मानेसर वर्कर्स प्रोटेस्टः पांच और मज़दूर नेता जेल से बाहर आए

मानेसर वर्कर्स प्रोटेस्टः पांच और मज़दूर नेता जेल से बाहर आए

आख़िरकार अप्रैल में हुए मानेसर वर्कर्स प्रोटेस्ट में जेल के अंदर बंद छह मज़दूर नेताओं को रिहा कर दिया गया।

बीते सोमवार को इंकलाबी मज़दूर केंद्र के लीडर श्यामबीर, हरीश, राजू, पिंटू और आकाश भोंडसी जेल से बाहर आ गए।

इस मामले में बेलसोनिका यूनियन के महासचिव और वर्तमान में कंपनी से निकाल दिए गए नेता अजित सिंह 19 मई को ही बाहर आ गए थे।

9 अप्रैल को मानेसर के रिचा ग्लोबल में व्यापक मज़दूर उभार के बाद कुल 61 लोगों को गिरफ़्तार किया गया था, जिनमें 44 रिचा ग्लोबल और एक अन्य फ़ैक्ट्री के मज़दूर थे, जिनपर तोड़फोड़, शांतिभंग आदि ज़मानती धाराओं में एफ़आईआर 95 दर्ज की गई थी और उन्हें गिरफ़्तार किया गया था।

इनमें 22 महिला मज़दूर और 22 पुरुष वर्कर थे। इन्हें गिरफ़्तारी के कुछ ही दिन बाद, क़रीब 22 अप्रैल तक रिहा कर दिया गया था।

इसके बाद 17 मज़दूर नेता और अन्य मज़दूरों पर एक दूसरी एफ़आईआर संख्या 94 के तहत गिरफ़्तार किया गया, जिसमें धारा 307 यानी हत्या की कोशश जैसे संगीन जुर्म का मामला दर्ज किया गया था।

इस मामले में पहली ज़मानत 18 मई को बेलसोनिका यूनियन के महासचिव अजीत सिंह को मिली। बेल की अपील पर हुई बहस में गुरुग्राम जिला अदालत की जज डॉ. गगन गीत कौर ने पुलिस की कार्यशैली पर तीख़ा सवाल किया और उन्हें जमकर लताड़ा।

न्यायाधीश कौर ने कहा कि अजीत सिंह ने प्रोटेस्ट भड़काया था इसका पुलिस के पास क्या सबूत है तो पुलिस ने एक वीडियो दिखाया जिसमें वो मज़दूरी बढ़ाने, ठेका प्रथा ख़त्म करने और इंकलाब ज़िंदाबाद के नारे लगाते हुए दिख रहे हैं।

इसके बाद अदालत ने तीखी टिप्पणी करते हुए कहा था कि “अगर ‘अभी तो ये अंगड़ाई है, आगे और लड़ाई है, इंकलाब ज़िंदाबाद’ कहना जुर्म है, तो सिस्टम के लिए शर्म की बात है…वर्करों या कर्मचारियों द्वारा सरकार से अपनी सैलरी बढ़ाने की मांग करना अपराध नहीं है।”

इसके बाद उन्हें ज़मानत दे दी गई।

अजीत उन यूनियन लीडरों में शामिल थे जिन्हें 12 और 13 अप्रैल की रात हरियाणा पुलिस ने गिरफ़्तार किया था, वह एक महीने से ज्यादा समय से जेल में रहे।

अभी जो लीडर छूटे हैं, उन्हें भी ज़िला अदालत से ही ज़मानत मिली है।

11 मज़दूर अभी भी जेल में बंद हैं, जिनमें चार हरियाणा हाईकोर्ट पहुंच गए, जिनकी तारीफ़ जुलाई में दी गई है। क़ानूनी जानकारों का कहना है कि तबतक जेल में बंद हुए उन्हें तीन महीने पूरे हो जाएंगे। और क़ानून के मुताबिक तबतक चार्जशीट दाख़िल नहीं होती तो वो स्वतः ज़मानत पाने के हक़दार हो जाएंगे।

उम्मीद है कि बाकी मज़दूरों को भी जल्द रिहाई मिल जाएगी।

वर्कर्स यूनिटी से बात करते हुए अजीत सिंह ने कहा कि ठेका मज़दूरों को यूनियन की सदस्यता दिलाने के बेलसोनिका यूनियन के संघर्ष में वेतन असमानता, डबल ओवर टाइम, काम के हालात जैसे मुद्दे शामिल रहे।

उन्होंने कहा, “इस प्रदर्शन ने उत्तर भारत को अपनी चपेट में ले लिया और दक्षिण भारत के दो राज्यों कर्नाटक और तेलंगाना तक में वेतन वृद्धि की गई। मौजूदा मज़दूर आंदोलन एक तरह से पैन इंडिया यानी देशव्यापी स्वरूप ले चुका है।”

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Workers Unity Team

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