सैलरी का ग़ुस्सा, नोएडा प्रोटेस्ट एक ख़तरे की घंटी क्यों है? नज़रिया
नोएडा वर्कर्स प्रोटेस्ट का कारण स्थानीय है लेकिन अपने अर्थ में यह राष्ट्रीय भी हैः कि सैलरी से जुड़ी हर घटना अब क्यों एक साज़िश बताई जाएगी?
13 अप्रैल, 2026 को, दिल्ली से सटे नोएडा में, जहाँ 10,000 से अधिक कारखाने और सर्विस यूनिटें हैं, सत्ताधारी दल के मन में लंबे समय से चले आ रहे डर वाले दृश्य देखने को मिले।
एक के बाद हुए जनउभार में फ़ैक्ट्रियों से हज़ारों मज़दूर सड़कों पर उतर गए, जोकि इससे तीन पहले ही शुरू हुआ था, उसके बाद पूरे औद्योगिक क्षेत्र में फैल गया।
उनकी मांगें बहुत बुनियादी थीं: जीवन यापन लायक सैलरी, आठ घंटे की ड्यूटी और वैश्विक सप्लाई चेन में इस्तेमाल करके फेंक दिए जाने वाले किसी माल की बजाय उनके साथ इंसानों जैसा व्यवहार हो।
नोएडा के अधिकांश वर्कर प्रवासी मज़दूर हैं जिन्हें निजी एजेंसियों के माध्यम से अस्थायी कांट्रैक्ट पर काम पर रखा जाता है। ये एजेंसियां उनकी पहले से ही कम मज़दूरी का एक हिस्सा अपने पास रख लेती हैं। इनमें महिलाओं की संख्या काफ़ी अधिक है।
टीसीएस, एचसीएल, सैमसंग, श्याओमी, माइक्रोसॉफ्ट और कई यूरोपीय ब्रांड के लिए मोबाइल फ़ोन, ऑटोमोबाइल पुर्जे, दवाएं, कपड़े और इलेक्ट्रॉनिक सामान बनाने वाली भारतीय और बहुराष्ट्रीय कंपनियों में ये वर्कर काम करते हैं।
माल का निर्यात होता है, मुनाफा ऊपर की ओर चढ़ता है; जबकि वर्करों के हिस्से लगभग 11,000 से 13,000 रुपये प्रति माह आते हैं, जिसे वे 12 घंटे की हाड़तोड़ शिफ्ट करके कमा पाते हैं।
अक्सर उन्हें भविष्य निधि (पीएफ़), कर्मचारी राज्य बीमा (ईएसआई), नौकरी की सुरक्षा या संगठित (यूनियन बनाने) होने का अधिकार नहीं मिलता।
ताज़ा मामले में प्रशासन की प्रतिक्रिया बहुत फुर्ती वाली और बहुत कठोर थी। कुछ ही घंटों में सैकड़ों वर्करों हिरासत में ले लिया गया। गिरफ़्तारी के समय उन्हें पीटा गया, सड़कों पर घसीटा गया। इनमें महिला और पुरुष वर्कर दोनों थे।
15 अप्रैल तक लगभग 300 वर्करों को गिरफ़्तार किया जा चुका था और तब से गिरफ़्तारियां जारी रहीं। ट्रेड यूनियन नेताओं को नज़रबंद कर दिया गया और आसपास किसी निजी काम से निकले लोगों को भी गिरफ़्तार कर लिया गया। सरकार ने अपना पक्ष चुन लिया था, और यह मज़दूरों का पक्ष नहीं था।

मांगों पर ध्यान देने के बजाय, बीजेपी ने अपनी पुरानी टैक्टिस अपनाई: यानी साज़िश का थ्योरी पेश करना।
उत्तर प्रदेश के श्रम मंत्री अनिल राजभर ने कहा कि एजेंसियां इस अशांति के पीछे ‘पाकिस्तान कनेक्शन’ की जांच कर रही हैं। मुख्यमंत्री आदित्यनाथ ने चेतावनी दी कि ‘गुमराह करने वाले और विघटनकारी तत्व’ नक्सलवाद को पुनर्जीवित करने का प्रयास कर सकते हैं।
