वे 5 कारण जिनकी वजह से नोएडा में मज़दूरों का व्यापक गुस्सा फूटा, क्या सरकार ही मज़दूरों को गांव भेजना चाहती है?
By अंजनी कुमार
नोएडा में मजदूरों का गुस्सा फूट पड़ा और उनकी आवाज साफ़ सुनाई देने लगी।
वे मीडिया को बता रहे थे-
1. घोषित न्यूनतम सैलरी कम है और वास्तविक देय भुगतान उससे भी कम है।
2. ओवरटाईम काम पर जबरदस्ती की जाती है और उसकी उचित मज़दूरी नहीं दी जाती है।
3. मंहगाई के हिसाब से मज़दूरी में कोई बढ़ोत्तरी नहीं है। घ- कार्यस्थल पर उनके साथ गाली-गलौज किया जाता है।
4. मनमाने तरीके से काम से निकाल दिया जाता है। समय पर भुगतान नहीं किया जाता है और इसकी स्लिप नहीं दी जाती है।
5. महिलाओं के साथ अभद्रता की जाती है और शारीरिक स्थिति का ख्याल नहीं रखा जाता है।
ये वह मुख्य बातें हैं जो नोएडा के मज़दूरों से मीडिया ने बात करते हुए जाहिर की हैं। उनकी बातों में कुछ शब्द बार-बार आये। ऐसे कुछ शब्दों पर ग़ौर करना ठीक रहेगा, जैसे-
1. मकान का किराया,
2. बच्चों की पढ़ाई,
3. महंगी गैस, खाने पीने का समान, दवा और कपड़ा
4. बचत
5. कार्यस्थल पर भोजन, पानी आदि की व्यवस्था।
इन शब्दों के साथ ही फ़ैक्ट्री में ठेकेदार, मालिक, पीस वर्क, काम का टारगेट, नियुक्ति की बातें भी आईं।
उपरोक्त बातें मज़दूर वर्ग की दशा के बारें में बताती हैं। यहां सिर्फ़ उनकी न्यूनतम मज़दूरी की मांग नहीं है। वे इस दशा में बदलाव और बेहतर कार्यस्थिति भी चाहते हैं। लेकिन, मज़दूरी की मांग में सबसे ज्यादा जो मांग सुनी गई वह न्यूनतम मज़दूरी की मांग पर थी।
जबकि सच्चाई यही है कि न्यूनतम मज़दूरी की दर घोषित होने या तय होने से मजदूरों को उसके बराबर मज़दूरी अपवाद स्वरूप ही मिलती है। यह बात आप मीडिया पर मजदूरों के बोलने में सुन सकते हैं।
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न्यूनतम मज़दूरी के लिए मनरेगा ख़त्म किया गया?
न्यूनतम मज़दूरी की बढ़ोत्तरी से इतना ज़रूर होता है कि मजदूरों को दिये जाने वाले सैलरी का ‘बाॅटम लाईन’ थोड़ा ऊपर उठ जाता है।
इस बात को समझने के लिए हम मनरेगा के तहत गांव में मज़दूरी दिये जाने के संदर्भ में देख सकते हैं। गांव में इससे बढ़ने वाली न्यूनतम मज़दूरी एक तरह की गारंटी में बदल गई। इसका असर गांव और शहर दोनों ही जगह पर पड़ा था और मजदूरों के सैलरी में वृद्धि देखी गई।
इसी कारण से इसका विरोध भारत के उद्योगपतियों का मुख्य हिस्सा तो कर ही रहा था, भाजपा ने भी इसका कड़ा विरोध किया।
नरेंद्र मोदी जब प्रधानमंत्री नहीं थे, तब उन्होंने इसका खूब विरोध किया और संसद में दिये गये भाषणों में गहरा कटाक्ष किया। जब वह प्रधानमंत्री बने इसे कमजोर बनाने में लग गये और आज यह वीजी-रामजी के नाम से अपनी अंतिम सांसे गिन रहा है।
मार्च-अप्रैल के महीने में मनरेगा के मज़दूरों को दी जाने वाली मज़दूरी की नई दरें घोषित हो जाती थीं। पिछले दसियों साल से यह फ़रवरी और मार्च में ही घोषित होता रहा है।
इस बार आधा अप्रैल पार कर गया है।
