चेन्नई के रामापुरम में L&T का लेबर कैंप ढहा, एक मज़दूर की मौत कई घायल, कंपनी पर क्यों उठे सवाल
By A.S. Josie, Chennai
31 मई 2026, रविवार की रात, चेन्नई के रामापुरम में निर्माण क्षेत्र की बड़ी कंपनी लार्सन एंड टुब्रो (L&T) द्वारा संचालित एक भीड़भाड़ और खराब रखरखाव वाले लेबर कैंप में एक बैरक से जुड़ी स्टील की सीढ़ी और बालकनी ढह गई।
इस हादसे में उसी रात एक मज़दूर की मौत हो गई और 30-40 से अधिक मज़दूर घायल हो गए।
पुलिस के अनुसार, मृतक की पहचान 31 साल के बिरिंजी मांझी के रूप में हुई है, जो झारखंड के रहने वाले थे।
एक व्यक्ति सूत्र ने नाम न ज़ाहिर करने की शर्त पर, मज़दूरों के प्रति एकजुटता अभियान चलाने वाले एक ग्रुप को बताया कि “उस रात उसने खुद कई शवों को एम्बुलेंस में लादा था और ठेकेदारों को शवों को घर भेजने का आदेश दिया गया था, जिसका पुलिस या अस्पताल में कोई रिकॉर्ड नहीं था।”
वर्कर्स यूनिटी इसकी पुष्टि करने की कोशिश कर रहा है। हालांकि, यह सच है कि कई मज़दूर तब से लेबर कैंप छोड़ चुके हैं और उनकी जगह नए मज़दूर आ गए हैं। कुछ घायल भी अपने इलाज के लिए बेहतर जगह भेजे जाने की मांग कर रहे हैं।
चार दिन बाद भी दो मज़दूर पोरूर के रामचंद्र अस्पताल के आईसीयू में ज़िंदगी की जंग लड़ रहे हैं। एक झारखंड से हैं, एक असम से।
सुगानी ओरांव न्यूरोलॉजी आईसीयू में जबकि लाल बहादुर मल्टीडिसिप्लिनरी आईसीयू में थे, अब उन्हें इमरजेंसी वार्ड में स्थानांतरित कर दिया गया है।
अंग्रेज़ी अख़बार न्यू इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार, मृतक की पहचान झारखंड निवासी 31 वर्षीय बिरिंजी मांझी के रूप में हुई है। गिरने से उन्हें गंभीर चोटें आईं और उन्हें तुरंत राजीव गांधी सरकारी जनरल अस्पताल ले जाया गया। पुलिस ने बताया कि सोमवार तड़के चोटों के कारण उनकी मृत्यु हो गई।
एक को मस्तिष्क में रक्तस्राव (ब्रेन हेमरेज) है और दूसरे की कमर के नीचे गंभीर फ्रैक्चर है। राजीव गांधी सरकारी अस्पताल में जिस मज़दूर की मौत हुई, वह झारखंड का रहने वाला था।
अख़बार के अनुसार, इस निजी कंपनी के लगभग 850 कर्मचारी मुख्य रूप से झारखंड, असम, बिहार, ओडिशा और पश्चिम बंगाल से हैं। वे रामपुरम स्थित एल एंड टी निर्माण स्थल पर काम करते हैं।
हालांक मज़दूरों के अनुसार, इस कैंप में में लगभग 3,000 मज़दूर रहते हैं। उन्हें तीन मंज़िला बैरकनुमा इमारतों में रखा जाता है। ईंट-पत्थर की इन बैरकों के बाहर स्टील की सीढ़ियाँ और पहली तथा दूसरी मंज़िल के पूरे हिस्से में फैली हुई स्टील की बालकनियाँ लगी हुई हैं।
कुछ मज़दूर कई सालों से इन होस्टल-जैसे आवासों में रह रहे हैं, जो बेहद भीड़भाड़ वाले, असुविधाजनक और गर्मियों में असहनीय रूप से गर्म हो जाते हैं।
कैंपस का कैंटीन भी ख़राब रखरखाव और घटिया स्तर की सुविधाओं का उदाहरण है।
यह जीवन-स्तर ऐसा नहीं है जिसे एल एंड टी का प्रबंधन एक दिन भी बर्दाश्त कर सके। लेकिन मज़दूरों से उम्मीद की जाती है कि वे सालों तक ऐसी परिस्थितियों में रहें और कंपनी के आलीशान कैंपस और शहर की मेट्रो परियोजनाओं का निर्माण करें।
इस मामले में ये मज़दूर एल एंड टी के बहुचर्चित “इनोवेशन सिटी” कैंपस का निर्माण कर रहे हैं, जो निर्माण पूरा होने के बाद कंपनी को करोड़ों का लाभ देगा।
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एफ़आईआर में क्या कहा गया?
