नोएडा में सैलरी की डिमांड के बाद सूरत में संडे की छुट्टी को लेकर सड़कों पर उतरे मज़दूर

नोएडा में सैलरी की डिमांड के बाद सूरत में संडे की छुट्टी को लेकर सड़कों पर उतरे मज़दूर

बीते अप्रैल में जब पूरे देश में आंबेडकर जयंती मनाई जा रही थी, उसके एक दिन पहले यानी 13 अप्रैल को नोएडा में सैलरी बढ़ाए जाने की डिमांग को लेकर हज़ारों मज़दूर सड़कों पर उतर पड़े थे और दबाव में सरकार को न्यूनतम मज़दूरी बढ़ाने की घोषणा करनी पड़ी थी।

इसके ठीक चार महीने बाद जब पूरे देश 15 अगस्त को स्वतंत्रता दिवस मना रहा था, सूरत में एम्ब्रॉयडरी के मज़दूरों में बेचैनी छाई हुई थी और 16 अगस्त, दिन रविवार को हज़ारों मज़दूर सड़कों पर उतर आए

दरअसल इस बार 15 अगस्त शनिवार को पड़ा था। अगले दिन संडे था। मज़दूरों को उम्मीद थी कि देश की स्वतंत्रता दिवस और अगले दिन संडे की वजह से उन्हें दो दिन की छुट्टी मिलेगी, लेकिन पूंजीवाद का निर्मम पहिया अपने हिसाब से चलता है।

लेकिन सोचने वाली बात है कि उनकी डिमांड क्या थी? कि उन्हें हफ़्ते में रविवार की छुट्टी दी जाए। जबकि हफ़्ते में एक दिन की छुट्टी का अधिकार आज़ादी के पहले से हासिल है। सातों दिन काम करना बंधुआ मज़दूरी जैसा है।

सूरत में विरोध का पैटर्न बिल्कुल नोएडा जैसा था। मज़दूर सड़कों पर उतर आए और हर एम्ब्रॉयडरी कारखाने में जाकर मज़दूरों को काम बंद करने के लिए कहने लगे।

देखते देखते हज़ारों की भीड़ शांतिपूर्ण तीरक़े से सड़क, गली चौराहों पर इकट्ठा हो गई।

मज़दूरों का कहना था कि वे दिन में 12 घंटे काम करते हैं और उन्हें हफ्ते में एक भी दिन की छुट्टी नहीं मिलती।

उनकी मांग है कि उन्हें संडे की छुट्टी दी जानी चाहिए और इसके लिए उनकी सैलरी नहीं काटी जाए। मज़दूर ये भी चाहते हैं कि उनके काम के घंटे 12 से घटाकर आठ कर दिए जाने चाहिए।

अब 24 अगस्त यानी सोमवार को को उद्योग के प्रतिनिधियों के साथ लेबर कमिश्नर की बैठक होगी। इस बैठक के दौरान मज़दूरों की मांगों पर विचार किया जाएगा।

पुलिस का दमनकारी रवैया एक-सा

Surat police

खुद को मानवाधिकार कार्यकर्ता  बताने वाले एक एक्स यूज़र अशोक ढढवाल ने बताया कि जब मज़दूर सड़कों पर उतरे तो पथराव भी हुआ और पुलिस की ओर से 26 लोगों को हिरासत में लिया गया। इन लोगों पर ह्वाट्सऐप ग्रुप के जरिए “भड़काऊ” संदेश फैलाने का आरोप लगाए गए।

हिंसा और कथित धमकी को सही नहीं ठहराया जा सकता। लेकिन मजदूरों की मूल शिकायतें भी “कानून-व्यवस्था” की भाषा के पीछे दब नहीं जानी चाहिए।

द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, रविवार को मजदूरों ने अमरोली की दो कढ़ाई इकाइयों में घुसकर जबरन काम बंद करा दिया। पुलिस ने गैरकानूनी तरीके से एकत्र होने, दंगा करने, जबरन घुसने, आपराधिक धमकी और अन्य अपराधों के आरोप में एफ़आईआर दर्ज की। पथराव में एक पुलिस कांस्टेबल घायल हो गया। जब अशांति सचिन, उधना और पांडेसरा तक फैल गई, तो पुलिस ने हस्तक्षेप किया।