मनरेगा जो अब वीजी-रामजी हो गया है, कोई मज़दूरी पुनरीक्षण घोषित नहीं हुआ है। यहां गामीण क्षेत्र के 11.03 करोड़ मजदूरों की सक्रिय हिस्सेदारी होनी ही है। इसमें काम करने वाले मज़दूर भी सरकार द्वारा नयी मज़दूरी की घोषणा का इंतज़ार कर रहे हैं।
नोएडा में मज़दूरों का आंदोलन अन्य राज्यों में चल रहे आंदोलनों से ज्यादा उग्र था। इस आंदोलन से हरियाणा, राजस्थान के मज़दूर आंदोलन और वहां के न्यूनतम सैलरी के बारे में और भी स्पष्टता आई है। अब इन राज्यों द्वारा घोषित न्यूनतम वेतनमान के बीच तुलना करना भी आसान है।
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न्यूनतम मज़दूरी का गणित
हरियाणा में 2025 में ट्रेड यूनियन और फ़ैक्ट्री मालिकों के प्रतिनिधियों को लेकर न्यूनतम सैलरी के संदर्भ में एक कमेटी का गठन किया गया था।
यहां यह साफ़ करना ज़रूरी है कि सैलरी में दो हिस्सा होता है। एक स्थिर और दूसरा अस्थिर। स्थिर हिस्सा बेसिक माना जाता है और दूसरा हिस्सा बाज़ार से प्रभावित होता है, ऐसे में उसके मूल्यों में बढ़ोत्तरी या बदलाव होने से उस हिस्से का मूल्य हर छह महीने में ठीक किया जाता है।
सामान्य आंकड़ों के आधार पर यह माना जाता है कि एक वयस्क बालिग का उपभोग 2700 कैलोरी है। इस आधार पर हरियाणा (अंबाला, पानीपत, बहादुरगढ़, हिसार के मूल्य सूचकांकों के आधार पर) के फ़ैक्ट्री में काम करने वाले एक मज़दूर को भोजन पर प्रति महीने 14,274.88 रुपये खर्च होंगे।
इसके अलावा आवास, बिजली, बच्चों की पढ़ाई और दवा आदि का खर्च जोड़ें तो यह 23,196.88 रूपये बनता है। इस संस्तुति में बेसिक सैलरी का ज़िक्र नहीं हुआ है।
यह आमतौर पर वैरियेबल्स (लागातार बदलते रहने वाले) का 40-60 प्रतिशत होता है या बेसिक के 50 से 70 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी होनी चाहिए। यह हालात के अनुसार कम या अधिक होता है। लेकिन, समान वेतनमान भुगतान के सिद्धांत के हिसाब से बेसिक केंद्रीय वेतनमान के आसपास ही होना चाहिए।
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हरियाणाः देर से लेकिन बहुत कम
हरियाणा में बनाई गई राज्य न्यूनतम सैलरी कमेटी ने दिसम्बर, 2025 में ही अपनी यह संस्तुति भेज दी थी। ज़ाहिर है, इसमें फ़ैक्ट्री मालिकों के प्रतिनिधियों की सहमति शामिल थी।
लेकिन, हरियाणा सरकार ने जब न्यूनतम सैलरी घोषित किया तब यह इस तरह था-
1. अकुशल के लिए 15,220.71 रुपये प्रति महीना,
2. अर्ध-कुशल 16,780.74 रुपये,
3. कुशल 18,500.81 रुपये और
4. अतिकुशल 19,425.85 रुपये प्रति महीना।
हरियाणा सरकार ने अन्य राज्यों की तुलना में जो सैलरी की वृद्धि की थी वह पहले 35 प्रतिशत अधिक थी। इस तौर इसने वाहवाही लूट ली।
लेकिन, ज़मीनी हक़ीक़त कोसों दूर थी। हरियाणा में यह वृद्धि पिछले से छह साल बाद हुई थी और यह कमेटी के संस्तुति से काफ़ी कम थी। ऐसे में, हरियाणा में मजदूरों का प्रदर्शन चल रहा था। मजदूर संगठन और आम मजदूर भी न्यूनतम सैलरी को 30 हजार रुपये प्रतिमाह करने की मांग कर रहे थे।