पुलिस एफ़आईआर पर आधारित और अभी तक स्वतंत्र रूप से सत्यापित न की गई मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, रविवार रात मज़दूर अपने मोबाइल फ़ोनों पर आईपीएल मैच देख रहे थे।
पुलिस के अनुसार, सप्ताह भर की मेहनत के बाद यह उनके लिए कुछ पल राहत और मनोरंजन के थे। मैच समाप्त होने के बाद वे बालकनी पर आए, तभी वह ढह गई।
इसके कारण मज़दूर दो मंज़िल नीचे एक-दूसरे के ऊपर गिर पड़े, जिससे हाथ-पैर टूट गए और चेहरे पर गंभीर चोटें आईं।
एक 18 साल के युवक के पैर में स्टील की प्लेट लगाई गई है और अब उसे वॉकर की ज़रूरत है। कई अन्य मज़दूरों की भी इसी तरह की सर्जरी हुई है।
इतने बड़े हादसे के बावजूद यह चौंकाने वाली बात है कि कुछेक मीडिया रिपोर्टों ने पुलिस एफ़आईआर को लगभग ज्यों-का-त्यों छाप दिया।
न्यू इंडियन एक्सप्रेस जैसे अख़बारों में भी मज़दूरों पर “लापरवाही से जश्न मनाने” का आरोप लगाया गया और कहा गया कि वे एक “खाली पड़ी” (abandoned) इमारत में थे।
एक रिपोर्ट में तो यह तक कहा गया कि मज़दूर शायद नशे में थे।
ऐसे आरोप पहले भी लगाए जा चुके हैं। पिछले वर्ष सितंबर में कट्टुपल्ली बंदरगाह के एक लेबर कैंप में ठीक ऐसी ही एक बालकनी से गिरकर एक मज़दूर की मौत हुई थी।
उस समय व्यापक विरोध प्रदर्शन हुए थे, पुलिस ने आँसू गैस छोड़ी थी और लाठीचार्ज किया था। सैकड़ों मज़दूरों को अपने गाँव लौटना पड़ा था। वह लेबर कैंप भी एल एंड टी का ही था।
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वे सवाल जो कंपनी को कठघरे में खड़ा करते हैं?
ऐसा लगता है कि कंपनी अपने मज़दूर के रहने वाली जगहों की ख़राब स्थिति की ज़िम्मेदारी से बचने के लिए कुछ भी कह सकती है।
अगर वास्तव में वह ब्लॉक असुरक्षित होने के कारण खाली पड़ा था, तो फिर उसे बंद करने के लिए कोई चेतावनी बोर्ड, टेप या जंजीर क्यों नहीं लगाई गई थी?
अगर वह परित्यक्त था, तो इतने सारे मज़दूर वहाँ कैसे घायल हो गए? वास्तव में यह एक नियमित रूप से उपयोग में आने वाला आवासीय हिस्सा था, जिसकी जानकारी शिविर प्रबंधन को पूरी तरह थी।
एक और चौंकाने वाली बात यह है कि शिविर में रहने वाले कई मज़दूरों को अब तक यह भी पता नहीं है कि एक साथी मज़दूर की मौत हो चुकी है और हादसा कितना गंभीर था।
कुछ लोग उस समय अपनी बैरकों में लौट चुके थे।
कट्टुपल्ली के विरोध प्रदर्शनों से सबक लेते हुए, लेबर कैंप के मैनेजमेंट ने तुरंत लाइव वीडियो बनाना रोक दिया। इसके बाद एल एंड टी ने लेबर कैंप में बाहरी लोगों की एंट्री भी रोक दी, ताकि न तो कोई हादसे के कारणों की जाँच कर सके और न ही बाकी इमारतों की सुरक्षा का स्वतंत्र अंदाज़ा लगा सके।
अस्पताल से छुट्टी पाए मज़दूरों को सीधे लेबर कैंप में वापस भेज दिया गया है। वहाँ वे अन्य मज़दूरों की तरह लगातार निगरानी और सीमित आवाजाही के बीच रह रहे हैं।
उन्हें आश्वासन दिया गया है कि चोट की गंभीरता के अनुसार 1 से 3 महीने तक सैलरी दी जाएगी। लेकिन यह संभवतः केवल उनका मूल वेतन (बेसिक सैलरी) होगा, जो उनकी वास्तविक औसत सैलरी से काफ़ी कम है।
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लेबर कैंप में मज़दूरों की हालत
मज़दूरों ने बताया कि ये लोग रोज़ 12 घंटे काम करते हैं और उनसे ज़बरदस्ती ओवरटाइम भी कराया जाता है। इसलिए उनकी वास्तविक आमदनी मूल सैलरी से अधिक होती है।