एक पुलिस अधिकारी का वीडियो वायरल हो रहा है जिसमें वो कह रहा है कि अगर तोड़ फोड़ की तो भूत बना देंगे।

पुलिस का कहना था कि इनमें से कई व्हाट्सऐप ग्रुप के एडमिन थे, जिनका इस्तेमाल कथित तौर पर मज़दूरों को भड़काने के लिए किया गया था। इसी दौरान श्रम अधिकारियों ने प्रदर्शन कर रहे मजदूरों से मुलाकात की और उन्हें भरोसा दिलाया कि उनकी मांगों पर कपड़ा फैक्ट्री मालिकों के साथ चर्चा की जाएगी।

लेकिन दूसरा पहलू और अहम है-

कामकाजी लोकतंत्र में मजदूरों की हर सामूहिक मांग को क़ानून-व्यवस्था की समस्या के तौर पर नहीं देखा जा सकता। मजदूरों के पास ऐसे वैध और आसानी से उपलब्ध मंच होने चाहिए, जहां वे वेतन, काम के घंटे, साप्ताहिक छुट्टी और काम की परिस्थितियों जैसे मुद्दों पर बातचीत कर सकें। दरअसल, सूरत के डिप्टी कमिश्नर ऑफ पुलिस ने भी माना कि मजदूरों के पास अपनी शिकायतें रखने के लिए कोई मंच नहीं था। इससे दूसरे लोगों को उनके गुस्से का फायदा उठाने का मौका मिला।

दरअसल ये स्थिति खुद मोदी सरकार ने पैदा की, चार लेबर कोड को अंधेरे में संसद से पास कराकर और बीते अप्रैल में पूरे देश में लागू कराकर। इन नए लेबर कोड्स में संगठन बनाना, यूनियन बनाना, हड़ताल करना लगभग असंभव बना दिया गया है। यहां तक कि मानवाधिकार कार्यकर्ताओं, मज़दूर अधिकार कार्यकर्ताओं और सामान्य नागरिकों को मज़दूरों के बीच काम करने उन्हें संगठित करने को आपराधिक बना दिया गया है।

सूरत का अमरोली इलाक़ा- एम्ब्रॉयडरी उद्योग में शोषण का हब

surat worker ranjan chandravanshi

बीबीसी गुजराती पर एक कहानी प्रकाशित हुई है जिसके अनुसार, सूरत के अमरोली इलाके में कीचड़ से भरी सड़कों से गुजरकर कई औद्योगिक क्षेत्रों तक पहुंचा जा सकता है, जहां बड़ी संख्या में एम्ब्रॉयडरी का काम करने वाले कारखाने हैं।

16 अगस्त को यह इलाका तब सुर्ख़ियों में आया जब वहां एम्ब्रॉयडरी कारखानों में काम करने वाले हज़ारों मज़दूर सड़कों पर उतर आए।

सूरत में एम्ब्रॉयडरी का उद्योग भी खूब फलता-फूलता रहा है। यह एक प्रकार का श्रम-आधारित काम है जिसमें व्यापारियों से कपड़ा लाया जाता है, उस पर एम्ब्रॉयडरी की जाती है और फिर वापस कर दिया जाता है।

इस उद्योग में काम करने वाले मजदूर उत्तर प्रदेश, बिहार और झारखंड से हैं।

हाल ही में कुछ सोशल मीडिया साइट्स पर ऐसे पोस्ट शेयर किए जाने लगे जिसमें लिखा था कि सप्ताह में एक छुट्टी और बोनस के मुद्दे को लेकर विरोध प्रदर्शन होंगे और फैक्ट्रियां बंद रहेंगी।

फिर 16 अगस्त को अमरोली के औद्योगिक क्षेत्रों में विरोध प्रदर्शन शुरू हो गया। हज़ारों श्रमिकों ने काम बंद कर दिया और नारे लगाते हुए सड़कों पर उतर आए।

