नोएडा ग़ाज़ियाबाद में सैलरी 3000 रुपये तक बढ़ाने का एलान, फिर भी फ़ैक्ट्रियों में नहीं लौटे मज़दूर
नोएडा में बीते एक हफ़्ते से चल रही मज़दूर अशांति के 13 अप्रैल को हिंसक रूप लेने के बाद उत्तर प्रदेश सरकार ने 14 अप्रैल को नोएडा और ग़ाज़ियाबाद में मज़दूरों के न्यूनतम वेतन में अंतरिम बढ़ोतरी का एलान किया। बावजूद फ़ैक्ट्रियां मज़दूरों से वीरान हैं।
योगी सरकार ने एक उच्च स्तरीय समिति गठित थी जिसने ‘अकुशल, अर्धकुशल और कुशल श्रेणियों’ में क़रीब तीन हज़ार रुपये तक वेतन बढ़ाने की सिफ़ारिश की है।
प्रदेश की बीजेपी सरकार का कहना है कि इससे नोएडा और ग़ाज़ियाबाद में वेतन में 21 फ़ीसदी तक की बढ़ोतरी हुई है। यह बढ़ोतरी एक अप्रैल 2026 से लागू होगी।
लेकिन उत्तर प्रदेश सरकार ने 20 हज़ार रुपये न्यूनतम वेतन से जुड़ीं ख़बरों को भ्रामक बताया है।
सैलरी में बढ़ोत्तरी के आदेश के अनुसार, अकुशल मज़दूरों को 13,690 रुपये, अर्धकुशल मज़दूर को 15,059 और कुशल मज़दूर को 16,868 रुपये दिया जाएगा। इसमें मूल वेतन और महंगाई भत्ता शामिल है।
ग़ौरतलब है कि नोएडा और ग्रेटर नोएडा के औद्योगिक क्षेत्रों में 13 अप्रैल को बड़े पैमाने पर भड़के मज़दूर आक्रोश के पीछे नाकाफ़ी सैलरी को सबसे बड़ा कारण बताया गया था।
मज़दूरों का कहना है कि 10-11 हज़ार JGपये में उनका गुजारा होना मुश्किल है और सैलरी को कम से कम 20,000 रुपये तक बढ़ाना होगा।
जबकि योगी सरकार का कहना है कि मज़दूरों की मांगों और उद्योगों की चुनौतियों को ध्यान में रखते हुए आगे वेज बोर्ड के माध्यम से स्थायी समाधान की प्रक्रिया भी शुरू की जाएगी।
उधर, लोकसभा में प्रतिपक्ष के नेता राहुल गांधी ने मज़दूरों की 20,000 सैलरी की मांग का समर्थन किया है।
उत्तर प्रदेश में विपक्ष के नेता और पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने पत्रकारों से कहा, “भाजपा सरकार के शासन में अन्याय चरम पर पहुंच गया है। हर तरह का अन्याय हो रहा है। आर्थिक अन्याय हो रहा है। बढ़ती महंगाई से अन्याय हो रहा है। बढ़ती बेरोजगारी से अन्याय हो रहा है। आज हमने नोएडा में देखा—मजदूर बड़े पैमाने पर अपने अधिकारों की मांग कर रहे थे। पूरी जिम्मेदारी प्रशासन और सरकार की है… जब दूसरे राज्यों में मजदूरों के वेतन बढ़ाए गए, तो उत्तर प्रदेश सरकार ने राहत क्यों नहीं दी?”
