संसद मार्चः ऐसा विरोध प्रदर्शन, जैसा पहले कभी नहीं देखा गया, लेकिन इसने एक यादगार सबक सिखा दिया

संसद मार्चः ऐसा विरोध प्रदर्शन, जैसा पहले कभी नहीं देखा गया, लेकिन इसने एक यादगार सबक सिखा दिया

प्रोफ़ेसर सरोज गिरी

दिन ब दिन पहले हुए विरोध प्रदर्शन अब फीके और बेजान लगते हैं। विरोध और विपक्ष की राजनीति के पुराने तरीके 20 जुलाई के दिन टूट गए।

दिन ढलने तक झड़पें जारी रहीं। यह पंक्ति किसी युद्ध या लड़ाई की रिपोर्ट की लग सकती है। किसी विरोध प्रदर्शन के बारे में लिखे जाने के लिए यह शायद उपयुक्त न लगे।

लेकिन 20 जुलाई को दिल्ली में जो हुआ, उसकी कहानी में यह पंक्ति हमेशा शामिल रहेगी।

या यूं कहना ज़्यादा सटीक रहेगा कि जगह-जगह झड़पें जारी रहीं और इंटरनेट भी बंद रहा।

दरअसल, दिल्ली ने कल (20 जुलाई, मंगलवार को) जो देखा, वह बिल्कुल अलग था। दिन बढ़ने के साथ प्रदर्शन का स्वरूप बदलता गया और उसने नए-नए रूप ले लिए। वह किसी अमीबा की तरह था, जिसके कई सिर हों।

प्रदर्शनकारी अलग-अलग दिशाओं में घूमते और बहते दिखाई दे रहे थे, लेकिन किसी न किसी तरह फिर एक-दूसरे से जुड़ भी रहे थे। एक प्रदर्शनकारी ने कहा कि उसे भीड़ के बीच ऐसा लग रहा था जैसे वह लहरों पर सर्फिंग कर रहा हो।

महत्वपूर्ण यह नहीं रहा कि प्रदर्शन कैसे शुरू हुआ, बल्कि यह कि उसका अंत किस रूप में हुआ। प्रदर्शन का तय समय सुबह 9 बजे था। लेकिन उसका अंत अनगिनत मोर्चों और बिखरी हुई कतारों में हुआ।

देर रात तक बड़ी संख्या में प्रदर्शनकारी आसपास की गलियों और कोनों में अलग-अलग जगहों पर डटे हुए बताए जा रहे थे।

जो कुछ होने वाला था, उसके लिए प्रदर्शनकारी बिल्कुल तैयार नहीं थे। हर कदम और हर गुजरते घंटे के साथ भीड़ कोई नया रूप दिखा रही थी। संसद में विपक्ष के अनुभवी सांसदों ने भी बाद में इसे “ऑर्गेनिक मास” कहा।

नेतृत्वविहीन प्रदर्शन की यह स्थिति शायद सबसे अच्छी बात साबित हुई। जल्द ही यह जमावड़ा अपनी अलग गति, अपनी ऊर्जा और अपनी अप्रत्याशित दिशा हासिल कर चुका था।

मज़दूरों के बाद छात्र नौजवानों पर पुलिसिया दमन की चौतरफ़ा निंदा, अमित शाह के इस्तीफ़े की उठी मांग

youth protest tear gas
20 जुलाई मंगलवार को मार्च के दौरान पुलिस ने आंसू गैस के गोले दागे और लाठी चार्ज किया

‘द बैटल ऑफ अल्जीयर्स’ बनाम ‘द बैटल ऑफ़ दिल्ली’

इन प्रदर्शनों के बाद शायद जेनज़ी सिर्फ अपनी पढ़ाई और अपने ‘भविष्य’ पर ध्यान नहीं देगी, जो अक्सर ‘करियर’ का ही दूसरा नाम बन जाता है। इसके बजाय वे ‘द बैटल ऑफ अल्जीयर्स’ जैसी फ़िल्म देखेंगे और नेटफ्लिक्स पर लगातार देखने की संस्कृति का मतलब बदल देंगे।

मैं क्या कहना चाहता हूं? जो लोग नहीं जानते, उनके लिए इतना काफ़ी है कि लुटियंस दिल्ली में पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच ऐसी भिड़ंत हुई, जिसने उस फ़िल्म के कई दृश्य याद दिला दिए।

