मानेसर यूनियन लीडर अजीत को बेल, जज ने कहा- सैलरी बढ़ाने की मांग जुर्म नहीं
“अगर ‘अभी तो ये अंगड़ाई है, आगे और लड़ाई है, इंकलाब ज़िंदाबाद’ कहना जुर्म है, तो सिस्टम के लिए शर्म की बात है…वर्करों या कर्मचारियों द्वारा सरकार से अपनी सैलरी बढ़ाने की मांग करना अपराध नहीं है।”
गुरुग्राम डिस्ट्रिक्ट कोर्ट की यह टिप्पणी अब चर्चा का विषय बन गई है, जहां पिछले कई हफ्तों से मज़दूर सैलरी, काम के घंटे और सम्मानजनक कामकाजी माहौल की मांग को लेकर आंदोलन कर रहे हैं।
इंडियन एक्सप्रेस की ख़बर के अनुसार, सोमवार, 18 मई को गुरुग्राम जिला अदालत की जज डॉ. गगन गीत कौर ने बेलसोनिका ऑटो कंपोनेंट इंडिया एम्प्लॉइज यूनियन के जनरल सेक्रेटरी अजीत सिंह को जमानत दे दी।
अजीत उन यूनियन लीडरों में शामिल थे जिन्हें 12 और 13 अप्रैल की रात हरियाणा पुलिस ने गिरफ़्तार किया था, वह एक महीने से ज्यादा समय से जेल में थे।
इसमें इंकलाबी मज़दूर केंद्र के लीडर श्यामबीर समेत पांच यूनियन लीडर अभी भी जेल में हैं।
मामला सिर्फ एक गिरफ्तारी का नहीं है। यह मानेसर के उस बड़े मजदूर आंदोलन से जुड़ा है जो अप्रैल की शुरुआत से औद्योगिक इलाकों में फैलता गया। मजदूरों की मांग थी कि बढ़ती महंगाई के बीच वेतन बढ़ाया जाए, आठ घंटे की शिफ्ट सुनिश्चित हो, ओवरटाइम का दोगुना भुगतान मिले और फैक्ट्रियों में काम की स्थिति बेहतर की जाए।
रिचा ग्लोबल एक्सपोर्ट्स समेत कई फैक्ट्रियों में काम रोकने और प्रदर्शन की खबरें सामने आईं। आंदोलन धीरे-धीरे नोएडा और दूसरे औद्योगिक इलाकों तक पहुंच गया। इसके बाद पुलिस ने कई FIR दर्ज कीं और यूनियन सदस्यों समेत दर्जनों मजदूरों पर गंभीर धाराएं लगा दीं।
आईएमटी मानेसर थाने में दर्ज FIR नंबर 94/2026 में आपराधिक साजिश, हत्या के प्रयास, सरकारी कर्मचारी पर हमला और दंगा जैसी धाराएं शामिल हैं।
इन धाराओं में 10 साल तक की सज़ा का प्रावधान है। नोएडा में भी मज़दूरों और यूनियन सदस्यों के ख़िलाफ़ अलग-अलग FIR दर्ज हुईं। नोएडा पुलिस ने कथित तौर पर लखनऊ के एक पत्रकार और उसी संगठन से जुड़ी एक मज़दूर अधिकार कार्यकर्ता पर रासुका यानी एनएसए- राष्ट्रीय सुरक्षा क़ानून लगा दिया है।
रासुका आमतौर पर देशद्रोह के मामले जैसा है जिसमें बिना आरोप तय किए सालों तक जेल में बंद रखा जा सकता है।
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कोर्ट में क्या हुआ
अदालत में अजीत सिंह की तरफ से वरिष्ठ वकील वृंदा ग्रोवर ने कहा कि जिस दिन हिंसा की बात कही जा रही है, उस दिन अजीत मौके पर मौजूद नहीं थे. उनके खिलाफ हिंसा भड़काने से जुड़ी कोई ठोस सामग्री भी नहीं है।
बचाव पक्ष ने यह भी कहा कि गिरफ्तारी के समय कानूनी प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया और परिवार को सूचना तक नहीं दी गई।
सुनवाई के दौरान पुलिस ने अदालत में अजीत सिंह के भाषण का वीडियो चलाया। वीडियो में वह मजदूरों के सैलरी और अधिकारों पर बात कर रहे थे।
अदालत ने मौखिक टिप्पणी में कहा कि पुलिस हिरासत जारी रखने के लिए पर्याप्त सामग्री पेश नहीं कर सकी।
इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार, सरकारी वकील ने माना कि हिंसा वाले दिन सिंह घटनास्थल पर मौजूद नहीं थे। हालाँकि, पुलिस ने आरोप लगाया कि उन्होंने एक साज़िश रची थी और घटना से पहले एक व्हाट्सऐप ग्रुप में पोस्ट किए गए मैसेज और एक सार्वजनिक भाषण के ज़रिए मज़दूरों को उकसाया था।
