नोएडा औद्योगिक प्रदर्शन और वर्किंग क्लास की नई पावर- नज़रिया

नोएडा औद्योगिक प्रदर्शन और वर्किंग क्लास की नई पावर- नज़रिया

By सरोज गिरी

हम आज एक नई तरह की मज़दूर ताक़त यानी वर्कर्स पावर के गवाह बन रहे हैं। सामूहिक वार्ता (कलेक्टिव बार्गेनिंग) की जगह सामूहिक एक्शन, डायरेक्ट ऐक्शन (सीधे विरोध प्रदर्शन) ने ले ली है।

वर्कर पावर का उग्र रूप किसी भी तरह की मध्यस्थता को बर्दाश्त नहीं करता। जो बात ख़ास है, वह है मध्यस्थता का पूरी तरह ग़ायब हो जाना, चाहे वह यूनियनें हों, लेबर कमिश्नर्स, राजनीतिक दल, सिविल सोसायटी, अदालतें, कार्यकर्ता, एनजीओ या दूसरे नामचीन लोग हों।

हां, अगर बाद में इन मध्यस्थों को नुक़सान को कंट्रोल और सीमित करने के लिए शामिल किया जाए तो बात अलग है।

13 अप्रैल 2026 को नोएडा में हुए बड़े पैमाने पर असंतोष और हिंसक प्रोटेस्ट्स को देखें। नेता, वार्ताकार और यूनियनों की जगह, यूपी में योगी आदित्यनाथ की सरकार ने प्रोटेस्ट्स के पीछे “उकसाने वालों” और “साज़िश करने वालों” का हाथ बताया है।

कई मनमानी गिरफ़्तारियां की गई हैं। लेकिन जिस तरह सरकार ने आनन फानन में ही न्यूनतम वेतन बढ़ाने पर रज़ामंदी दे दी, इन प्रदर्शनों की ताक़त और कच्चेपन को दिखाता है।

इसकी पड़ताल करनी चाहिए और इसे बारीक़ नज़र से देखना चाहिए।

इसी तरह इस साल की शुरुआत में हरियाणा के पानीपत, मध्य प्रदेश के सिंगरौली और कई दूसरी जगहों पर हिंसक प्रोटेस्ट्स हुए, जिनमें कुछ रिपोर्ट हुए और कुछ नहीं।

और अब मानेसर, गुरुग्राम, नोएडा, फरीदाबाद, पलवल और राजस्थान के कई इलाकों में अलग-अलग इंडस्ट्रीज़ में यह देखने को मिल रहा है।

बस एक सवाल उभरता है: अगला कहां?

noida wokers violent protest
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इनसाइड स्टोरी किसको पता

हर प्रोटेस्ट में प्रशासन लगभग तुरंत सामने आ गया, वर्कर्स की मांगों को शांत करने की कोशिश की। यह बिना शक एक छिपी हुई चाल है। लेकिन लेकिन इस बार प्रशासन की यह कालांतर से चली आ रही चाल शायद आख़िरी साबित हो।

घटनाओं के एक ऐसे मोड़ में जिसे किसी ने तय नहीं किया था, लेकिन इसे एक वर्कर्स पावर मानो सामने आ गई है।

ऐसा लगता है कि वर्कर्स, ख़ासकर ठेका मज़दूर या कॉन्ट्रैक्चुअल वर्कर्स की लंबी तन्हाई और बदहाली, और किसी भी तरह के नेतृत्व की कमी ने एक अनोखी और अजीब तरह से उनके लिए फ़ायदेमंद स्थिति पैदा की है।

इससे उन्हें ऐसे संगठन और एक्शन के तरीक़े विकसित करने का मौका मिला है जो सिर्फ शामिल वर्कर्स की समझ में आते हैं।

यही वजह है कि 13 अप्रैल को नोएडा में हुए एक्शन और हिंसा की “इनसाइड स्टोरी” किसी को ठीक से नहीं पता।

एक गैर-पारदर्शी, अंदरूनी दायरा जो सिर्फ शामिल वर्कर्स के लिए खुला है, बाकी सबको जानकारी के लिए परेशान कर रहा है।

इसलिए कोई “लीडर” या “मिडिएटर” नहीं है जिसके ज़रिए पूंजी और राज्य यह जान सकें कि वर्कर्स क्या योजना बना रहे हैं।