राहुल गांधी ने कहा मज़दूरों की 20,000 सैलरी की मांग के साथ
राहुल गांधी ने एक्स पर लिखा कि नोएडा में एक मज़दूर की महीने की तनख्वाह 12,000 रुपये है; जबकि किराया 4,000 से 7,000 रुपये के बीच है। जब तक उसे साल में 300 रुपये की मामूली बढ़ोतरी मिलती है, तब तक मकान मालिक किराया 500 रुपये बढ़ा देता है।
जब तक तनख्वाह इस बढ़ती महंगाई की बराबरी कर पाती है, तब तक यह बेकाबू महंगाई उसकी जान निचोड़ लेती है, उसे कर्ज़ के गहरे दलदल में डुबो देती है—यही है “विकसित भारत” की सच्चाई।
एक महिला मज़दूर ने कहा, “गैस की कीमतें लगातार बढ़ रही हैं, लेकिन हमारी तनख्वाह नहीं।” गैस के इस संकट के दौरान, इन लोगों को शायद घर में चूल्हा जलाने के लिए ही एक सिलेंडर के लिए 5,000 रुपये तक खर्च करने पड़े होंगे।
यह सिर्फ़ नोएडा की बात नहीं है। और न ही यह सिर्फ़ भारत की बात है। दुनिया भर में ईंधन की कीमतें आसमान छू रही हैं—पश्चिम एशिया में युद्ध के कारण सप्लाई चेन टूट गई है।
लेकिन अमेरिका के टैरिफ़ युद्ध, वैश्विक महंगाई, टूटती सप्लाई चेन—इन सब का बोझ मोदी जी के “दोस्त” उद्योगपतियों पर नहीं पड़ा है। सबसे ज़्यादा मार उस दिहाड़ी मज़दूर पर पड़ी है, जो तभी खाता है जब कमाता है।
वह मज़दूर, जिसका किसी भी युद्ध से कोई लेना-देना नहीं है, जिसने कोई नीति नहीं बनाई—उसने तो बस काम किया। चुपचाप। बिना किसी शिकायत के। और अपना हक़ मांगने पर उसे क्या मिलता है? दबाव और ज़ुल्म।
एक और अहम मुद्दा—मोदी सरकार ने बिना किसी से सलाह-मशवरे के, जल्दबाज़ी में एक कदम उठाते हुए, नवंबर 2025 से 4 लेबर कोड लागू कर दिए हैं, जिससे काम के घंटे बढ़ाकर 12 घंटे प्रतिदिन कर दिए गए हैं।
वह मज़दूर जो हर दिन 12-12 घंटे खड़ा होकर काम करता है, फिर भी अपने बच्चों की स्कूल फीस भरने के लिए कर्ज़ लेता है—क्या उसकी यह मांग बेतुकी है? और जो हर दिन उसके अधिकारों को कुचल रहा है—क्या यही “विकास” है?
नोएडा का मज़दूर 20,000 रुपये की मांग कर रहा है। यह कोई लालच नहीं है—यह उसका हक़ है, उसकी ज़िंदगी का एकमात्र सहारा है।
मैं ऐसे हर मज़दूर के साथ खड़ा हूँ—जो इस देश की रीढ़ है, लेकिन इस सरकार ने उसे एक बोझ बनाकर रख दिया है।
नहीं लौटे मज़दूर
आजतक की एक ख़बर के अनुसार, सरकार की घोषणा के बाद भी मंगलवार को नोएडा की फ़ैक्ट्रियों में मज़दूर काम पर नहीं लौटे।
जबकि स्थानीय मीडिया और सोशल मीडिया पर जो ख़बरें आ रही हैं उससे पता चल रहा है कि कई फ़ैक्ट्रियों के सामने और परिसर के अंदर मज़दूरों ने सैलरी बढ़ाने को लेकर धरना दिया है।
मंगलवार को नोएडा के सेक्टर 121 में स्थित क्लियो काउंटी सोसायटी के बाहर भी घरेलू कामगारों ने प्रदर्शन किया।
नोएडा पुलिस ने कहा कि यहां भी वही समस्या है- सैलरी की। कुछ घरेलू कामगार महिलाओं ने प्रदर्शन किया। वो दिहाड़ी बढ़ाए जाने की मांग कर रही थीं।
बुधवार को ग्रेटर नोएडा के शिवनाडर प्राईवेट यूनिवर्सिटी के कर्मचारियों ने भी कैंपस के बाहर धरना देना शुरू कर दिया है और उनकी भी मांग है कि सैलरी बढ़ाई जाए।