इन प्रदर्शनों में कई मज़दूर नेताओं को पकड़कर जेल में डाल दिया गया।
हरियाणा की तुलना में अब यदि हम उत्तर-प्रदेश की स्थिति देखें तब यह और भी बदतर दिखाई देती है। यहां न तो ट्रेड यूनियन के प्रतिनिधियों से बात करने की जहमत उठाई गई और न ही किसी कमेटी के गठन की बात सुनाई दी।
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यूपी में 10 साल से नहीं हुआ वेतन पुनरीक्षण
पिछले दस सालों से यहां वेतनमान में पुनरीक्षण का इतिहास नहीं है। नोएडा में मज़दूर आंदोलन के बाद एक नई सैलरी की घोषणा हुई है। ख़ासकर, नोएडा और ग़ाज़ियाबाद में इसमें 21 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी (कथित) की गई।
अन्य ज़िलों में यह 15 प्रतिशत से लेकर 9.21 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी है। सरकार ने न्यूनतम सैलरी को 20 हजार रुपये कर देने की अफ़वाह का खंडन किया।
अब गौतम बुद्ध नगर, नोएडा जिसका हिस्सा है और ग़ाज़ियाबाद ज़िले में न्यूनतम सैलरी इस प्रकार होगा-
1. अकुशल के लिए 13,690 रुपये प्रतिमाह,
2. अर्ध-कुशल के लिए 15,059 रूपया, और
3. कुशल के लिए 16,868 रूपया प्रतिमाह घोषित हुआ है।
म्यूनिसिपल शहरों में यह लगभग 15 प्रतिशत और अन्य ज़िलों में 9.21 या 9.22 प्रतिशत बढ़ा है।
उत्तर प्रदेश सरकार ने सैलरी बढ़ोत्तरी के संदर्भ में अधिक ध्यान वैरियबल्स के हिस्से पर दिया।
लेबर ब्यूरो के दिये आंकड़ों के आधार पर 15 अप्रैल, 2026 के इंडियन एक्सप्रेस में आंचल मैगजीन के लेख में बताया गया है कि 2021-फरवरी, 2026 के बीच औद्योगिक मज़दूरों के उपभोक्ता मूल्य सूचकांक की बढ़ोत्तरी ग़ाज़ियाबाद और गौतमबुद्ध नगर में 27.2 प्रतिशत थी।
इस सूचकांक की नज़र से भी उत्तर प्रदेश सरकार की न्यूनतम सैलरी में दी गई बढ़ोत्तरी नाकाफ़ी है।
दूसरा यह भी कि उत्तर प्रदेश में यह नया सैलरी तात्कालिक निर्णय की तरह लिया गया दिखता है जिसे तत्काल लागू करना तकनीकी तौर पर भी एक मुश्किल काम है।
उत्तर प्रदेश में अंतिम सैलरी पुनरीक्षण का काम 2012 में हुआ था। उस तुलना में मजदूरों के लिए वर्तमान में घोषित सैलरी कहीं से भी उपयुक्त नहीं लगता है।
यही कारण है कि उत्तर प्रदेश में न्यूनतम सैलरी में वृद्धि के बावजूद मज़दूरों में कोई उत्साह नहीं दिखा। ऊपर से सरकार ने मज़दूरों की जिस तरह से धरपकड़ की है और नक्सलवादी, पाकिस्तानी जैसे सूत्रों की तलाश की घोषणा किया है, उससे मज़दूरों में डर का माहौल बन गया है।
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गांव की ओर रुख़
फ़ैक्ट्री गेट पर पुलिस की मौजूदगी और घोषित नियम के लागू होने को लेकर संशय भी मज़दूरों को काम पर लौटने में बाधा बन रहा है। कल के कई मीडिया रिपोर्ट मज़दूरों के गांव लौटने का दृश्य दिखा रहे थे।
बहुत सारे मज़दूर ईरान पर अमेरीकी-इजराईली हमले से गैस आदि की समस्या के कारण पहले गांव की ओर रुख़ कर चुके हैं।
ऐसे में यह सवाल वाजिब है कि सरकार इस तरह के मामलों में ढंग से हस्तक्षेप क्यों नहीं कर रही है?
