क्या भारत में वाक़ई बड़ा ‘आर्थिक तूफ़ान’ आने वाला है?
देश में बढ़ती महंगाई, बेरोज़गारी और आर्थिक अस्थिरता के बीच राजनीतिक बयानबाज़ी तेज़ हो गई है। कांग्रेस सांसद और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने “बड़े आर्थिक तूफ़ान” की चेतावनी देते हुए केंद्र सरकार की आर्थिक नीतियों पर तीखा हमला बोला है।
देश की अर्थव्यवस्था इस समय कई दबावों से घिरी हुई है। विदेशी पोर्टफोलियो निवेश यानी एफ़पीआई के बहिर्गमन, निजी निवेश में सुस्ती, घटती मांग और लगातार बढ़ती महंगाई ने आम लोगों की मुश्किलें हद से ज़्यादा बढ़ा दी जिनसा सबसे गहरा असर मज़दूरों, छोटे कर्मचारियों और असंगठित क्षेत्र में काम करने वाले लोगों पर पड़ा है।
राहुल गांधी ने एक्स पर लिखा, “आर्थिक तूफ़ान सर पर है, और हमारे प्रधानमंत्री इटली में टॉफ़ी बाँट रहे हैं। किसान, युवा, महिलाएं, मज़दूर और छोटे व्यापारी सब रो रहे हैं, पीएम हंसकर रील बना रहे हैं, और बीजेपी वाले ताली बजा रहे हैं। यह नेतृत्व नहीं, नौटंकी है।”
इससे पहले इटली की पीएम प्रधानमंत्री जियोर्जिया मेलोनी ने सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म एक्स पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ अपनी तस्वीर साझा करते हुए लिखा है, ‘’वेलकम टु रोम, माई फ़्रेंड!’’
बाद में राहुल गांधी ने मीडिया से बातचीत करते हुए कहा, “नरेंद्र मोदी ने जिस तरह से देश की इकॉनमी का ढांचा बदला है, अब एक बड़ा आर्थिक तूफ़ान आने वाला है। उन्होंने जो ढांचा अडानी और अंबानी के पक्ष में बनाया है, वह टिक नहीं पाएगा। दुःख की बात यह है कि इसका असर आम जनता पर पड़ेगा।”
उन्होंने कहा, “इसका असर अडानी-अंबानी और नरेंद्र मोदी पर नहीं पड़ेगा, क्योंकि वे अपने महलों में बैठे रहेंगे। यह झटका बहुत बुरा होगा, आने वाला समय बहुत कठिन होगा।”
राहुल गांधी ने कहा, “कोई ठोस क़दम उठाने के बजाय नरेंद्र मोदी देश के लोगों से कह रहे हैं कि कोई भी विदेश यात्रा न करे, जबकि वे ख़ुद दुनिया भर का दौरा कर रहे हैं।”
प्रधानमंत्री मोदी की विदेश यात्राओं और इटली की प्रधानमंत्री जियार्जिया मेलोनी के साथ उनकी तस्वीरों को लेकर विपक्ष लगातार सवाल उठा रहा है। सोशल मीडिया पर सवाल पूछे जा रहे हैं कि खर्चों में कटौती, सोना न खरीदने और विदेश यात्रा कम करने की नसीहत के तुरंत बाद नरेंद्र मोदी पांच देशों की यात्रा पर निकल गए, इससे शीर्ष नेता का दोहरापन उजागर होता है।
पहले तो मोदी ने पांच विधानसभा चुनावों में धुआंधार रैलियां कीं। चुना जीतने के बाद भी कई जगहों पर मोदी और बीजेपी के छुटभैये नेता तक महंगी गाड़ियों के लंबे काफ़िले में शक्ति प्रदर्शन करना जारी रखा। इससे जनता में एक तरह का पैनिक है। पहले से ही बहुत मामूली दिहाड़ी पर गुजर बसर कर रहा मज़दूर वर्ग अब और तकलीफ़ में है क्योंकि उसकी असली कमाई, महंगाई खा गई है।
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राजनीतिक बयानबाज़ी और हक़ीक़त