नोएडा पुलिस कमिश्नर लक्ष्मी सिंह ने बिना कोई सबूत पेश किए हिंसा को ‘दुर्भावनापूर्ण, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर संगठित गतिविधि’ बताया।
मज़दूर बिगुल दस्ता के मज़दूर कार्यकर्ता मनीषा चौहान, रूपेश राय और आदित्य आनंद को गिरफ़्तार कर लिया गया और मज़दूरों की स्थिति को उजागर करने वाले भाषणों और सोशल मीडिया पोस्ट के लिए उन्हें ‘मुख्य साजिशकर्ता’ करार दे दिया गया।
आर्थिक मुद्दों पर विरोध को राष्ट्रीय सुरक्षा ख़तरे में बदलना कोई अपवाद नहीं, बल्कि एक नॉर्मल बात बन चुकी है।
यह एक ऐसे शासन की नज़ीर है जिसने वर्करों के अधिकारों की रक्षा का दावा करते हुए उन्हें लगातार कमज़ोर किया है। कम सैलरी पाने वाले मज़दूरों पर विदेशी साज़िश का आरोप लगाना न केवल झूठा है, बल्कि यह सोची-समझी अवमानना है।
वर्करों को महंगाई का सामना न कर पाने वाली सैलरी या 12 घंटे के कार्यदिवस का विरोध करने के लिए उकसावे की ज़रूरत नहीं है। असली साज़िश इस्लामाबाद में नहीं, बल्कि लखनऊ और नई दिल्ली में स्थित नियम क़ानून बनाने वाली संस्थाओं (विधायी) और प्रशासनिक सत्ता केंद्रों में है।
अमानवीय शोषण
नोएडा प्रोटेस्ट कोई अचानक हुई घटना नहीं थी। यह केंद्र में बीजेपी के एक दशक से अधिक के शासन और उत्तर प्रदेश में आदित्यनाथ के नेतृत्व में लंबे समय से इकट्ठा हो रहे बिगड़ते हालात का परिणाम है, जहां ‘विकास’ का मतलब ही विरोध को दबाना है।
यहां ढांचागत समस्या सीधी-सी है: मज़दूरी में हुई मामूली वृद्धि, ज़रूरी सामानों की बढ़ती क़ीमतों से तालमेल नहीं बिठा पाई।
भारत के औद्योगिक क्षेत्रों में, वर्करों का बड़ा हिस्सा टेंपरेरी कांट्रैक्ट वाली नौकरियों में धकेला जा रहा है। इन्हें बुनियादी क़ानूनी सुरक्षा – पीएफ़, ईएसआई, ग्रेच्युटी और नियमित कार्य घंटे से वंचित रखा गया है।
ईरान जंग के कारण बढ़ती महंगाई के दबावों के चलते खाना पकाने की गैस की क़ीमतों में हाल ही में हुई बढ़ोत्तरी निर्णायक मोड़ साबित हुई।
लगभग 11,000 रुपये प्रति माह कमाने वाले वर्करों के लिए, खाना पकाने की गैस का एक सिलेंडर अब उनकी आमदनी का एक असहनीय हिस्सा बन गया है, जिससे बुनियादी जीवन यापन करना लगभग असंभव हो गया है।
भौगोलिक स्थिति के कारण इसका प्रभाव और भी तेज़ हो गया। इससे पहले नौ अप्रैल को हरियाणा सरकार ने न्यूनतम मज़दूरी में लगभग 35 प्रतिशत की वृद्धि की थी, जिससे अकुशल वर्करों की मज़दूरी 11,274 रुपये से बढ़कर 15,220 रुपये प्रति माह हो गई।
वहीं उत्तर प्रदेश में एक अप्रैल से लागू संशोधित मज़दूरी दर काफी कम थी। नोएडा के वर्करों ने एक स्वाभाविक प्रश्न पूछा: गुरुग्राम में काम करने वाले एक वर्कर की मज़दूरी नोएडा में उसी काम को करने वाले वर्कर से 6,000 रुपये अधिक कैसे हो सकती है?