किसी को नहीं पता अगला असंतोष और प्रोटेस्ट कहां होगा।

नोएडा वह जगह है जहां बड़े 24×7 मीडिया हाउसों के स्टूडियोज़ और ऑफ़िस हैं। फिर भी उन्हें वर्कर ऐक्शन की कोई समझ नहीं है।

ज़मीन पर रिपोर्टिंग करने वाले पत्रकारों का एक छोटा समूह वर्कर्स से ऐसे बात करता है जैसे वे किसी और दुनिया के हों।

मीडिया ने कभी “वर्कर” नाम की कैटेगरी या उनके काम के हालात पर ध्यान नहीं दिया, क्योंकि वे “टॉकिंग पॉइंट्स” के पीछे भागने में व्यस्त रहे हैं।

उत्पादन की मारामारी और काम के हालात से निकली वर्कर्स पावर

यह बदहाली और छोड़ दिए जाने की स्थिति वर्कर्स के लिए एक तरह से फ़ायदा बन गई है।

वर्कर एक्शन सीधे प्रोडक्शन और काम की कंडीशंस से निकला है। हमने नोएडा में वर्कर्स को कहते सुना, “देखिए हम ये प्रोटेस्ट कर रहे हैं, अब मैनेजमेंट हमें बाहर निकाल देगी।”

यानी वर्कर्स पहले से ही अपनी नौकरी की अस्थिरता और ठेका नौकरी के हालात से वाकिफ़ हैं। उन्हें वैसे भी कभी भी नौकरी से निकाला जा सकता है, तो वे उग्र रूप में शामिल होने से कितना बचेंगे, जिसमें क़ानून से टकराव भी हो सकता है।

हाइपर-कॉन्ट्रैक्चुअलाइज़ेशन अब इस नए तरह के ऑर्गनाइज़ेशन और प्रतिरोध के लिए ज़मीन तैयार कर रहा है।

वर्कर्स का सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स की तरह सप्लाई चेन और डम्पर ट्रक्स से सीधे रिपोर्ट करना नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता।

इंस्टाग्राम रील्स, “वायरल हो जाने” के मतलब को नया रूप देती दिख रही हैं, क्योंकि वे प्रोडक्शन के इलाकों में डायरेक्ट एक्शन को ट्रैक कर रही हैं।

इंटरनेट की वर्चुअल रियलिटी को मोड़कर रियल टाइम वर्कर मूवमेंट को बढ़ाया जा रहा है।

अब आदित्यनाथ सरकार “व्हाट्सऐप ग्रुप्स” को ट्रैक करने की कोशिश कर रही है, जिन्हें योजना बनाने के केंद्र के रूप में देखा जा रहा है।

कमज़ोरी और असुरक्षा को संघर्ष का हथियार बना दिया गया है। नए प्रतिरोध के रूप सीधे पूंजी के मौजूदा रूपों की तरह ही दिखते हैं।

अचानक होने वाला सामूहिक उग्र पूंजी के “जस्ट इन टाइम” प्रोडक्शन और “फ्लैश सेल” के जैसे मॉडल का प्रतिबिंब है।

यह उस क्लासिक उदाहरण की तरह है जिसे कार्ल मार्क्स और फ़्रेडरिक एंगल्स ने कम्युनिस्ट घोषणा पत्र में बताया था- “What the bourgeoisie therefore produces, above all, are its own grave-diggers.” यानी बिना किसी बाहरी बुद्धिजीवी या आयोजक के, पूंजी खुद ही वर्कर्स के विरोध और नुकसान की परिस्थितियां पैदा करती है।

मिडिएशन और बार्गेनिंग की जगह कम होने से एक तरह की ऐसी स्थिति बन गई है जिसमें या तो ये या तो वो करने का विकल्प बचा है।

या तो ये कॉन्ट्रैक्चुअल वर्कर्स पूरी तरह शोषित होकर चुपचाप काम करते रहें। या फिर वे डायरेक्ट एक्शन के ज़रिए फट पड़ें, एक ऐसे अनगढ़ सामूहिक ताक़त के साथ जिसे रोका या नियंत्रित नहीं किया जा सकता।

noida women wokers protest

कल तक नोएडा की चमकदार इमारतें “मेक इन इंडिया” के लिए उत्पादन कर रही थीं। अगले ही पल सब कुछ टूट सकता है।

यह पूरी तरह नया नहीं है। 2013 में भी नोएडा ऐसे प्रोटेस्ट्स का गवाह रह चुका है।

फर्क सिर्फ इतना है कि उस समय सरकार के पास सख़्ती और नियंत्रण का उतना मौका नहीं था।