मजदूरों के श्रम भुगतान, उसके श्रम के लूट से पूंजी का विशाल भंडार खड़ा होता है। खुद सरकार देश को दुनिया की सबसे बड़ी तीसरी अर्थव्यस्था बनाने की घोषणा कर रही है और देश को विकसित देशों की श्रेणी में ला खड़ा कर देना चाहती है।
यह काम मज़दूरों और किसानों के योगदान के बिना संभव नहीं है।
आज किसानों को जो देय भुगतान है वह उसके लागत से या तो कम है या वह उसे हासिल कर पाने में सक्षम नहीं हो पा रहा है।
इससे बदतर स्थिति मज़दूरों की है। सरकार ऐसे भी बाज़ार मूल्य सूचकांकों से कम भुगतान देने का रिकार्ड बना रही है जबकि वास्तविक बाजार में मज़दूरों को उससे भी बहुत कम भुगतान दिया जा रहा है।
पूंजी निर्माण में यही दो क्षेत्र निर्णायक भूमिका में होते हैं।
यह सवाल भारत के अर्थशास्त्रियों के बीच बहस का मुद्दा बना हुआ है। यह बहस पहली बार नहीं हो रही है। यह पहले भी हुआ है और इसकी संरचना में कोई खास बदलाव होता हुआ नहीं दिख रहा है।
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मज़दूर अर्ध दास की हालत में पहुंचा दिये गए हैं
मज़दूर अर्ध-बेरोज़गारी और अर्ध-दासों के हालात में पहुंचा दिए गए हैं। किसान अपने ही खेतों में जकड़ दिए गए हैं और अतिरिक्त उत्पादन और मूल्य पाने के लिए या तो खुद अपने ही परिवारों को उसमें काम पर दिन-रात लगे हुए हैं या बंधुआ मज़दूरों का सहारा लेकर मुनाफ़ा कमाने की कोशिश कर रहे हैं।
यह भारत की आर्थिक संरचना में लादे गये बदलाव को दिखा रहा है। यह कितना बदलेगा, कहना मुश्किल है। लेकिन, हम सभी को नीचे से ऊपर जाता हुआ पैसा साफ़ दिख रहा है।
ऊपर से नीचे आता हुआ पैसा अब नहीं दिख रहा है। हम ऊपर जमा होता पैसा देख रहे हैं। इसका सबसे बुरा पक्ष राजनीतिक पार्टियों और उसके नेताओं के पास जमा होते पैसों में देख सकते हैं। आज भाजपा एक कारपोरेशन कंपनी के बराबर पैसे की मालिक है। बहुत सारे नेता चंद सालों में सैकड़ों करोड़ रुपये कमा ले रहे हैं।
वहीं छोटे उद्यमी और मध्यवर्ग तबाही में फंसता जा रहा है। उससे नीचे का निम्न मध्यवर्ग मजदूर के बराबर की जिंदगी जीने लगा है। मजदूर और किसानों की स्थिति को हम देख ही रहे हैं।
किसी भी हालात को बदलने के लिए सबसे ज़रूरी है अपने हालात को समझो। इसे समझने में हम जितना ही असफल होंगे, हम उतने ही गर्त में गहरे धंसते जाएँगे। यह समझ ही हमें एक दूसरे के करीब ला सकती हैं।
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राजनीतिक अर्थशास्त्र
नोएडा के मजदूर आंदोलन ने पहली बार यह बताया है कि मज़दूर शहर से गांव नहीं लौटना चाहता।
सरकार की नीतियां ज़रूर उन्हें गांव की ओर ठेल रही हैं। इसका राजनीति-अर्थशास्त्र इतना ही है कि मजदूर गांव से जुड़ा रहे जिससे सरकार उनसे अधिकतम निचोड़ ले पर उस पर सबसे कम खर्च करना पड़े।
मज़दूर गांव से जुड़ा रहेगा तो वह अपनी सामाजिक संरचना से पैदा हुई जाति, धर्म, क्षेत्र और लिंग के भेदभाव को ढोता रहेगा और गांव से शहर और शहर से गांव जाने में इस सांस्कृतिक पतनशीलता का एक माध्यम भी बना रहेगा।
यही काम गांव के किसानों के साथ किया जा रहा है और इसे गोदी मीडिया चैनलों से मध्यवर्ग के घरों में पहुंचाया गया है।
इस पतनशीलता के राजनीतिक अर्थशास्त्र की राजनीति ने भारत को अपने गिरफ्त में ले लिया है। यही वह बात है जिसे समझना और इसकी आलोचना शुरू करना, एक शुरूआत हो सकती है। नोएडा के मजदूरों ने निश्चित ही इसकी एक अच्छी शुरुआत की है।
(अंजनी कुमार वरिष्ठ पत्रकार, लेखक और टिप्पणीकार हैं।)
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