नोएडा एक व्यापक घटनाक्रम का सिर्फ़ एक हिस्सा था। हाल के महीनों में, हरियाणा के फ़रीदाबाद, पानीपत स्थित इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन रिफ़ाइनरी, सूरत के हाजिरा स्थित आर्सेलरमित्तल निप्पॉन स्टील परियोजना और बिहार के बरौनी में भी इसी तरह के विरोध प्रदर्शन हुए हैं।
फ़रवरी 2026 में पानीपत में, 12-12 घंटे की शिफ्ट में काम करने वाले और देरी से मिलने वाली सैलरी का इंतज़ार कर रहे 30,000 से अधिक ठेका मज़दूर, एक दुर्घटना के बाद अचानक काम छोड़कर हड़ताल पर चले गए।
इन मज़दूरों पर अर्धसैनिक बलों ने लाठीचार्ज भी किया। फ़रीदाबाद में अप्रैल के मध्य में सड़कों पर उतरने पर मदरसन सुमी सिस्टम्स के वर्करों पर भी लाठीचार्ज हुआ।
यह कोई छिटपुट घटना नहीं है; यह वर्करों द्वारा अपने अधिकारों और गरिमा को बहुत व्यवस्थित तौर पर ख़त्म करने के ख़िलाफ़ राष्ट्रव्यापी विरोध प्रदर्शन है।

मानेसर का भूत
नोएडा के वर्करों के हालात को समझने के लिए, नोएडा से 50 किलोमीटर दूर हरियाणा के मानेसर की ओर देखना ही काफी है, जहाँ भारत के सबसे प्रतिष्ठित मज़दूर संघर्ष की छाया आज भी औद्योगिक क्षेत्र पर मंडरा रही है।
मारुति सुज़ुकी के वर्करों की कहानी इस बात का साफ़ उदाहरण है कि जब संगठित वर्कर पूंजीपतियों से टकराते हैं तो क्या होता है: वर्कर-विरोधी राज्य का असली चेहरा सामने आ जाता है।
2011 में शुरू होकर, मानेसर प्लांट के वर्करों ने कठोर परिस्थितियों, ठेकेदारी प्रथा और यूनियन को मान्यता न दिए जाने के ख़िलाफ़ लगातार संघर्ष किया।
तीन बड़ी हड़तालों के बाद उन्होंने मैनेजमेंट को मारुति सुजुकी वर्कर्स यूनियन को मान्यता देने के लिए मजबूर किया। इन हड़तालों में से दो में फ़ैक्ट्री पर कब्ज़ा करना भी शामिल था।
चार महीने के भीतर ही इसका उल्टा असर दिखने लगा। 18 जुलाई, 2012 को एक घटना घटी, जब फ़ैक्ट्री में हुई झड़प में एक एचआर मैनेजर की मृत्यु हो गई। इसे बहाना बनाया गया।
सैकड़ों यूनियन कार्यकर्ताओं को गिरफ़्तार कर लिया गया। 546 टेंपरेरी वर्करों को बर्ख़ास्त कर दिया गया और लगभग 1,800 ठेका मज़दूरों को काम से निकाल दिया गया।
यानी लगभग फ़ैक्ट्री में काम करने वाले लगभग सारे मज़दूरों को बेदर कर दिया गया। कांग्रेस और बाद में बीजेपी के शासनकाल में हरियाणा सरकार कंपनियों के एक साधन के रूप में काम करती रही।
मार्च 2017 में, लगभग पाँच सालों की कैद और एक व्यापक रूप से विवादित मुकदमे के बाद, 13 वर्कर नेताओं को आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई। इस फैसले को कई लेबर एक्सपर्ट्स और क़ानूनी विशेषज्ञों ने न्यायिक साज़िश करार दिया है।

गिरफ़्तार किए गए 148 वर्करों में से 117 को अंततः बरी कर दिया गया, लेकिन उन्हें जेल में कई साल बिताने, आर्थिक संकट और पारिवारिक तबाही का सामना करने के बाद ही बरी किया गया।
