विजय सिंह: जिन्होंने स्तालिन और होजा के दौर को दुनिया के सामने रखा

विजय सिंह: जिन्होंने स्तालिन और होजा के दौर को दुनिया के सामने रखा

By पदम

भारतीय और अंतरराष्ट्रीय कम्युनिस्ट आंदोलन के एक बड़े चेहरे कॉमरेड विजय सिंह का 17 अप्रैल 2026 को निधन हो गया।

वे न केवल एक राजनेता थे, बल्कि एक गंभीर विचारक, लेखक और अंतरराष्ट्रीय स्तर के पत्रकार भी थे। उनका जाना वामपंथी राजनीति के एक वैचारिक युग में एक बड़ा खालीपन माना जा रहा है।

‘मेरे काम को बचाकर रखना, मुझे नहीं’

विजय सिंह उन चुनिंदा लोगों में से थे जो प्रचार की चमक-धमक से दूर रहना पसंद करते थे।

जब उनके साथियों ने उनसे कहा कि उन्हें अपना एक वीडियो इंटरव्यू रिकॉर्ड कराना चाहिए ताकि आने वाली पीढ़ी उनके बारे में जान सके, तो उनका जवाब बहुत सादगी भरा था।

उन्होंने कहा था, “मैं कौन हूँ? अगर कुछ है, तो वो हमारा काम है जो मौजूद है… अगर आप कुछ बचाना चाहते हैं, तो उस राजनीति को बचाइए जिसे हम करते हैं।”

यह बयान उनके व्यक्तित्व की गहराई को दर्शाता है। वे व्यक्ति-पूजा के सख्त खिलाफ थे और मानते थे कि इतिहास व्यक्तियों से नहीं, बल्कि वर्ग संघर्ष से बनता है।

‘रिवोल्यूशनरी डेमोक्रेसी’ और ऐतिहासिक दस्तावेज़

विजय सिंह लंबे समय तक ‘रिवोल्यूशनरी डेमोक्रेसी’ पत्रिका के प्रेरणास्रोत रहे। यह केवल एक पत्रिका नहीं थी, बल्कि दुनिया भर के कम्युनिस्ट आंदोलनों की बहसों का एक साझा मंच थी।

जब दुनिया भर में सोवियत इतिहास और जोसेफ़ स्तालिन की आलोचना एक ‘फैशन’ बन गई थी, तब विजय सिंह ने दस्तावेजों और शोध के जरिए एक अलग पक्ष सामने रखा।

उन्होंने अपने खर्च पर रूस की यात्राएं कीं और वहां के सरकारी अभिलेखागारों (Archives) से उन मूल पांडुलिपियों को खोज निकाला, जो अब तक दुनिया की नजरों से ओझल थीं। उनके इस काम की सराहना अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ‘ICMLPO’ जैसे संगठनों ने भी की है।

स्तालिन: ‘विलेन’ या ‘नायक’? विजय सिंह का ऐतिहासिक शोध

सोवियत संघ के पूर्व नेता जोसेफ स्तालिन को लेकर दुनिया भर के इतिहासकारों में हमेशा दो फाड़ रहे हैं।

जहां पश्चिमी मीडिया और कई इतिहासकार उन्हें एक ‘तानाशाह’ के रूप में पेश करते हैं, वहीं कॉमरेड विजय सिंह का नज़रिया दस्तावेजी सबूतों पर टिका था।

विजय सिंह उन गिने-चुने भारतीय विचारकों में से थे, जिन्होंने स्तालिन का अध्ययन किसी विचारधारा के चश्मे से नहीं, बल्कि ‘आर्काइवल रिसर्च’ (अभिलेखीय शोध) के ज़रिए किया।

90 के दशक में जब सोवियत संघ का पतन हुआ, तब रूस के कई सरकारी दस्तावेज़ पहली बार दुनिया के सामने आए। विजय सिंह ने व्यक्तिगत स्तर पर संसाधन जुटाए और कई बार रूस की यात्रा की।

उन्होंने मास्को के पुस्तकालयों और सरकारी अभिलेखागारों में हफ़्तों गुज़ारे ताकि वे स्तालिन के दौर के असली पत्रों, गुप्त रिपोर्टों और पार्टी के फैसलों की मूल कॉपियों को पढ़ सकें।

उनका मानना था कि स्तालिन पर लगने वाले कई आरोप प्रोपेगेंडा का हिस्सा थे, जिनका हकीकत से मिलान करना ज़रूरी है।

स्तालिन पर उनके शोध के मुख्य बिंदु

    • औद्योगीकरण का रक्षक: विजय सिंह ने आंकड़ों के साथ यह तर्क दिया कि अगर स्तालिन ने सोवियत संघ का तेज़ी से औद्योगीकरण (Industrialization) नहीं किया होता, तो रूस कभी भी हिटलर की नाज़ी सेना को हराने में सक्षम नहीं हो पाता।