हम बार-बार पुराने क्लासिक किस्सों को नए रूप में देखते हैं, जैसा कि क्रिस्टोफ़र नोलन होमर की ‘ओडिसी’ के साथ करते हैं।

अब समय आ गया है कि कल के ख़तरे, वास्तविकता और पुलिस से हुई टक्कर को भी हमारी सोच, हमारी कल्पना और यहां तक कि पढ़े-लिखे युवाओं की उस संस्कृति का हिस्सा बनाया जाए, जिसमें वे बिना सोचे-समझे लगातार सांस्कृतिक सामग्री देखते रहते हैं।

इस पूरे घटनाक्रम में हाल में नोएडा में मजदूरों और मेहनतकशों के संघर्ष की गूंज भी सुनाई दे रही थी।

कई लोगों को लगा कि यह ऐसी भीड़ थी, जिसे उसके नेताओं ने छोड़ दिया था। मंच पर ऐसे बड़े-बड़े वक्ताओं की कतार नहीं थी, जो जोश से भरी भीड़ को एक साथ बांधे रख सके।

कॉकरोच पार्टी से आगे निकल गया आंदोलन

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20 जुलाई मंगलवार को मार्च के दौरान जंतर मंतर से कूच करता छात्रों युवाओं का हुजूम

चंद्रशेखर आज़ाद करीब 12 बजे संसद मार्ग पहुंचे। वहां मौजूद भीड़ लगातार उन पर दबाव बना रही थी, क्योंकि लोग बैरिकेड तोड़ना चाहते थे।

नेताओं, वरिष्ठ सांसदों और विपक्ष के बड़े चेहरों की मौजूदगी भी भीड़ की उफनती ताकत के सामने फीकी पड़ रही थी। इसलिए या तो नेताओं को वहां से हटना पड़ा, जैसा आखिर में आज़ाद ने किया, या फिर उन्हें भीड़ के साथ बहना पड़ा, जैसा समाजवादी पार्टी की नेता डिंपल यादव ने समझदारी से किया।

भीड़ के “जब-जब मोदी डरता है, पुलिस को आगे करता है” नारे लगने से कुछ क्षण पहले चंद्रशेखर आज़ाद पुलिस अधिकारियों को माइक सौंपते हुए दिखाई दिए।

जो कुछ हो रहा था, वह सीजेपी के नेताओं या वहां मौजूद चंद्रशेखर आज़ाद जैसे किसी भी नेता से कहीं बड़ा था।

हालात ऐसे हो गए कि नेताओं और पुलिस ने भीड़ को संभालने और नियंत्रित करने के लिए आपस में तालमेल बिठाना शुरू कर दिया। दोपहर करीब एक बजे संसद मार्ग पर जुटी भीड़ अचानक “जब-जब मोदी डरता है, पुलिस को आगे करता है” का नारा लगाने लगी।

इस बार यह नारा खुद आज़ाद की तरफ था, क्योंकि उन्होंने अस्थायी मंच पर पुलिस अधिकारियों को सभा को संबोधित करने के लिए बुलाया था। आज़ाद को तुरंत अपनी ग़लती का एहसास हुआ और उन्होंने फौरन कदम पीछे खींच लिए।

चंद्रशेखर की भूमिका पर क्यों उठे सवाल?

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संसद के पास जब छात्रों का हुजूम पहुंचा तो चंद्रशेखर रावण ने उन्हें मनाने की कोशिश की लेकिन छात्रों ने उनका विरोध किया, जिससे उन्हें पुलिस को माइक देकर जाना पड़ा

वहां मौजूद एक व्यक्ति ने मुझे बताया कि आज़ाद ने ‘सेफ्टी वाल्व’ की भूमिका निभाई। अगर उन्होंने अपनी लोकप्रियता और लोगों के भरोसे का इस्तेमाल करते हुए भीड़ को संभालने की कोशिश नहीं की होती, तो भीड़ एक बार फिर बैरिकेड की तरफ बढ़ती और संसद की ओर धक्का देने लगती।

इससे पहले पहले लाठीचार्ज के दौरान एक-दो बैरिकेड पहले ही गिर चुके थे। इस घटना के वीडियो अब सोशल मीडिया पर तेजी से फैल रहे हैं और ज्यादातर लोग सिर्फ आज़ाद की तारीफ़ कर रहे हैं।

लेकिन जिस वीडियो पर ध्यान देना चाहिए, वो वह वीडियो है जिसमें भीड़ के कुछ लोग ऊपर वाला (जब जब मोदी डरता है) नारा लगाकर चंद्रशेखर का विरोध कर रहे थे।