समाचार एजेंसी आईएएनएस के अनुसार, मंगलवार रात में भी नोएडा के कई इलाक़ों में कंटीले तार लगे दिखे, जगह जगह पुलिस बल और अर्द्धसैनिक बल तैनात हैं। जगह जगह बैरिकेटिंग लगी हुई है। सड़क पर से ईंट पत्थरों के टुकड़े हटाए जा रहे हैं। पूरे दिन भर जली हुई और क्षतिग्रस्त गाड़ियों को हटाया गया।
उधर कई कंपनियों पर कपड़ा उद्योग के मालिक संगठन की ओर से मज़दूरों से अपील की गई और कहा गया कि यूपी सरकार की न्यूनतम वेतन वृद्धि के फ़ैसले का वो स्वागत करते हैं।

‘साल भर में 29 रुपये बढ़ी सैलरी’
सोमवार को नोएडा के इंडस्ट्रियल एरिया में बड़ी तादाद में कामगारों ने सड़कों पर उतरकर प्रदर्शन किया। श्रमिकों ने कुछ जगहों पर तोड़फोड़ और पत्थरबाज़ी की और कुछ वाहनों में आग लगा दी।
मज़दूर वेतन बढ़ाने, बोनस देने, कामकाज का बेहतर माहौल बनाने और वर्किंग प्लेस में यौन उत्पीड़न रोकने के लिए कमेटी बनाने की मांग कर रहे थे।
एक मज़दूर एक पत्रकार से अपनी आप बीती बताते भावुक हो गया, “हम अपने बच्चों को भूखा सुलाते हैं। हम उन्हें सीने से लगाकर लोरी सुनाते हैं कि उसे भूख की याद न आए। और आप बड़ी बड़ी कंपनियां चलाते हो और खुद को कहते हो कि आप बड़े आदमी हो? आप खोखले हो, किस बात के बड़े आदमी हो गए हो, जब किसी गरीब की हाय नहीं समझते, उसके खर्चे नहीं समझते हो, सबकुछ दिखाई देता है फिर भी अंधे बने बैठे हो।”
सोशल मीडिया पर मज़दूरों के समर्थन में कई पोस्टें वायरल हो रही हैं। सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म एक्स पर एक यूज़र ने लिखा, “साल 2007 में टीसीएस, इन्फोसिस,विप्रो, एचसीएल जैसी कंपनियों में इंजीनियर्स की एंट्री लेबल जॉब की सैलरी प्रतिमाह 25000 से 28000 तक थी, आज 19 साल बाद भी इन सभी कंपनियों में इंजीनियर्स की एंट्री लेबल जॉब 25000 से 28000 प्रति माह ही है। नोएडा जैसे महंगे शहर में अनस्किल्ड लेबर 2007 में 6 हजार से 10 हजार प्रति माह पाते थे और अब 19 साल बाद 10से 12 हजार रुपए पाते हैं, सरकार कह रही है देश बदल रहा है, मज़दूर कह रहे हैं कि उनके हालात कब बदलेंगे।”
नोएडा की एक फ़ैक्ट्री के एक मज़दूर ने एक यूट्यूब चैनल के पत्रकार को बताया कि ‘बीते एक साल में सैलरी में 29 रूपये की बढ़ोत्तरी हुई है।’
इधर ईरान पर अमेरिका और इसराइल ने एक महीने से मिलकर हमला बोला हुआ है जिससे होर्मुज़ स्ट्रेट का जो संकरा समुद्री रास्ता है वो बंद पड़ा है, जहां से भारत की अधिकांश एलपीजी गैस आती है। इससे देश में एलपीजी का संकट खड़ा हो गया है। प्रवासी मज़दूर जो छोटे सिलेंडर से काम चलाते हैं और उसे प्रति किलो के हिसाब से रिफिल कराते हैं, उन्हें वो गैस 100 रुपये से बढ़कर 400 रुपये प्रति किलो मिलने लगी है, जिससे मज़दूरों के हालात खराब हुए हैं। जो कमाने के लिए वो घर से बाहर निकले थे, उसमें बचत करना मुश्किल हो गया है।
पत्रकार पंकज चतुर्वेदी ने फ़ेसबुक पर लिखा है-