दो दोषी वर्कर, पवन दहिया और जिया लाल, 2021 में मर गए। दहिया की मृत्यु महामारी के दौरान अस्थायी रिहाई के दौरान घर पर बिजली के झटके से हुई, जबकि जिया लाल की मृत्यु कैंसर से हुई जिसका पता कैद के दौरान नहीं चल पाया था।
हालांकि बाकी 11 मज़दूर नेता ज़मानत पर बाहर हैं और कोर्ट में जारी अपील की अनिश्चितता में जी रहे हैं।
सितंबर 2024 में, मारुति के निकाले गए कर्मचारियों ने 12 साल बाद बहाली की मांग को लेकर कारखाने के गेट के पास अनिश्चितकालीन धरना शुरू कर दिया।
कांग्रेस, बीजेपी और आम आदमी पार्टी सहित सभी प्रमुख दलों ने मामले के अदालत में होने का हवाला देते हुए अपनी बेबसी ज़ाहिर की।
केंद्र और हरियाणा दोनों में सत्ता में रही बीजेपी ने इस लंबे अन्याय को अनदेखा किया और 2024 के राज्य विधानसबा चुनावों के दौरान केवल अस्पष्ट आश्वासन दिए।
वे आश्वासन जल्द ही हवा हो गए। जनवरी 2025 तक, हरियाणा पुलिस ने धरना स्थल खाली करा दिया था।
मानेसर से संदेश बिल्कुल स्पष्ट है: संगठित होओगे तो कुचल दिए जाओगे; अपने अधिकारों का दावा करोगे तो अपराधी घोषित कर दिए जाओगे; अड़े रहोगे तो तुम्हारी पीड़ा को एक चेतावनी में बदल दिया जाएगा।
अप्रैल 2026 में नोएडा में हुई गिरफ़्तारियां दिखाती हैं कि यह संदेश आज भी वैसा ही है, बदला नहीं है।
लेबर कोड यानी श्रम संहिता की चालबाज़ी
नोएडा और मानेसर में ज़मीनी स्तर पर हो रहा दमन एक गहरे, सुनियोजित हमले का मात्र एक छोटा सा हिस्सा है।
21 नवंबर, 2025 को बीजेपी सरकार ने चार लेबर कोड्स यानी श्रम संहिताएं लागू कीं, जिनमें एक सदी से अधिक के मज़दूर संघर्ष के ज़रिये बने 29 केंद्रीय श्रम क़ानून समेट दिए गए।
ये संहिताएं सितंबर 2020 में बिना किसी बहस के संसद में पारित की गई थीं, उसी दिन जब कृषि क़ानूनों के विरोध में विपक्षी सांसदों को निलंबित कर दिया गया था।
यह संसदीय बहुमत का एक ऐसा उदाहरण था जिसने विचार-विमर्श, त्रिपक्षीय परामर्श और संघीय मानदंडों को दरकिनार कर दिया।
वेतन संहिता, औद्योगिक संबंध संहिता, सामाजिक सुरक्षा संहिता और व्यावसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य एवं कार्य परिस्थितियाँ संहिता – इन चारों संहिताओं को ‘सरलीकरण’ के रूप में पेश किया गया था।
असल में, ये संहिताएँ कंरनियों को मनमानी करने की छूट देती हैं। मनमानी सीमाएँ लागू की गईं, जिससे मज़दूरों का बड़ा हिस्सा बुनियादी सुरक्षा से वंचित हो जाता है।
फ़िक्स टर्म के रोज़गार को सामान्य बना दिया गया है, जिससे परमानेंट होने का सिद्धांत ही ख़त्म हो जाता है; हड़ताल का अधिकार और भी सीमित कर दिया गया है; फ़ैक्ट्री में इंसपेक्शन को कमज़ोर कर दिया गया है; और मज़दूर यूनियनों को मान्यता देना और भी कठिन बना दिया गया है।
श्रम क़ानून का उल्लंघन करने पर जो सज़ा होती थी, उसे अब सिर्फ ज़ुर्माने में तब्दील कर दिया गया है।
इस उलटफेर का असर इसके विरोध से साफ ज़ाहिर होता है। यहां तक कि बीजेपी के संघ परिवार के भीतर ही स्थित ट्रेड यूनियन संगठन, भारतीय मजदूर संघ ने भी इसका विरोध किया।