अमरोली स्थित वेदांता इंडस्ट्रियल एस्टेट में काम करने वाले रंजन चंद्रवंशी नामक एक मज़दूर ने बीबीसी न्यूज़ गुजराती को बताया कि वो लोग अरसे से सप्ताह में एक दिन की छुट्टी की मांग कर रहे हैं, लेकिन फैक्ट्री मालिक उनकी मांग मानने को तैयार नहीं हैं।

उन्होंने कहा, “मुझे प्रति माह 30 हज़ार रुपये वेतन मिलता है, लेकिन हमें दिन में 12 घंटे काम करना पड़ता है। हमें रविवार को भी छुट्टी नहीं मिलती। अगर हम छुट्टी मांगते हैं, तो हमें एक दिन का वेतन काटने की धमकी दी जाती है।”

रंजन की तरह सोनू सिंह भी यहां एम्ब्रॉयडरी का काम करते हैं। दोनों झारखंड के रहने वाले हैं।

वह कहते हैं, “झारखंड में रोज़गार की स्थिति अच्छी नहीं है, इसलिए मैं काम करने के लिए सूरत आया। यहां मुझे काम तो मिल जाता है, लेकिन एक भी छुट्टी नहीं मिलती। अगर मुझे पूरी तनख्वाह चाहिए तो मुझे लगातार काम करना होगा। मुझे छुट्टियां सिर्फ होली या दिवाली जैसे त्योहारों के दौरान ही मिलती है।”

आज़ाद अली नाम के एक मज़दूर ने बीबीसी न्यूज़ गुजराती को बताया, “यहां वेतन की तारीखों को लेकर भी धोखाधड़ी होती है। यह तय नहीं है कि हमें महीने की किस तारीख को वेतन मिलेगा।”

वे कहते हैं, “हम भी इंसान हैं। जब कोई मजदूर अपना घर छोड़कर इतनी दूर आता है, तो उसे हफ़्ते में एक दिन आराम मिलना चाहिए। हम अक्सर कई महीनों तक अपने घर नहीं जा पाते।”

रंजन चंद्रवंशी ने कहा, “पहले हम आठ घंटे काम करते थे। अब कानूनी तौर पर हमें 12 घंटे काम करना पड़ता है। काम के घंटे बढ़ने से वेतन में मामूली वृद्धि हुई है, लेकिन काम डेढ़ गुना बढ़ गया है। अगर हम कोई निश्चित लक्ष्य हासिल कर लेते हैं, तो हमें प्रतिदिन 50 या 60 रुपये का बोनस मिलता है।”

“लेकिन इससे पूरे महीने में हमारी कमाई सिर्फ़ 1,500 से 1,800 रुपये ही बढ़ पाती है। महंगाई बढ़ने के साथ अब जो कमाई हो रही है, उससे यह बहुत कम है।”

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मालिक भी मानते हैं- संडे की छुट्टी होनी चाहिए

Surat workers strike

कुछ एम्ब्रॉयडरी इकाई के मालिकों का कहना है कि उद्योग को नुकसान पहुंचाने की चाह रखने वाले कुछ तत्व अनावश्यक रूप से इस तरह का विवाद पैदा कर रहे हैं।

उनका कहना है कि एम्ब्रॉयडरी के कारोबार में लगातार मंदी बनी हुई है और इसकी वजह से त्योहारों के मौसम में भी लोग उतनी खरीदारी नहीं करते जितनी पहले करते थे।

एम्ब्रॉयडरी कारखाने के मालिक बिपिन अकबरी ने बीबीसी न्यूज़ गुजराती को बताया कि पिछले दो वर्षों में मजदूरों के वेतन में काफी वृद्धि हुई है।

उनका कहना है कि अब त्योहार आ रहे हैं इसलिए मज़दूरों को दो शिफ्टों में काम करना पड़ रहा है। ऐसे में कुछ लोग जानबूझकर यह विवाद खड़ा कर रहे हैं ताकि मालिकों पर दबाव पड़े।

उनका कहना है कि सूरत में पहले से ही सप्ताह में सात दिन काम करने का नियम है। उनके अनुसार, “ऐसे बहुत कम मजदूर हैं जो लगातार एक ही कारखाने में काम करते हैं। उनमें से अधिकतर 15-20 दिन या दो-तीन महीने ही काम करते हैं।”

