सैमसंग के दक्षिण कोरिया प्लांट में 40,000 वर्करों ने सैलरी बोनस बढ़ाने की मांग की, मुनाफ़े में हिस्सा देने को कहा

सैमसंग के दक्षिण कोरिया प्लांट में 40,000 वर्करों ने सैलरी बोनस बढ़ाने की मांग की, मुनाफ़े में हिस्सा देने को कहा

दक्षिण कोरिया में सैमसंग इलेक्ट्रॉनिक्स के 40,000 वर्करों ने गुरुवार को विशाल रैली निकालकर कंपनी के अकूत मुनाफ़े में हिस्सेदारी की मांग की।

सैमसंग की यूनियन ने 2024 में पहली बार एक बड़ी हड़ताल की थी और उसके बाद से यह बहुत बड़ी हड़ताल मानी जा रही है।

यूनियन ने चेतावनी दी है कि अगर उनकी मांगें पूरी नहीं हुईं तो वे 18 दिनों की हड़ताल शुरू कर सकते हैं, जिससे बूम करती एआई इंडस्ट्री के ज़रूरी चिप्स की आपूर्ति बाधित हो सकती है।

यूनियन ने पहले ही 21 मई से हड़ताल पर जाने का आह्वान किया है।

दक्षिण कोरिया की दिग्गज कंपनी ने कहा कि वह वेतन संबंधी चल रही वार्ता में शीघ्र समझौते पर पहुंचने के प्रयास जारी रखेगी।

सैमसंग यूनियनों की मांगें क्या हैं?

डीडब्ल्यू के अनुसार, सैमसंग के यूनियनों ने कहा कि कंपनी ने अपने शानदार प्रदर्शन के बावजूद पर्याप्त वेतन पैकेज नहीं दिया। एआई चिप्स की बढ़ती मांग के चलते सैमसंग के शेयरों में पिछले एक साल में लगभग 300% की बढ़ोतरी हुई है।

हाल में कंपनी के का तिमाही मुनाफ़ा 38.5 अरब डॉलर को पार कर गया है, क्योंकि  एआई के चलते पूरी दुनिया में मेमोरी चिप्स की डिमांड बड़े पैमाने पर बढ़ी है।

यूनियनें अन्य मांगों के साथ-साथ सैमसंग से बोनस भुगतान पर लगी सीमा को हटाने की मांग कर रही हैं। वर्तमान में यह सीमा सालाना मूल वेतन के 50% पर निर्धारित है।

यूनियनों का कहना है कि चिप डिवीजन में काम करने वाले 76 मिलियन वॉन (51,000 डॉलर यानी क़रीब 48 लाख रुपये ) कमाने वाले कर्मचारी को 2025 में 38 मिलियन वॉन (26,000 डॉलर, क़रीब 24.5 लाख रुपये) का बोनस मिलेगा।

यह प्रतिद्वंद्वी कंपनी एसके हाइनिक्स में इसी तरह के पद पर कार्यरत कर्मचारी को मिलने वाले बोनस के एक तिहाई से भी कम है। पिछले सितंबर में, एसके हाइनिक्स ने बोनस की सीमा को समाप्त करने पर रज़ामंदी दे थी।

एसके हाइनिक्स सैमसंग इलेक्ट्रॉनिक्स की सीधी प्रतिद्वंदी कंपनी है। ये दोनों दक्षिण कोरियाई कंपनियां मिलकर दुनिया के लगभग दो-तिहाई मेमोरी चिप्स का उत्पादन करती हैं ।

2022 में चैटजीपीटी के लॉन्च के बाद, सैमसंग को पीछे छोड़ते हुए एसके हानिक्स, एनवीडिया के हाई-बैंडविड्थ मेमोरी (एचबीएम) चिप्स का मुख्य आपूर्तिकर्ता बन गई।

यूनियन ने बोनस ढांचे को ख़ारिज किया

पीपुल्स मैटर्स के अनुसार, सैमसंग ट्रेड यूनियन लगभग 74,000 वर्करों का प्रतिनिधित्व करता है और उसने कहा कि भारी मुनाफ़े के बावजूद कंपनी पर्याप्त बोनस देने में नाकाम रही है।

यूनियन ने प्रबंधन के उन प्रस्तावों को खारिज कर दिया है जिनमें प्रतिबंधित स्टॉक के रूप में बोनस शामिल थे, इसके बजाय उन्होंने अधिक नकद बोनस और बोनस की सीमा को हटाने की मांग की है।

यूनियन नेता चोई सेउंग-हो ने विरोध प्रदर्शन के दौरान एक क्रेन पर बने मंच से कहा, “जब तक हमारी वाज़िब मांगें पूरी नहीं हो जातीं, हम यह लड़ाई नहीं रोकेंगे.”

एआई चिप्स की आपूर्ति पर ख़तरा मंडराया

सैमसंग ने बोनस की सीमा हटाने की यूनियन की मांगों को ख़ारिज कर दिया है, लेकिन कहा है कि वह अतिरिक्त धनराशि की पेशकश करेगा ताकि मेमोरी चिप्स विकसित करने वाले मेमोरी डिवीजन के कर्मचारी इस साल प्रतिस्पर्धियों की तुलना में अधिक कमा सकें।

यदि बातचीत विफल रहती है, तो यूनियनें 21 मई से शुरू होने वाली 18 दिवसीय हड़ताल की योजना बना रही हैं। उनका कहना है कि उत्पादन ठप होने से कंपनी को प्रतिदिन 1 ट्रिलियन वॉन (700 मिलियन डॉलर, 66000 मिलियन रुपये) से अधिक का नुकसान हो सकता है।

सैमसंग के अधिकारियों का कहना है कि एक छोटी सी रुकावट भी ग्राहकों के भरोसे को नुकसान पहुंचा सकती है और उससे उबरने में सालों लग सकते हैं।

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) के बढ़ते उपयोग से चिप निर्माताओं को फायदा हुआ है, लेकिन ईरान के साथ अमेरिका और इसराइल की जंग ने सप्लाई चेन को लेकर चिंताएं बढ़ा दी हैं।

इस संकट ने हीलियम जैसी प्रमुख सामग्रियों की उपलब्धता को सीमित कर दिया है और ऊर्जा की लागत को बढ़ा दिया है।

यूनियनों का विरोध करने के लिए लंबे समय से जानी जाने वाली सैमसंग कंपनी में 2024 में पहली श्रमिक हड़ताल हुई थी

वैसे भी नवउदारवादी नीतियां पूरी दुनिया में फ़ेल हो चुकी हैं और भारत से लेकर यूरोप और अमेरिका तक बड़े बड़े कार्पोरेशन, सुपर प्राफ़िट निचोड़ने के लिए मज़दूरों की सैलरी उस दर से नहीं बढ़ा रहे हैं जिस दर से महंगाई बढ़ी है।

नतीजतन पूरी दुनिया में वर्करों और कर्मचारियों की वास्तविक सैलरी कम हुई है यानी पहले के मुकाबले उनकी ख़रीद शक्ति लगातार घट रही है। एक बड़ी आबादी को ग़रीबी रेखा के आस पास रखा जा रहा है। भारत समेत एशियाई देशों में आम तौर पर हंगर सैलरी पर मज़दूरों को बस ज़िंदा रखा जा रहा है जिससे हालात विकट हो गए हैं।

और सैलरी बढ़ाने की लड़ाईयां अलग अलग रूपों में हर खित्ते में सामने आ रही हैं।

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Workers Unity Team

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