कम से कम 2012 में मारुति सुज़ुकी वर्कर्स मूवमेंट के बाद से पारंपरिक विचारधारा वाली लेबर यूनियनें किनारे होती गई हैं।

यूनियनें अब सिर्फ वर्कर्स के लिए पीआर करने तक सीमित हो गई हैं, जबकि फैसले वर्कर्स खुद लेते हैं।

वर्कर्स को ट्रेड यूनियन लीडर्स के “लंबे अनुभव” में खास भरोसा नहीं दिखता। वे अक्सर पीछे रह जाते हैं।

वर्कर्स का एक्टिविस्ट्स और यूनियन लीडरों को अंधेरे में रखना अब आम बात हो गई है। इन लीडरों को वर्कर्स के “इनर डोमेन” तक पहुंच पाने के लिए खुद को साबित करना पड़ता है।

जब ज़रूरत होती है, वर्कर्स इन एक्टिविस्ट्स और लीडरों को चुनते हैं या इस्तेमाल करते हैं, ऐसे लोग वकीलों, लेखकों और अकादमिक लोगों के बीच से आते हैं।

ये लोग ज़रूरत पड़ने पर बड़े वकील उपलब्ध करा सकते हैं, जब उग्र रूप के कारण क़ानूनी मामले बनते हैं।

पानीपत के प्रोटेस्ट्स के बाद सरकार “जिम्मेदार” यूनियनों की तलाश में है ताकि वह वर्कर्स के अनिश्चित एक्शन पर काबू पा सके।

फिलहाल वर्कर्स डायरेक्ट एक्शन से संतुष्ट दिखते हैं और किसी राजनीतिक संगठन या कलेक्टिव बार्गेनिंग (सामूहिक वार्ता) की ज़रूरत नहीं मानते।

यह साफ़ नहीं है कि यह तेज़ डायरेक्ट एक्शन कितना लंबा चलेगा। यह चरण कभी न कभी खत्म होगा।

उग्र वर्कर के लिए एक तरह की वास्तविक कल्पना है, जिसे वह जानता है कि अंत में खत्म होना ही है।

इससे हमें यह समझने में मदद मिलती है कि एक ही आर्थिक मांग के लिए अलग-अलग प्रतिरोध के रूप क्यों चुने जाते हैं।

यह कहना जल्दबाज़ी होगी कि यह डायरेक्ट एक्शन किसी नए पॉलिटिकल ऑर्गनाइज़ेशन की तलाश में है।

अभी इस पर निष्कर्ष निकालना ठीक नहीं। संभव है कि यही डायरेक्ट एक्शन खुद एक नया पॉलिटिकल रूप हो। या इसमें नए रूप के तत्व छिपे हों।

यह भी साफ़ नहीं कि यह उग्र रूप आगे चलकर किसी बड़े विद्रोह में बदलेगा या नहीं, जिसमें समाज के और हिस्से शामिल हों।

उग्र रूप खुद वर्कर पावर का एक प्रभावी तरीका हो सकता है। हो सकता है वर्कर्स ने इसे सोच-समझकर न चुना हो। लेकिन इसकी सफलता इसकी फैलने की क्षमता और असर से साबित होती है।

यह समय, संसाधन, दूरी और संचार के इस्तेमाल का एक खास तरीका दिखाता है।

यूनियनें इस बात को कभी नहीं समझ पाईं, क्योंकि वे 1970 के दशक के वेलफेयर स्टेट मॉडल में अटकी हुई हैं। जिसे वे “नियो-लिबरलिज़्म” कहते हैं, उससे लड़ाई पुराने समय के स्थायी रोजगार और सामाजिक सुरक्षा के मॉडल से नहीं लड़ी जा सकती।

आज के युवा वर्करों के लिए पेंशन जैसी बातें बहुत आकर्षक नहीं हैं। वर्कर्स समय के साथ बदल रहे हैं और प्रोडक्शन, लॉजिस्टिक्स और सप्लाई चेन के नए रूपों के अनुसार काम और प्रतिरोध कर रहे हैं।

यह लेख द वायर में 16 अप्रैल को प्रकाशित हुआ था और साभार यहां प्रकाशित किया जा रहा है.

(सरोज गिरी दिल्ली यूनिनवर्सिटी में पॉलिटिक्स पढ़ाते हैं और फ़ोरम अगेंस्ट कॉरपोरेटाइज़ेशन एंड मिलिटराइज़ेशन से जुड़े हैं।)

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Workers Unity Team

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