“मजदूर बेहतर वेतन की पेशकश मिलने पर कहीं और चले जाते हैं। इसलिए, इसका असर एम्ब्रॉयडरी इकाइयों पर पड़ता है। ऐसी इकाइयों को चलाने के लिए लाखों रुपये के कर्ज लिए जाते हैं और बाजार की स्थिति ऐसी है कि मंदी बार-बार आती रहती है।”

एम्ब्रॉयडरी कारखाने के मालिक शिवशंकर पांडे पहले खुद एक मजदूर के रूप में काम करते थे। अब वे उधना में अपना खुद का कारखाना चलाते हैं।

उनका मानना ​​है कि मज़दूरों को हर सप्ताह एक दिन की छुट्टी मिलनी चाहिए, लेकिन उद्योग की स्थिति ऐसी है कि मौजूदा वेतन पर उन्हें छुट्टी देना संभव नहीं है।

बीबीसी न्यूज़ गुजराती से बात करते हुए उन्होंने कहा, “सूरत की सभी इकाइयां 24 घंटे काम करती हैं। अब कारीगर मांग कर रहे हैं कि हमें रविवार की छुट्टी दी जाए और वेतन में कटौती न की जाए। सूरत में बढ़ती महंगाई के मुकाबले अधिक कमाई करने के लिए कारीगर दो मशीनों के बजाय तीन मशीनें चला रहे हैं। लेकिन यह ज्यादा समय तक नहीं चल सकता।”

उनका कहना है, “इन सभी समस्याओं की जड़ बाजार है। बिलिंग चक्र, जो पहले 45 दिन का था, अब 120 दिन का हो गया है, इसलिए हमारा पैसा लंबे समय तक फंसा रहता है।

गुजरात मॉडल- लेबर लॉ से मुक्ति

गुजरात वैसे भी श्रम क़ानूनों को लागू करने में सबसे बदनाम राज्य रहा है। यहां उद्योग होने की वजह से मज़दूर आते हैं और उनके शोषण की यहां पूरी खुली छूट है।

मजदूर संगठनों से जुड़े लोगों का कहना है कि गुजरात में नए श्रम कानूनों के लागू होने के बाद असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों की स्थिति और खराब हो गई है।

गुजरात मजदूर संघर्ष समिति के शरद शर्मा ने कहते हैं, “सूरत में एम्ब्रॉयडरी इकाइयां अमरोली, कतरगाम, उधना, भेस्तान, कडोदरा और पलसाना में स्थित हैं। यहां मज़दूरों का विरोध प्रदर्शन स्वतःस्फूर्त है और इसका कोई नेता नहीं है।”

वह कहते हैं, “इस काम में 15 दिन की रात और 15 दिन की दिन की शिफ्ट शामिल है। इसमें मज़दूरों को प्रतिदिन ढाई से तीन लाख टांके पूरे करने होते हैं। अगर वे 12 घंटे में इससे अधिक टांके पूरे कर लेते हैं, तो उन्हें बोनस मिलता है। समस्या यह है कि बोनस भी कारखाने के अनुसार बहुत अलग अलग होता है।”

उनका कहना है, “सूरत में श्रम कानूनों का ठीक से पालन नहीं किया जाता है। इसके अलावा, एम्ब्रॉयडरी इकाइयां कारखाना अधिनियम के अंतर्गत नहीं आती हैं, इसलिए इकाई मालिक क्लर्कों की आड़ में इन्हें चलाते हैं।”

बीबीसी के अनुसार, सूरत जैसे बड़े औद्योगिक शहर में डिप्टी लेबर कमिश्नर तक नियुक्त नहीं है। यह पोस्ट खाली है और इसका अतिरिक्त प्रभार वडोदरा के लेबर कमिश्नर के पास है।

ऐसा लगता है कि पूरा देश एडहॉक पर चल रहा है। केंद्र में महत्वपूर्ण पद खाली पड़े हैं, जिस आयोग, संस्था, नियामक बॉडी का कोई चेयरमैन बन गया, वो सालों साल उसी पर बना हुआ है और संस्था को अपनी संपत्ति के रूप में चला रहा है।