दिल्ली से सटे नोएडा में इतना बड़ा श्रमिक प्रतिरोध खड़ा हुआ — कविता में श्रमिक का रोना रोने वाले दिल्ली और उसके आसपास रहने वाले कोई प्रलेस, जलेस, कलेस के कवि वहाँ दिखे नहीं ? आपस में कुत्ता- बिल्ली से लड़ने वाले हिन्दी के लेखक जो अपनी रचनाओं में सर्वहारा वर्ग की दुहाई देते हैं – कहीं कागज पर बयान देते भी नहीं दिखे ।
इंदिरा जी के समय दिल्ली के ओखला गाँव में औधयोगिक क्षेत्र विकसित हुआ था । जब कारखाने बढ़ने लगे तो उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी ने एक कालजयी कदम उठाया- “न्यू ओखला इन्डस्ट्रीअल एरिया ” यानि नोएडा की नींव रखी। आज नोएडा देश- दुनिया के आर्थिक विकास की बड़ी धुरी है ।
पानीपत की रिफ़ाइनरी में 20,000 मज़दूरों की हफ़्ते भर तक चली हड़ताल के बाद हरियाणा में न्यूनतम मज़दूरी बढ़ गई। इसके बाद नोएडा के एक कारखाने में यही मांग उठी और फिर न्यूनतम वेतन बढ़ाने की मांग को ले कर कोई 40 हजार मज़दूर सड़कों पर आ गए। उसके बाद योगी सरकार ने दमन का डंडा शुरू कर दिया। मजदूर संगठन बिगुल के चार लोग जेल भेज दिए गए। कोई 300 मज़दूर गिरफ्तार किए गए हैं। और अब “देश के खिलाफ गहरी साजिश” जैसा कुछ षड्यन्त्र गढ़ा जा रहा है , जिसकें कुछ व्हाट्सएप समहू को फर्जी बता कर कार्यवाही हो रही है।
कल नोएडा के मजदूर आंदोलन में हिंसा हुई जिसका समर्थन नहीं किया जा सकता- बहुत से कार शो रूम में आग लगाई गई, कारखाने में तोड़ फोड़ हुई – इस तरह की हरकतें देश और समाज के लिए और आंदोलन के लिए अस्वीकार हैं लेकिन आखिर यह हालात बने क्यों?
मजदूरों का कहना है कि मौजूदा सैलरी बहुत कम है और महंगाई के हिसाब से नहीं बढ़ी।
समय पर वेतन न मिलना
ओवरटाइम का भुगतान ठीक से न होना
छुट्टी और सुरक्षा की कमी
इन तीन मुख्य वजहों से धीरे-धीरे गुस्सा बढ़ा और अब बड़े स्तर पर फूट पड़ा।
रिचा ग्लोबल, पैरामाउन्ट एक्सपोेर्ट, रैनबो फएबबर्ट, अनुभव एपेरल जैसे गारमेंट/एक्सपोर्ट हाउस, होजरी (कपड़ा) उद्योग, कुछ इलेक्ट्रॉनिक्स व अन्य मैन्युफैक्चरिंग यूनिट की यूनियन सबसे पहले सड़क अपर आईं। उसके बाद आंदोलन “एक दर्जन से ज्यादा कंपनियों” में फैल गया।
यह खासकर होज़री कॉम्प्लेक्स (Phase-2, Noida) में केंद्रित रहा। यहां करीब 300 फैक्ट्रियों का क्लस्टर है, जिनमें काम आंशिक रूप से ठप हुआ। इसके अलावा सेक्टर 60 और 63 -62 दादरी रोड के कारखाने बंद हो गए और अब वहाँ बड़ी संख्या में पीएससी और अर्धसैनिक बल लगा दिए गए हैं।
पुलिस बल प्रयोग के विरोध में जब हिंसा , गाड़ियां जलीं , उसके पहले मीडिया ने खबर तक नहीं दिखाई ।
अब पुलिस का ध्यान तीन बातों पर है और नोएडा में पुलिस की रणनीति साफ दिखती है:
👉 भीड़ को तुरंत तोड़ो (बल प्रयोग)
👉 लोगों को डराओ (गिरफ्तारी, केस)
👉 संगठन को खत्म करो (नेताओं को निशाना),
जम कर वीडियो में दिख रहे चेहरों को सॉफ्ट वेयर की मदद से चिन्हित कर पकड़ और पीटा जा रहा है । अब 8 की जग 12 गहने काम आक्रवाने, न्यूनतम मजदूरी कागज और हाथ पर अलग देने, छुट्टी और सुरक्षा की बात कहीं दिख नहीं रही, मीडिया और पुलिस ने इसे कानून व्यवस्था का मुद्दा बना लिया है और इसका निदान इसी तरह कर रही है।