विभिन्न विचारधाराओं के यूनियनों का प्रतिनिधित्व करने वाले केंद्रीय ट्रेड यूनियनों के संयुक्त मंच ने इन संहिताओं की कड़ी निंदा करते हुए इन्हें वर्करों की आजीविका पर विनाशकारी हमला और मालिक-सेवक व्यवस्था की ओर वापसी बताया।
यह महज़ बयानबाजी नहीं, बल्कि भारत में श्रम क़ानून के लंबे ऐतिहासिक अनुभव रखने वाली यूनियनों का सोच समझकर बताया गया आकलन है।
बीजेपी का 2014 का ‘अच्छे दिन’ का वादा पूरा हो गया है, लेकिन कंपनियों के लिए, मज़दूरों के लिए नहीं।
श्रम संहिताएं रातोंरात नहीं बनीं; ये बीजेपी शासित राज्यों में एक दशक से चल रहे राज्य स्तरीय प्रयोगों का परिणाम हैं।
2014 में वसुंधरा राजे के नेतृत्व में राजस्थान ने कारखाना अधिनियम, कांट्रैक्ट लेबर अधिनियम और औद्योगिक विवाद अधिनियम को ढीला कर दिया, जिससे लाखों वर्कर क़ानूनी दायरे से बाहर चले गए।
विश्लेषकों के अनुसार, बीजेपी शासित अन्य राज्यों – उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, गुजरात, महाराष्ट्र, हरियाणा और कर्नाटक – ने भी इसी राह पर चलते हुए, निवेश आकर्षित करने के लिए श्रम मानकों में गिरावट की होड़ मचा दी।
सबसे सस्ते और सबसे कम सुरक्षित मज़दूर मुहैया कराने के लिए अंतर-राज्यीय हो़ड़ इस शासन प्रणाली का केंद्र बन गई है, जिसे ईज़ी ऑफ़ डूईंग बिज़नेस यानी “धंधा करने में सुगमता” के रूप में पेश किया जा रहा है।
उत्तर प्रदेश में, इस ढांचे पर आदित्यनाथ की छाप साफ़ तौर से दिखाई देती है।
नोएडा सहित औद्योगिक क्षेत्र में स्थित इस राज्य ने मज़दूरों पर नियंत्रण के लिए लगातार पुलिस का इस्तेमाल किया है।
हड़ताली मज़दूरों पर सार्वजनिक व्यवस्था भंग करने का आरोप लगाया जाता है; वहीं उनका समर्थन करने वाले कार्यकर्ताओं को साज़िशकर्ता करार दिया जाता है।
लखनऊ से संदेश बिल्कुल साफ़ है: राज्य में कामकाज खुला है और मज़दूरों से इसका पालन करने की उम्मीद की जाती है।

वर्ग एकजुटता का अपराधीकरण
13 अप्रैल के बाद के हफ्तों में, नोएडा पुलिस ने अपना दायरा प्रदर्शनकारी मज़दूरों से बढ़ाकर युवा कार्यकर्ताओं, छात्रों और यहां तक कि प्रोटेस्ट को प्रचारित करने वाले सोशल मीडिया यूज़र्स तक कर लिया।
वर्कर अधिवक्ताओं को “मुख्य साजिशकर्ता” और “सहयोगी” करार दिया गया, गैर-ज़मानती वारंट जारी किए गए और ट्रेड यूनियन नेताओं को निगरानी में या नज़रबंद रखा गया।
जन हस्तक्षेप जैसे मानवाधिकार समूहों ने हिरासत में लिए गए लोगों की रिहाई और मामलों को वापस लेने की मांग की है, लेकिन सरकारी सिस्टम उचित क़ानूनी प्रक्रिया को लेकर काफ़ी उदासीन बना हुआ है।
यह दमन क़ानून-व्यवस्था बहाल करने के बारे में नहीं है; इसका मक़सद लोगों को रोकना है। गिरफ्तारियाँ राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के मज़दूरों, आयोजकों और एकजुटता नेटवर्कों को यह संकेत देती हैं कि प्रतिरोध करने पर अपराधीकरण किया जाएगा।
