैं।

बुधवार की शाम नोएडा सेक्टर 63 में मज़दूर काम से लौटते हुए। एक मज़दूर ने बताया कि सोमवार की तुलना में यह संख्या बहुत कम है।

बुधवार को कैसा रहा माहौल?

मज़दूरों की भीड़ से ठस रहने वाला नोएडा औद्योगिक क्षेत्र बुधवार को लगभग सुनसान जैसा दिख रहा था। दोपहर दो बजे के आसपास सभी सेक्टरों में पुलिस और पीएसी बल तैनात थे।

सेक्टर 62 से लेकर ग्रेटर नोएडा के सूरजपुर तक चौराहों और फ़ैक्ट्री वाले इलाक़े में पुलिस की कड़ी निगरानी जारी थी। ग्रेटर नोएडा के कई फ़ैक्ट्रियों के सामने दो दो चार चार की संख्या में पुलिस तैनात थी।

नोएडा सेक्टर 63 में आम तौर पर ढाई बजे के आसपास लंच के लिए भारी भीड़ जमा होती है। बुधवार को कुछ ऐसा नज़ारा रहा।

वर्कर्स यूनिटी की टीम जब दोपहर में सेक्टर 63 के इलाक़े में पहुंची तो सॉफ़्टवेयर कंपनी में काम करने वाले एक कर्मचारी ने कहा कि सैलरी एक बड़ा मुद्दा है। नाम न ज़ाहिर करते हुए उसने बताया कि आज सॉफ़्टवेयर इंजीनियरों की हालत ये है कि शुरू में उन्हें 15 हज़ार रुपये सैलरी दी जाती है और कई जगह तो इंटर्नशिप के नाम पर मुफ़्त में काम कराया जाता है।

कुछ मज़दूरों ने बताया कि वे बुधवार को कंपनी पहुंचे थे लेकिन किसी भी तरह की सैलरी बढ़ोत्तरी के बारे में कंपनी मालिक की ओर से पूरी खामोशी थी। उन्होंने कहा कि उन्हें नहीं लगता कि कोई सैलरी बढ़ने जा रही है।

उन्होंने बताया कि बुधवार को फ़ैक्ट्रियों में बहुत कम वर्कर पहुंचे। साथ ही ये भी बताया कि बुधवार को सेक्टर 63 फ़ैक्ट्री इलाक़े में चप्पे चप्पे पर पुलिस लगी हुई थी। पुलिस ने सड़क किनारे ठेला और रेहणी वालों को भी अपनी दुकान नहीं लगाने दी।

एक रेहड़ी वाले ने बताया कि बहुत से मज़दूरों ने नोएडा छोड़ दिया और गांव चले गए हैं। यही हालात रहे तो उन्हें भी नोएडा छोड़ना पड़ सकता है।

हालांकि कुछेक कंपनियों ने वेतन बढ़ोत्तरी का स्वागत करते हुए मज़दूरों के लिए अपील जारी की है। लेकिन यह इक्का दुक्का कंपनियों में हुआ है।

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Workers Unity Team

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