हालाँकि उन्हें डबल ओवरटाइम नहीं मिलता। इसका मतलब है कि घायल अवस्था में उन्हें सैलरी में कम से कम 35 प्रतिशत कटौती झेलनी पड़ेगी, साथ ही इलाज पर अपनी जेब से खर्च भी करना होगा।
स्वाभाविक रूप से कुछ मज़दूरों के परिवारजन सोशल मीडिया पर वीडियो देखकर पटना जैसे दूर-दराज़ स्थानों से भागे चले आए हैं।
लेकिन उनके यात्रा खर्च का भुगतान कौन करेगा? वे कहाँ ठहरेंगे? वे अपने परिजनों तक कैसे पहुँचेंगे? इस बारे में कुछ भी स्पष्ट नहीं है।
घायल मज़दूरों को बताया गया है कि यदि वे अपने गाँव लौटना चाहते हैं, तो यात्रा खर्च उन्हें खुद अपनी जेब से देना पड़ेहगा।
सबसे चिंताजनक बात यह है कि अब तक तमिलनाडु की राज्य सरकार की ओर से कोई सार्वजनिक बयान नहीं आया है।
साथ ही, एल एंड टी ने जेसुइट माइग्रेंट सर्विसेज़ (JMS) को अस्पताल में मज़दूरों से मिलने से भी रोक दिया।
और सबसे दुखद यह है कि मज़दूरों की आवाज़ लगभग ख़ामोश हो गई है। कई लोग भयभीत हैं क्योंकि उन्होंने इस भयानक घटना को अपनी आँखों से देखा है या खुद पीड़ित रहे हैं।
इस बीच देश के प्रतिष्ठित अंग्रेज़ी अख़बार द हिंदू ने इस घटना को कवर करने की ज़रूरत नहीं समझी। हिंदी मीडिया ने भी इस कहानी को नहीं उठाया। अखबार ने लिखा है कि घायल मज़दूरों को गिंडी स्थित सरकारी कलाइग्नार शताब्दी सुपर स्पेशलिटी अस्पताल में भर्ती कराया गया, जबकि 22 अन्य को इलाज के लिए पोरूर स्थित श्री रामचंद्र चिकित्सा केंद्र में भर्ती कराया गया।
झारखंड निवासी ब्रिंजी मांझी की अगले दन सोमवार तड़के राजीव गांधी सरकारी जनरल अस्पताल में इलाज के दौरान मौत हो गई। नंदंबक्कम पुलिस ने मामला दर्ज कर लिया है।
तमिल मीडिया मुख्यतः पुलिस एफ़आईआर में दर्ज तथ्यों को ही दोहरा रहा है, जबकि ज़मीनी स्तर पर अभी भी कई सवालों के जवाब मिलने बाकी हैं।
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तमिलनाडु सरकार की क्या है ज़िम्मेदारी?
क्या निर्माण श्रमिक कल्याण बोर्ड (BOCW) ने कभी जाँच की कि यह मज़दूर जहां रहते हैं वो होस्टल निर्माण मानकों के अनुरूप है या नहीं?
क्या इन लेबर कैंपों को कभी कम्प्लीशन सर्टिफ़िकेट दिया गया था? क्या शहर प्रशासन ने यह जाँचा कि यहाँ का तापमान और हीट इंडेक्स इंसानों के लिए सुरक्षित सीमा के भीतर है या नहीं?
यह समय है कि सभी मज़दूर बेहतर, आरामदायक और ठंडे घरों की माँग करें। उन्हें ईएसआई (ESI) कार्ड दिए जाएँ और उन्हें बीओसीडब्ल्यू बोर्ड में पंजीकृत किया जाए, ताकि ऐसी त्रासदियों की स्थिति में उन्हें पूरा मुआवज़ा मिल सके।
वे यह भी माँग कर सकते हैं कि उनकी देखभाल के लिए आने वाले परिवारजनों की यात्रा के लिए कंपनी टिकट खरीदे। साथ ही, उन्हें नौकरी छोड़ने का विकल्प और 6 महीने से एक साल की आमदनी के बराबर उचित सेवरेंस पैकेज (अंग भंग का मुआवज़ा) भी मिलना चाहिए।
इसी प्रकार, मज़दूरों को बिना किसी डर के वीडियो बनाने, मीडिया से बात करने और ट्रेड यूनियनों के साथ अपनी बात साझा करने की स्वतंत्रता होनी चाहिए।
यह देश मज़दूरों और किसानों की मेहनत से बना है और इन अकूत रूप से संपन्न कंपनियों को अपनी जवाबदेही से बचने नहीं दिया जाना चाहिए।
(राइटर चेन्नई में सामाजिक कार्यकर्ता हैं।)
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