श्रम विभाग की दुर्गति तो सरकार ने खुद चार लेबर कोड लाकर कर दी है जिसमें लेबर कमिश्नर का काम ही ख़त्म कर दिया गया है। ऐसे हाल के समय में मज़दूरों का लगातार स्वतःस्फ़ूर्त आंदोलन देखने को मिल रहा है।

आज़ादी से पहले जब संडे की छुट्टी के लिए शुरू हुआ आंदोलन

Narayan Meghaji Lokhande trade union leader

नारायण मेघाजी लोखंडे को भारतीय मज़दूर आन्दोलन का अग्रदूत कहा जा सकता है। महात्मा ज्योतिबा फूले के अनुयायी, नारायण मेघाजी लोखंडे का जन्म 1848 में तत्कालीन विदर्भ के पुणे जिले के कन्हेरसर में एक गरीब फूलमाली जाति के साधारण परिवार में हुआ था।

सन् 1884 में ‘बॉम्बे हैंड्स एसोसिएशन’ नाम से भारत में उन्होंने प्रथम ट्रेड यूनियन की स्थापना की और इसके अध्यक्ष भी रहे।

1881 में तत्कालीन अंग्रेजी सरकार ने मजदूरों की माँग व दबाव के चलते कारखाना अधिनियम (फ़ैक्ट्री एक्ट) बनाया लेकिन मज़दूर इस अधिनियम से संतुष्ट नहीं थे। अंग्रेजी सरकार को 1884 में इस अधिनियम में सुधार के लिये जाँच आयोग नियुक्त करना पड़ा।

इसी वर्ष लोखंडे मेघाजी ने ‘बॉम्बे मिल हैंड्स एसोसिएशन’ की स्थापना की। ज्ञात हो कि सत्रहवीं-अठारहवीं सदी में भारत अपनी बेहतरीन टेक्सटाइल के लिये पश्चिमी दुनिया में प्रसिद्ध था। बॉम्बे मिल हैंड्स एसोसिएशन ने सितम्बर 1884 में प्रथम मज़दूर आम सभा आयोजित की। इस सभा में लगभग साढ़े पाँच हज़ार श्रमिकों ने हिस्सा लिया। सभा के अन्त में एक प्रस्ताव पास किया गया, जिसमें मुख्यतः पाँच माँगें रखी गयी थीं:-

1. रविवार को साप्ताहिक छुट्टी हो।
2. भोजन करने के लिये छुट्टी दी जाये।
3. काम के घंटे निश्चित हों।
4. काम के समय किसी तरह की दुर्घटना हो जाने की स्थिति में कामगार को सवेतन छुट्टी दी जाये; और
5. दुर्घटना के कारण किसी श्रमिक की मृत्यु हो जाने की स्थिति में उसके आश्रितों को पेंशन मिले।

एक याचिका तैयार की गयी जिस पर 5,500 श्रमिकों ने हस्ताक्षर किये थे और इसे फैक्ट्री कमीशन के सामने प्रस्तुत किया गया। इस याचिका के माध्यम से प्रस्तुत माँगों का फैक्ट्री मालिकों ने विरोध किया और अंग्रेजी सरकार भी इसकी अनदेखी करती रही। विवश होकर लोखंडे मेघाजी जगह-जगह आम सभाओं के माध्यम से उपरोक्त माँगों को मनवाने के लिये दबाव बनाते रहे।

इसी क्रम में एक महत्वपूर्ण आम सभा अप्रैल, 1890 में बॉम्बे के रेसकोर्स मैदान में आयोजित की गयी जिसमें 10,000 से अधिक श्रमिकों ने हिस्सा लिया, तथा अनेक महत्वपूर्ण भाषण हुये जिनमें से कई महिला कामगारों ने दिये। अंततः लोखंडे मेघाजी को उपरोक्त माँगों को पाने के लिये हड़ताल का सहारा लेना पड़ा।

मजदूरों की इस हड़ताल के आगे मालिकों को हार माननी पड़ी और सभी कामगार क्षेत्रों में साप्ताहिक अवकाश की घोषणा हुई।

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Workers Unity Team

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