जब ऐसा लगने लगा कि मूल प्रदर्शन स्थल और संसद मार्ग पर हालात कुछ शांत हो गए हैं, और इसी बीच केरल हाउस के सामने भी एक और जमावड़ा बनने लगा, तभी कहीं और एक नया घटनाक्रम शुरू हो चुका था।

यह थोड़े समय बाद की बात है। कुछ लोगों का कहना है कि यह तब शुरू हुआ, जब पुलिस ने मूल प्रदर्शन स्थल पर बने कैंपों और मंच को बेरहमी से तोड़ दिया और एक लड़की पुलिस के जूतों तले दब गई।

आधिकारिक तौर पर प्रदर्शन खत्म होने और ज्यादातर लोगों व मीडिया के दिनभर की कवरेज पूरी मान लेने के काफी देर बाद कनॉट प्लेस, जनपथ और वहां से पहाड़गंज तक सड़कों पर चूहे बिल्ली की तरह पीछा करने का सिलसिला और खुली सड़क पर झड़पें शुरू हो गईं।

लुटियंस दिल्ली को ब्रिटिश योजनाकारों ने ऐसे ही हालात रोकने के लिए बनाया था, ताकि कानून-व्यवस्था न बिगड़े और शांति बनी रहे। लेकिन इस बार वह पूरी व्यवस्था नाकाम साबित हुई।

सत्ता के लिए एक ख़ामोश संकेत

20 july protest at CP
20 जुलाई को जंतर मंतर और संसद ही नहीं बल्कि पूरा लुटियंस दिल्ली ही छात्रों के कब्जे में था। कनाट प्लेस में छात्रों की भीड़ बारिश के बीच भी सड़कों पर बनी रही।

यह भी सामने आया कि जिन लोगों को चोट लगी थी, उनमें से सभी घर या अस्पताल नहीं गए। कनॉट प्लेस के पंचकुइयां रोड टी-पॉइंट पर करीब 35 साल के एक व्यक्ति ने भीड़ के सामने अपनी पीठ दिखाई, जिस पर पुलिस की मारपीट के साफ निशान थे।

वहां गरीब युवा और ऐसे स्थानीय लोग भी जुटने लगे, जिनका इस प्रदर्शन से कोई सीधा संबंध नहीं था। मुख्य सड़क करीब दो घंटे तक बंद रही और लंबा ट्रैफिक जाम लग गया।

काफी देर तक वहां पुलिस का कोई नामोनिशान नहीं था। जाम में फंसे लोगों ने रास्ता खुलवाने के लिए प्रदर्शनकारियों से झगड़ा नहीं किया। वे चुपचाप इंतजार करते रहे। यह भी सत्ता के लिए एक खामोश संदेश था।

तब तक पुलिस जनपथ और संसद मार्ग के टी-पॉइंट पर लाठीचार्ज और आंसू गैस का इस्तेमाल कर चुकी थी। जब झड़पें पंचकुइयां टी-पॉइंट तक पहुंचीं, तब तक पुलिस के आंसू गैस के गोले खत्म हो चुके थे।

ग़रीब युवाओं को बनाया चुन चुन कर निशाना

youth protest INJURED
पुलिस लाठीचार्ज में कई छात्र और युवा घायल हुए हैं। कुछ जगहों पर पैलेट गन से भी कई लोग घायल हुए हैं।

आखिरकार जब पुलिस वहां पहुंची तो उसने उन लोगों को निशाना बनाया, जो गरीब दिखाई दे रहे थे। अच्छे कपड़े पहने लोग बच गए। कुछ लोगों को दौड़ाकर कनॉट प्लेस के बड़े एच एंड एम स्टोर तक खदेड़ा गया।

वहां यह बातें भी सुनाई दीं कि ये पढ़े-लिखे युवा नहीं हैं और न ही ये ‘वैध’ प्रदर्शनकारी हैं। दरअसल, वे पहाड़गंज की गलियों के स्थानीय कामकाजी तबके के युवा लग रहे थे।

यहां आकर दरार साफ तौर पर वर्ग और जाति के विभाजन के रूप में सामने आने लगी। समाज की छिपी हुई सच्चाई अब खुलकर दिखाई देने लगी थी।

धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग अचानक ऐसी मांग लगने लगी, जिसके भीतर समाज की कई और गहरी और स्थायी दरारें छिपी हुई थीं।