    • फासीवाद के ख़िलाफ़ जंग: वे अक्सर कहते थे कि द्वितीय विश्व युद्ध में मानवता को फासीवाद से बचाने का श्रेय स्तालिन के रणनीतिक नेतृत्व को जाता है, जिसे पश्चिमी इतिहासकार अक्सर कम करके आंकते हैं।

    • अल्पसंख्यकों का सवाल: स्तालिन द्वारा लिखे गए ‘मार्क्सवाद और राष्ट्रीय प्रश्न’ (Marxism and the National Question) पर विजय सिंह की गहरी पकड़ थी। वे इसे भारत जैसे बहु-भाषी और बहु-जातीय देश के लिए एक समाधान के तौर पर देखते थे।

VIJAY SINGH STALINIST

‘स्तालिन सोसाइटी’ की स्थापना

विजय सिंह ने भारत में ‘स्तालिन सोसाइटी’ की नींव रखी। इसका मकसद राजनीतिक रैलियां करना नहीं, बल्कि स्तालिन के दौर के साहित्य और इतिहास पर अकादमिक चर्चाएं आयोजित करना था।

साल 2017 में आंध्र प्रदेश के गुंटूर में उन्होंने एक बड़ी अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी आयोजित की, जिसमें दुनिया भर के वामपंथी विद्वानों ने हिस्सा लिया। उनके संपादन में ‘स्तालिन’ पर कई ऐसी दुर्लभ सामग्री का अनुवाद हुआ, जो पहले केवल रूसी या जर्मन भाषा में उपलब्ध थी।

विजय सिंह के लिए स्तालिनकोई ‘अचूक देवता’ नहीं थे, बल्कि एक जटिल ऐतिहासिक चरित्र थे। वे अक्सर कहते थे कि स्तालिन की गलतियों पर चर्चा तो हो, लेकिन उनके योगदान को मिटाया नहीं जाना चाहिए।

Stalin

विचारधारा: लेनिन, स्तालिन और होजा

विजय सिंह की वैचारिक स्पष्टता उन्हें भीड़ से अलग करती थी। वे मार्क्सवाद-लेनिनवाद की उस धारा के प्रतिनिधि थे जो किसी भी तरह के ‘सुधारवाद’ या ‘समझौते’ के खिलाफ थी।

उनकी वैचारिक त्रिमूर्ति में तीन नाम सबसे अहम थे:

  1. लेनिन: जिनसे उन्होंने साम्राज्यवाद और पार्टी संगठन की समझ ली।

  2. स्तालिन: जिन्हें वे फासीवाद को हराने वाला और सोवियत निर्माण का नायक मानते थे।

  3. अनवर होजा: अल्बानिया के वो नेता जिन्होंने सोवियत संघ और चीन की नीतियों में आए बदलावों की जमकर आलोचना की थी।

विजय सिंह का मानना था कि अगर 20वीं सदी के कम्युनिस्ट आंदोलन को समझना है, तो अल्बानिया के नेता अनवर होजा का अध्ययन करना अनिवार्य है।

उन्होंने भारत में ‘स्तालिन सोसाइटी’ की स्थापना की और कई अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठियां आयोजित कीं।

हालांकि चीन को लेकर उनका मानना था कि अब वो एक ‘साम्राज्यवादी शक्ति’ बन चुका है। हालांकि उनके आख़िरी दिनों में मिलने वाले एक कम्युनिस्ट कार्यकर्ता ने उनकी इस धारणा में बदलाव के संकेत देखने का भी दावा किया।

एक शिक्षक और साथी

विजय सिंह केवल किताबों तक सीमित नहीं थे। वे दिल्ली विश्वविद्यालय में प्रोफेसर रहे और अपने छात्रों के बीच खासे लोकप्रिय थे।

उन्होंने हमेशा उन छात्रों का साथ दिया जो साधारण पृष्ठभूमि या हिंदी माध्यम से आते थे और व्यवस्था में खुद को कमजोर महसूस करते थे।

वे कहते थे कि शिक्षा केवल नौकरी पाने का जरिया नहीं है, बल्कि यह दुनिया को बदलने का एक औज़ार है। ऑक्सफोर्ड से पढ़ाई करने और कई भाषाओं का ज्ञान होने के बावजूद, उन्होंने हमेशा अपने नाम के आगे ‘प्रोफेसर’ के बजाय ‘कॉमरेड’ कहलाना पसंद किया।

विजय सिंह आज हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनके लिखे लेख और उनकी वैचारिक विरासत आने वाले समय में भी बहस और चर्चा का केंद्र बनी रहेगी।

(पदम रिवोल्यूशनरी डेमोक्रेसी नामक एक संगठन के सदस्य हैं और विजय सिंह के अंतिम दिनों में उनके साथ रहे हैं।)

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