लेकिन केवल बयानबाज़ी से आगे बढ़कर यह देखना भी दिलचस्प है कि सत्ता में आने के बाद मुख्यधारा की पार्टियां किसके हित में नीतियां लागू करती हैं।
हाल में कर्नाटक की कांग्रेस सरकार पर भी सवाल उठे, जब आईटी और टेक सेक्टर में काम के घंटे बढ़ाने से जुड़े प्रस्तावों को लेकर कर्मचारियों और यूनियनों ने विरोध जताया।
श्रमिक संगठनों का आरोप है कि कंपनियों को 12 घंटे तक काम कराने की छूट देने की कोशिश श्रम कानूनों को और कमज़ोर करेगी। यूनियनों ने कहा कि आईटी सेक्टर में पहले से ही लंबे काम के घंटे, मानसिक दबाव और अस्थायी रोज़गार बड़ी समस्या हैं।
मज़दूर संगठनों का कहना है कि यह सवाल केवल मौजूदा केंद्र सरकार तक सीमित नहीं है। उनके मुताबिक उदारीकरण के बाद से लगभग सभी बड़ी पार्टियों ने ऐसी नीतियां लागू कीं जिनसे श्रम अधिकार कमज़ोर हुए और कॉरपोरेट पूंजी को अधिक छूट मिली।
मुख्यधारा की पार्टियां चुनावों में एक-दूसरे पर आरोप लगाती हैं, लेकिन आर्थिक नीतियों के स्तर पर देसी और विदेशी पूंजी के सामने झुक जाती हैं या उनके साथ समझौता कर लेती हैं।
चाहे निजीकरण हो, श्रम कानूनों में बदलाव हो या कॉरपोरेट टैक्स में राहत, इन सवालों पर सत्ता और विपक्ष के बीच बुनियादी अंतर अक्सर धुंधला पड़ जाता है।
दुनिया भर में मज़दूर अधिकार की प्रेरणा बने कार्ल मार्क्स ने 19वीं सदी में लिखा था कि पूंजीवादी व्यवस्था में आर्थिक संकट का बोझ अंततः मेहनतकश वर्ग पर डाला जाता है।
मार्क्स का प्रसिद्ध कथन, “मज़दूर के पास खोने के लिए अपनी जंजीरों के अलावा कुछ नहीं है,” आज भी ट्रेड यूनियनों और श्रमिक आंदोलनों में बार-बार दोहराया जाता है।
रूसी क्रांति के नेता व्लादिमीर लेनिन ने लिखा था, “पूंजी हर संकट की कीमत मज़दूरों से वसूलती है।” आर्थिक असमानता और बढ़ती हड़तालों के मौजूदा दौर में यह टिप्पणी फिर प्रासंगिक मानी जा रही है।
देश के कई औद्योगिक इलाकों में हाल के महीनों में कर्मचारियों और मज़दूरों के विरोध प्रदर्शन बढ़े हैं। ठेका व्यवस्था, कम वेतन, छंटनी और महंगाई के खिलाफ़ फैक्ट्रियों, परिवहन सेवाओं और सार्वजनिक क्षेत्रों में असंतोष दिखाई दिया है।
मज़दूर संगठनों का कहना है कि अगर रोज़गार, वेतन और सामाजिक सुरक्षा को लेकर ठोस कदम नहीं उठाए गए तो आने वाले समय में श्रमिक आंदोलन और तेज़ हो सकते हैं।
मंदी के संकेत और भारत की स्थिति
भारतीय अर्थव्यवस्था के मंदी की ओर बढ़ने या आर्थिक सुस्ती के संकेतों को समझने के लिए अर्थशास्त्री कई महत्वपूर्ण इंडिकेटर्स पर नज़र रखते हैं। यदि आने वाले समय में ये पाँच इंडिकेटर्स कमज़ोर होते हैं, तो यह मंदी का संकेत हो सकते हैं:
1. निजी उपभोग में गिरावट
भारतीय अर्थव्यवस्था का सबसे बड़ा इंजन ‘घरेलू उपभोग’ है। देश की GDP में जीडीपी में ‘निजी अंतिम उपभोग व्यय’ की हिस्सेदारी बढ़कर 61.5% हो गई है। जिसका मतलब है कि लोगों के उपभोग का जीडीपी में बड़ा योगदान है।