नीट पेपर लीक, एनटीए और परीक्षा व्यवस्था को लेकर उठी शिकायतें अब कहीं अधिक गहरे सामाजिक विभाजनों से जुड़ी हुई महसूस होने लगीं।

कक्षा 12 के छात्र सार्थक सिद्धांत, वेदांत श्रीवास्तव और निसर्गा को शायद अब महसूस हो कि सीबीएसई में जिस भ्रष्टाचार को उन्होंने उजागर किया, वह विशाल पहाड़ का चुटकी भर हिस्सा था।

दिल्ली पुलिस की हताशा

youth protest ACTOR prakash raj
20 जुलाई के संसद मार्च में एक्टर प्रकाश राज भी शामिल थे

पुलिस व्यवस्था पूरी तरह बिखरी हुई दिखाई दे रही थी। दिल्ली पुलिस शायद ही कभी इतनी हताश नजर आई हो। पुलिस प्रशासन पूरी तरह असहज और परेशान था।

इसकी वजह सिर्फ भीड़ की संख्या या ताकत नहीं थी, बल्कि भीड़ के व्यवहार और उसकी अपनी तर्क प्रणाली को समझ पाने में उसकी नाकामी थी।

यही कारण था कि पुलिस मूल प्रदर्शन स्थल पर लोगों के दोबारा जुटने को नहीं रोक सकी, जहां धरना फिर शुरू हो गया।

20 जुलाई की देर रात तक धरना पूरे जोर-शोर से फिर चल पड़ा था और अब भी जारी है।

मंगलवार का दिन इस बात का एक बड़ा सबक था कि राज्य की नियंत्रण व्यवस्था को किस तरह कमजोर किया जा सकता है।

सत्ताधारियों का किला लुटियंस दिल्ली कैसे बिखर गया?

youth protest at sansad chalo march
जब संसद मार्च समाप्त हो गया या रोक लिया गया, उसके बाद भी दिल्ली के केंद्र में कई जगहों पर छात्रों और नौजवानों का हुजूम सड़कों पर था।

इसकी शुरुआत सड़क पर होने वाले किसी राजनीतिक जमावड़े की सबसे बुनियादी मौजूदगी से हुई। लुटियंस दिल्ली ने अचानक कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए अपनी वही अंतर्निहित सुरक्षा खो दी, जो उसकी औपनिवेशिक सोच, वास्तुकला और शहरी योजना में शामिल थी।

चौड़ी और लंबी सड़कें तथा बुलेवार्ड, जिन्हें खास तौर पर किसी भी कानून-व्यवस्था संकट को बढ़ने से रोकने के लिए बनाया गया था, इस बार उल्टा प्रदर्शनकारियों के लिए मददगार साबित हुए।

किसी ने ठीक ही कहा है कि अगर सड़कों पर आपका नियंत्रण है, तो व्यवस्था पर भी आपका नियंत्रण है। फ्रेडरिक एंगेल्स ने कभी शहरों की योजना, बुर्जुआ वर्ग की ताकत और राज्य की सत्ता के बीच के संबंधों पर लिखा था।

या फिर एमे सेज़ेर को याद कीजिए, जिन्होंने नाज़ी शासन के दौरान हुए होलोकॉस्ट (जनसंहार) को उपनिवेशों में अश्वेत गुलामी की व्यवस्था और औपनिवेशिक शहरी योजना से अलग नहीं माना।

या फ्रांत्ज़ फ़ैनॉन को याद कीजिए, जिन्होंने अल्जीरिया के उस शहर का वर्णन किया था, जो औपनिवेशिक इलाकों और स्थानीय लोगों की बस्तियों में बंटा हुआ था।

महानगर के बीचों बीच उग्र ताकतों और पुलिस के बीच हुई ऐसी भिड़ंत 1983 की बॉम्बे टेक्सटाइल मिल हड़ताल की याद दिलाती है।

परेल और दादर जैसे इलाकों में एक ओर कपड़ा मिलें थीं और थोड़ी दूरी पर मिल मालिकों और बड़े उद्योगपतियों के विशाल घर। वहीं शहर के भीतर बड़े पैमाने पर वर्ग संघर्ष देखने को मिला था।