लेकिन, पुलिस द्वारा पेश किए गए इलेक्ट्रॉनिक सबूत कोर्ट में खरे नहीं उतरे। जब जाँच अधिकारी ने कोर्ट में सिंह के भाषण का एक वीडियो चलाया, तो जज ने पाया कि उसमें “दैनिक ज़रूरतों की बढ़ती कीमतों के मुकाबले कम मज़दूरी के कारण मज़दूरों को पेश आ रही समस्याओं के बारे में अपील के रूप में दिए गए भाषण के अलावा कुछ भी आपत्तिजनक नहीं था।”
सरकारी पक्ष द्वारा यह स्वीकार करने के बाद कि 4 अप्रैल के भाषण की बाद की ट्रांसक्रिप्शन में भी कुछ भी आपत्तिजनक नहीं था, जज ने फ़ैसला सुनाया कि 13 अप्रैल से सिंह को बिना किसी प्रथम दृष्टया सबूत के जेल में रखना अवैध हिरासत के बराबर था।
कोर्ट ने कहा, “उन्हें गिरफ़्तार करने का कोई सबूत नहीं दिखाया गया है और वे 13.04.2026 से हिरासत में हैं। यह बिना किसी सबूत के आवेदक-आरोपी की अवैध हिरासत के बराबर है… प्रथम दृष्टया, आज तक आवेदक-आरोपी के ख़िलाफ़ कोई भी आपत्तिजनक सबूत नहीं दिखाया गया है।”
आरोपी की वकील वृंदा ग्रोवर ने दलील दी कि अजीत सिंह, जिनकी सेवाएँ उनके नियोक्ता द्वारा तब से समाप्त कर दी गई हैं, को 12-13 अप्रैल की दरमियानी रात को उनके गुड़गाँव स्थित घर से उठाया गया था, लेकिन पुलिस उन्हें गिरफ़्तारी के आधार बताने में नाकाम रही।
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सैलरी का गुस्सा
मानेसर की फैक्ट्रियों में काम करने वाले कई मज़दूर बताते हैं कि बीते कुछ वर्षों में काम का दबाव लगातार बढ़ा है, लेकिन तनख्वाह लगभग स्थिर बनी हुई है।
एक मजदूर ने कहा, “फैक्ट्री में हर महीने नया टारगेट आता है, लेकिन मज़दूरी वहीं की वहीं है। किराया, राशन, बच्चों की फीस सब बढ़ गया।”
यह आंदोलन ऐसे समय हो रहा है जब देशभर में अलग-अलग सेक्टर के कर्मचारी लगातार विरोध और हड़तालें कर रहे हैं।
हाल के महीनों में बैंक कर्मचारियों ने निजीकरण और भर्ती से जुड़े मुद्दों पर हड़ताल की।
बिजली कर्मचारियों ने कई राज्यों में नई श्रम नीतियों और निजीकरण के खिलाफ प्रदर्शन किए।
आंगनवाड़ी और आशा कार्यकर्ताओं ने मानदेय बढ़ाने की मांग को लेकर कई राज्यों में धरने दिए।
हरियाणा, पंजाब और महाराष्ट्र में औद्योगिक मजदूरों के बीच ठेका रोजगार और कम वेतन को लेकर विरोध बढ़ा है।
वर्कर्स यूनिटी की कई रिपोर्टों में पिछले कुछ वर्षों से यह सवाल लगातार उठता रहा है कि आर्थिक विकास और निर्यात बढ़ने के बावजूद फैक्ट्री मजदूरों की आय और काम की स्थिति में अपेक्षित सुधार क्यों नहीं हो रहा?
खासकर ऑटोमोबाइल और गारमेंट सेक्टर में लंबे काम के घंटे, अस्थायी रोजगार और यूनियन गतिविधियों पर दबाव को लेकर लगातार शिकायतें सामने आती रही हैं।
मानेसर का इलाका पहले भी बड़े मजदूर आंदोलनों का केंद्र रहा है। मारुति सुजुकी संघर्ष के बाद से यहां यूनियन गतिविधियों और पुलिस कार्रवाई को लेकर बहस लगातार बनी रही है।
मजदूर संगठनों का आरोप है कि वेतन और श्रम अधिकारों की मांग को कई बार कानून-व्यवस्था के मुद्दे की तरह देखा जाता है।
फिलहाल अजीत सिंह को जमानत मिल चुकी है, लेकिन मानेसर और नोएडा में दर्ज मामलों की सुनवाई जारी है।
फैक्ट्री इलाकों में काम करने वाले मजदूरों के बीच अब भी यह सवाल बना हुआ है कि क्या बेहतर वेतन और सम्मानजनक काम की मांग करना टकराव की वजह बनता जाएगा, या बातचीत से रास्ता निकलेगा?
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