अगर ग्रामीण और शहरी इलाकों में लोग रोज़मर्रा के सामान , गाड़ियों, और मकानों जैसी चीज़ों पर खर्च कम कर देते हैं, तो कंपनियों का उत्पादन ठप होने लगता है, जिससे आर्थिक रफ्तार धीमी हो जाती है। लेकिन भारत की स्थिति क्या है? जहां एक तरफ शहरी क्षेत्रों में प्रीमियम उत्पादों (जैसे महंगी कारें, स्मार्टफोन) की मांग मजबूत है, वहीं ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में रोज़मर्रा के उपयोग के सामानों की बिक्री कम हो रही है। इसे अर्थशास्त्री ‘K-Shaped Recovery’ कहते हैं, जिसमें अमीर अधिक खर्च कर रहे हैं, लेकिन आम जनता गुजारे के लिए जद्दोजहद करती है।
2. फ़ैक्ट्रियों में प्रोडक्शन गिरा
यह इंडिकेटर दिखाता है कि देश की फैक्ट्रियों में उत्पादन (माइनिंग, बिजली और मैन्युफैक्चरिंग) बढ़ रहा है या घट रहा है।
पीएमआई यानी परचेजिंग मैनेजर्स इंडेक्स का आंकड़ा अगर 50 से नीचे चला जाता है, तो यह औद्योगिक गतिविधि में सिकुड़न को दर्शाता है। फैक्ट्रियों का बंद होना या उत्पादन कम करना मंदी की शुरुआत का बड़ा लक्षण है।
अप्रैल 2026 में 54.7 दर्ज किया गया है जो अच्छी ग्रोथ दिखाता है। मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में नए ऑर्डर्स और उत्पादन की रफ्तार अच्छी है। हालांकि, कच्चे माल की बढ़ती लागत और वैश्विक स्तर पर जारी मिडिल-ईस्ट (मध्य पूर्व) तनाव के कारण इनपुट कॉस्ट (लागत) बढ़ रही है।
3. निजी निवेश में कमी
जब देश के बड़े उद्योगपति और कंपनियां नए प्लांट लगाने, नई तकनीक लाने या बिजनेस बढ़ाने में पैसा लगाना बंद कर देती हैं, तो इसे आर्थिक सुस्ती का बड़ा संकेत माना जाता है।
कॉर्पोरेट जगत भविष्य को लेकर आशंकित होता है, इसलिए वे नया निवेश रोक देते हैं। इसके कारण नई नौकरियां पैदा होना बंद हो जाती हैं और विकास दर नीचे गिरने लगती है।
पिछले कुछ सालों में निजी क्षेत्र निवेश करने से कतरा रहा है।
4. बढ़ती बेरोज़गारी और सैलरी में मामूली बढ़ोत्तरी
अर्थव्यवस्था का यह चक्र बेहद संवेदनशील है।
यदि सीएमआईई या सरकारी आंकड़ों में बेरोज़गारी दर लगातार बढ़ती है और काम कर रहे लोगों की सैलरी में बढ़ोतरी महंगाई दर से कम होती है, तो लोगों के पास खर्च करने के लिए पैसे नहीं बचते। यह सीधे तौर पर बाज़ार में मांग को खत्म कर देता है।
देश की बेरोज़गारी दर बढ़कर 5.2% के स्तर पर पहुंच गई है। युवाओं में और ग्रामीण क्षेत्रों में कुशल तथा सम्मानजनक वेतन वाली नौकरियों की कमी बनी हुई है।
असंगठित क्षेत्र और ग्रामीण भारत में मजदूरी में महंगाई के मुकाबले पर्याप्त बढ़ोतरी नहीं हो रही है, जो एक बड़ी चिंता का कारण बन गया है।
5. लगातार उच्च महंगाई और ऊंची ब्याज दरें
यदि देश में खाने-पीने और ईंधन की कीमतें लंबे समय तक ऊंची बनी रहती हैं, तो केंद्रीय बैंक (RBI) महंगाई को काबू करने के लिए ब्याज दरों को बढ़ाए रखता है। ऊंची ब्याज दरों के कारण होम लोन, कार लोन और बिजनेस लोन महंगे हो जाते हैं। लोन महंगे होने से लोग और कंपनियां कर्ज लेना कम कर देते हैं, जिससे आर्थिक चक्र सुस्त हो जाता है। इसे अर्थव्यवस्था को ठहर जाना कहते हैं।
भारत लगातार उच्च महंगाई और ऊंची ब्याज़ दरों के जोखिम में है।
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