अमेरिका के बड़े शहरों में हुए ‘ब्लैक लाइव्स मैटर’ आंदोलन भी याद आते हैं।

मुझे 2011 के लंदन दंगे भी याद आते हैं, जहां पुलिस और अश्वेत युवाओं के बीच ऐसी ही झड़पें हुई थीं। और यह भी याद रखिए कि अभी हाल में अप्रैल में ही राजधानी के पास नोएडा में मजदूरों के दंगे हुए थे।

इस आंदोलन में सबसे शोषित तबका कहां है?

youth protest jantar mantar
जिस दिन संसद मार्च था उस दिन दिल्ली में भारी बारिश हो रही थी, जंतर मंतर पर जिन लोगों ने टेंट लगाया था वहां पानी भर गया।

कई लोगों ने पूछा कि कल के प्रदर्शनों में मजदूर और गिग वर्कर, यानी सबसे ज्यादा शोषित तबका, कहां था?

यही सवाल इस पूरे मामले के केंद्र में है। लेकिन जैसे-जैसे दिन भर प्रदर्शन का स्वरूप बदलता गया, वैसे-वैसे मजदूरों और शोषित तबकों की मौजूदगी भी अलग-अलग रूपों में सामने आती गई।

“छात्र” और “युवा”, जो सिर्फ पढ़ाई करके सुरक्षित “भविष्य” बनाना चाहते हैं, इस मध्यमवर्गीय सोच से अब यह समझ पाना मुश्किल था कि प्रदर्शन किस दिशा में आगे बढ़ रहा है।

जब यह आंदोलन जनपथ और कनॉट प्लेस तक फैल गया, तब यही बात साफ दिखाई दी। बाहर से देखने पर यह अमीबा जैसी नेतृत्वविहीन भीड़ लग रही थी, लेकिन भीतर से देखने पर यह बिल्कुल नेतृत्वविहीन नहीं थी।

अराजकतावाद और नेतृत्व के सवाल का जवाब?

youth protest at jantar mantar tricolour
पुलिस की ओर से आंसू गैस के गोले दागे जाने के बावजूद छात्रों का उत्साह कम नहीं हुआ।

इस तरह इसने अराजकतावाद और अगुवा नेतृत्व वाली राजनीति के बीच की बहस को किसी एक पक्ष में बंद नहीं किया, बल्कि दोनों संभावनाओं को खुला छोड़ दिया। सिर्फ औपचारिक रूप से नहीं, बल्कि उन गहरी और भीतर चल रही सामाजिक ताक़तों की हरकतों के स्तर पर भी।

आधुनिक चमकदार शहर खुद को पूरी तरह दिखाने में भरोसा रखता है। कांच से बनी चमचमाती दुकानों की दीवारें ऐसे पेश आती हैं, मानो वे आपकी अपनी दुनिया का हिस्सा हों।

लेकिन कल जैसे-जैसे प्रदर्शन फैलता गया, वैसे-वैसे दुकानों के शटर गिरने लगे। हाई स्ट्रीट की वह चमक, जो लोगों को आकर्षित करती थी, अचानक गायब हो गई। जंग लगे लोहे के शटर नीचे आ गए।

भीड़ अब उपभोक्ता संस्कृति के आकर्षण में डूबी नहीं थी। एक वास्तविक संघर्ष की सामान्य स्थिति वापस लौट आई।

सिर्फ एक हफ्ता पहले तक हम बिल्कुल अलग मानसिकता में जी रहे थे। उसी सोच ने कॉकरोच जनता पार्टी के मंच से की गई उस अपील को संभव बनाया था।

सोनम वांगचुक ने छात्रों और शिक्षण संस्थानों से कहा था कि वे 20 जुलाई को नई शिक्षा नीति (एनईपी) के तहत अनुभव आधारित राजनीतिक विज्ञान के दिन के रूप में मनाएं।

उन्होंने स्कूलों, कॉलेजों और विश्वविद्यालयों से कहा था कि संसद तक होने वाले लोकतांत्रिक मार्च को लोकतंत्र कैसे काम करता है, इसे समझने की एक जीवंत क्लासरूम की तरह देखें।

उम्मीद की जानी चाहिए कि इस तरह की सोच को वहीं रखा जाएगा, जहां उसका स्थान है, और उसे दोबारा उभरने का मौका नहीं मिलेगा।

(सारी तस्वीरें सोशल मीडिया से)

यह लेख सब्सटैक में 21 जुलाई को प्रकाशित हुआ था और साभार यहां प्रकाशित किया जा रहा है.

(सरोज गिरी दिल्ली यूनिनवर्सिटी में पॉलिटिक्स पढ़ाते हैं।)

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