शायद कुछ कम्युनिस्ट नेता जरूर यहाँ होते लेकिन वे तो अभी बंगाल के ढह गए गढ़ में उम्मीद खोजने गए हैं, बाकी राजनीतिक दल तो मज़दूरों के मामले में शोषण करने वालों के पक्ष में रहते हैं।
नागरिक समाज तो बाद में आएगा एक रिपोर्ट बना कर प्रेस कांफ्रेंस करने जिसे कोई मीडिया छापेगा नहीं , बस कुछ यू ट्यूब चेनल पर दिखेगा ।
श्रमिक प्रगति की राह का संचालक है लेकिन उसके अधिकार कुछ नहीं और अब उसकी छबि एक अंतर्राष्ट्रीय साजिश में शामिल हिंसक की रह गई — नारायण सुर्वे जैसे कवि अब उनकी बस्ती में हैं नहीं। उन पर कविता लिखने वालों के अपार्टमेंट की मंजिल कुछ ऊंची है जहां से आवाज जाएगी– तब तक मजदूरों को पुलिस सही तरीके से तोड़ चुकी होगी।
मराठी कवि नारायण सुर्वे की कविता का अनुवाद-
मैं बुरी तरह थका हुआ हूँ, अंदर-बाहर होता रहता हूँ।
मेरी रोजी-रोटी मेरा रोज़ का संदेह है।
मैं एक मज़दूर हूँ, एक चमकती तलवार हूँ,
साहित्यिक भीड़ को चीरने के लिए तैयार हूँ।
कांपो मत, आह मत भरो,
मेरे पाप मामूली होंगे, श्री सारस्वत।
मैंने सब कुछ देखा, सुना, परखा।
मैंने इसे अपनी खास शैली में लिख डाला।
उन सभी सीखों, नुकसानों, उस सारी उलझन को,
जैसे-जैसे मैं जीता हूँ, वैसे-वैसे लिखता हूँ, यही मैं स्वीकार करता हूँ।
रोटी तो महँगी है, पर मुझे और चाहिए।
मैं तुम्हारे दरवाजे पर अपनी छाप छोड़ता हूँ।
अपने शब्दों के बदले मैं फूल अर्पित करता हूँ।
मैं उन्हें तलवारें देता हूँ, उनकी शक्तियों को मुक्त करता हूँ।
मैं अकेला नहीं हूँ; हमारा समय आ गया है।
सावधान रहो, आगे तूफ़ान आने वाला है।
मैं एक मज़दूर हूँ, एक चमकती तलवार हूँ,
साहित्यिक भीड़ को चीरने के लिए तैयार हूँ।
कांपो मत, आह मत भरो,
मेरे पाप मामूली होंगे,
आज जरूरत है नागरिक समज आगे आए और प्रशासन और मजदूरों के बीच संवाद का काम करे , ताकि दोनों तरफ से हिंसा रुके । कारखाने आदि भी बंद न हों । एक दिन में कोई चार हजार करोड़ का नुकसान कल हो चुका है ।
कुछ वकील आगे आयें और गरीब मजदूरों की जमानत, उन्हें पुलिस प्रताड़ना से बचाने का काम करें ।
लेखक कवि आदि आगे आयें और प्रशासन पर दवाब डालें कि श्रमिक समस्या को पुलिस समस्या बना कर इसमें साज़िश का एंगल तलाशना बंद किया जाए।
नोएडा से बड़ी संख्या में पलायन शुरू हो चुका है -डर से, भूख से असुरक्षा से।
- मेरठ और नोएडा भारत के बारे में क्या बता रहे हैं?
- बजट का 60% आवंटन सिर्फ़ कर्ज़, रक्षा और सड़क पुल बंदरगाह में स्वाहा, सबसे अधिक खर्च कहां कर रही है मोदी सरकार?
- तमिलनाडु के सैमसंग कर्मचारियों की हड़ताल समाप्त, क्या निलंबित मज़दूरों को बहाल करेगी कंपनी?
- संभल में पीयूसीएल की फैक्ट फाइंडिंग की अंतरिम रिपोर्ट, बीजेपी और प्रबुद्ध नागरिकों का क्या कहना है?
- पंजाब में 750 एकड़ लावारिस ज़मीन पर भूमिहीन दलितों ने चिराग जलाकर किया दावा, अगली फसल से होगा कब्ज़ा