तोड़फोड़, आगजनी और विदेशी संबंधों के आरोप क़ानूनी दावों से ज़्यादा डराने-धमकाने के औजार के रूप में काम करते हैं, ताकि जब वेतन स्थिर हो और काम के घंटे बेहिसाब बढ़ जाएँ, तो वर्कर सड़कों पर उतरने से पहले घबराएं।
नोएडा प्रोटेस्ट बीजेपी के एक दशक के शासन का आईना है। यह एक ऐसे आर्थिक मॉडल को दिखाता है जो सस्ते, आसानी से इस्तेमाल किए जा सकने वाले और बिना अधिकार वाले मज़दूरों पर आधारित है।
यह एक ऐसी राजनीतिक व्यवस्था का प्रतीक है जो संवैधानिक रूप से अपनी मांगों को उठाने वाले ग़रीबों को अपराधी ठहराती है; और एक ऐसे सुरक्षा तंत्र का द्योतक है जो कंपनी मालिकों को जवाबदेह ठहराने की बजाय उन्हें बचाती है।
नोएडा के मज़दूर—मानेसर, फ़रीदाबाद, सूरत, पानीपत और बरौनी के मज़दूरों की तरह—कोई उथल-पुथल नहीं चाहते।
वे जीवनयापन के लिए पर्याप्त वेतन, आठ घंटे का कार्यदिवस और यूनियन बनाने का अधिकार मांग रहे हैं—ये मांगें अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन द्वारा लंबे समय से मान्यता प्राप्त हैं और भारत की संवैधानिक और लोकतांत्रिक परंपरा में निहित हैं।
लेकिन सरकार का जवाब, चाहे नवंबर 2025 में हो या अप्रैल 2026 में, हमेशा बल प्रयोग ही रहा है।
14 अप्रैल को उत्तर प्रदेश सरकार ने गौतम बुद्ध नगर और गाजियाबाद में लगभग 21 प्रतिशत की अंतरिम वेतन वृद्धि की घोषणा की, जिससे अकुशल श्रमिकों का मासिक वेतन 11,313 रुपये से बढ़कर 13,690 रुपये हो गया।
18 अप्रैल को संशोधित न्यूनतम मज़दूरी को पूरे राज्य में मंजूरी दे दी गई। मज़दूरों ने विरोध जताया कि यह संशोधन अभी भी हरियाणा की दरों से काफ़ी कम है और विरोध प्रदर्शन जारी रहे, जिसमें 16 अप्रैल से घरेलू कामगार भी शामिल हो गए।
दरअसल, यह रियायत भी बातचीत के माध्यम से नहीं, बल्कि दबाव के बल पर हासिल की गई थी।
अंतर्राष्ट्रीय मज़दूर दिवस 2026 के करीब आते ही, यह सवाल उठना लाज़मी हो गया कि भारतीय राज्य किसके हितों की सेवा करता है?
नोएडा के मज़दूरों ने, अपनी बात को साबित करने के लिए चोटों और गिरफ्तारियों के साथ, अपना निष्कर्ष निकाल लिया है।
अब देश के बाकी हिस्सों को यह तय करना होगा कि वे इस मुद्दे का सामना करें या नहीं।
(नोट: यह लेख 9 मई को भारत की प्रतिष्ठित अंग्रेज़ी पत्रिका फ़्रंटलाइन में प्रकाशित हुआ था, जिसका अनुवाद यहां साभार प्रकाशित किया जा रहा है।
लेखक नोएडा और मानेसर में गिरफ्तार किए गए सभी मज़दूरों के साथ एकजुटता से खड़े हैं। सभी गिरफ़्तार लोगों को बिना शर्त रिहा किया जाना चाहिए और उनके ख़िलाफ़ सभी आरोप तुरंत वापस लिए जाने चाहिए।)
आनंद तेलतुंबडे पेट्रोनेट इंडिया लिमिटेड (पीआईएल) के पूर्व सीईओ, आईआईटी खड़गपुर और गोवा इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट में प्रोफेसर, एक नागरिक अधिकार कार्यकर्ता और 30 से अधिक पुस्तकों के लेखक हैं।
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