दो अक्टूबर को दो प्रोटेस्टः पुलिस के अलग अलग सुलूक के पीछे की क्या कहानी है?- नज़रिया

By एएस कुशावर्दी
कल दो अक्तूबर गांधी जयंती पर देश में दो प्रोटेस्ट हुए मुद्दा एक था, मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार का इस्तीफ़ा हो और मतदाता सूची में जारी एसआईआर को तुरंत रद्द किया जाए।
एक सुबह दिल्ली के जंतर मंतर पर और दूसरा शाम चार बजे मुंबई के शिवाजी पार्क में।
लेकिन दोनों प्रोटेस्ट में पुलिस का रुख़ बेहद अलग अलग रहा। जबकि दिलचस्प है कि दोनों ही जगहों पर बीजेपी की सरकारें हैं और पुलिस उन्हीं के निर्देशों पर काम करती है।
सुबह का प्रोटेस्ट विपक्षी पार्टियों, वामपंथी छात्र संगठनों, नागरिक संगठनों, सिविल सोसायटी के लोगों द्वारा आयोजित था।
जबकि मुंबई का प्रोटेस्ट कॉकरोच जनता पार्टी यानी सीजेपी की ओर से आयोजित किया गया था। पुलिस ने दोनों जगहों पर परमिशन नहीं दी थी, लेकिन प्रदर्शन हुए।
हालांकि दोनों प्रदर्शनों में जिस बात पर बहुत से बुद्धिजीवियों का ध्यान खींचा वो था पुलिस प्रशासन का रवैया।
दिल्ली में 28 सितंबर से ही जंतर मंतर को जाने वाले सभी रास्तों पर भारी बैरिकेडिंग करके उन्हें बंद कर दिया गया था। दो अक्तूबर को केंद्रीय दिल्ली के कई इलाक़ों में धारा 163 के तहत निशेधाज्ञा लागू कर दी गई थी। आस पास के 11 मेट्रो स्टेशनों को बंद कर दिया गया था। इन जगहों पर इंटरनेट जैमिंग की भी व्यवस्था की गई थी।
भारी पुलिस बल, आईटीबीपी, सीआरपीएफ़ और आरएएफ़ के सैनिक फुल राय गियर में मौजूद थे, जैसे किसी तख़्तापलट को रोकने की तैयारी हो। सुबह 10 बजे से ही लोगों को उठाना शुरू कर दिया गया।
जो भी व्यक्ति दिखता था, उसे पांच छह पुलिस वाले पकड़ कर, घसीटकर, टांग कर, जैसे भी हो बस में भर रहे थे। यहां तक कि जुलाई में सीजेपी आंदोलन का चेहरा बनीं नेहा बोरा, दिल्ली की पूर्व मुख्यंत्री आतिशी मारलीना, आम आदमी पार्टी के नेता और दिल्ली के पूर्व मंत्री सौरभ भारद्वाज, राजद सांसद मनोज झा, सीपीएम महासचिव एमए बेबी, राजनीतिक विश्लेषक और एसआईआर के ख़िलाफ़ मुखर आवाज़ रहे योगेंद्र यादव समेत एसएफ़आई, आइसा, डीवाईएफ़आई के नेताओं कार्यकर्ताओं को घसीट कर बस में भरा गया।
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एक पत्रकार ने बताया कि सुबह से कनाट प्लेस के आसपास क़रीब 100 बसें लगाई गई थीं। इन बसों में भर कर लोगों को दिल्ली के कोने कोने में स्थित पुलिस स्टेशनों में भर दिया गया। इन सभी को शाम सात बजे छोड़ा गया।
मनोज झा ने बीबीसी से कहा कि जिस तरह पुलिस ने लोगों को धक्के मारकर, घसीटकर, टांगकर बसों में भरा, वो बर्बरता वाला तरीक़ा था और अहिंसा के पुजारी महात्मा गांधी की जयंती पर सरकार को कम से कम ऐसा तो नहीं करना चाहिए था।
दिल्ली के आंदोलन को पूरी तरह कुचलने के लिए जिस पैमाने पर फोर्स लगाई गई थी, कई लोगों का कहना है कि वो अभूतपूर्व था। ऐसा तो जून जुलाई के सीजेपी प्रोटेस्ट के दौरान भी नहीं हुआ था। यहां तक कि कई पत्रकारों ने शिकायत की कि उन्हें भी दिल्ली पुलिस ने पकड़ कर बस में भर दिया। कई पत्रकारों को कवर करने की इजाज़त नहीं दी गई और उनके साथ हाथापाई की गई।
एक वीडियो में साफ़ दिखता है कि बस में ठूंसे जाने के बाद एक पुलिस वाला उचक कर गेट पर खड़े एक प्रदर्शनकारी की नाक पर घूंसा मारता है।
जो लोग सामान्य रूप से अपनी कार से दिल्ली जाया करते थे, उन्हें बहुत पहले ही रोक दिया गया, उन्हें कार से उतारकर परमिशन मांगी गई।
लेकिन दूसरी तरफ़ शाम तीन बजे से मुंबई के शिवाजी पार्क में क्या हो रहा था?
दिल्ली से वहां कार्यक्रम को कवर करने पहुंचे एक पत्रकार ने वर्कर्स यूनिटी को बताया कि परमिशन न मिलने के बावजूद शिवाजी पार्क के पास ही कॉकरोच पार्टी का मंच सज गया था। लोग दोपहर तीन बजे से ही वहां पहुंचना शुरू कर चुके थे।
शाम तक वहां हज़ारों की भीड़ जमा हो गई थी। मंच पर सीजेपी के संस्थापक अभिजीत दीपके, संयोजक सौरव दास और आशुतोष रांका मौजूद थे। उनके साथ अभिनेत्री शबाना आज़मी भी थीं। वेटेरन एक्टर नासिरुद्दीन शाह पहुंचे, विशाल डडलानी पहुंचे और बॉलीवुड की कई हस्तियां भी वहां मौजूद थीं।
मंच से अभिजीत दीपके ने ऐसी ऐसी बातें कहीं और केंद्रीय गृह मंत्री, जिनके हाथ में दिल्ली की पुलिस है, उनके ख़िलाफ़ जोरदार हमला बोला। उन्हों ने दिल्ली पुलिस को नसीहत दी कि मुंबई पुलिस से सीखो।
अभिजीत दीपके ने मुंबई पुलिस को धन्यवाद भी दिया।
शिवाजी पार्क, मुंबई में पहुंचे उसी पत्रकार ने बताया कि वहां पुलिस नाम मात्र की थी और जो थी, वो एक किनारे खड़ी थी। पास में ही लोकल ट्रेन का स्टेशन है, वहां कोई पाबंदी नहीं लगाई गई थी।
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तो फिर सरकार का इरादा क्या है?
हालांकि दो प्रोटेस्ट में स्टेट के दो तरह के रवैये से मुकम्मल तौर पर ये नहीं कहा जा सकता कि मुंबई प्रोटेस्ट को होने दिया गया और दिल्ली के प्रोटेस्ट को पूरी तरह कुचलने की कोशिश हुई।
स्वतंत्र विचारक और खुद को नेहरूवादी बताने वाले कृष्ण यादव ने एक्स पर तंज़ किया कि बंधुओं सीजेपी वाक़ई में बीजेपी से लड़ रही है!
उन्होंने आगे लिखा, “एक मुद्दा: वोट की चोरी। वही सरकार: बीजेपी। दो विरोध प्रदर्शन। अलग-अलग प्रदर्शनकारी। बिल्कुल अलग बर्ताव। अभिजीत दिपके, आशुतोष रांका और सौरव दास को BJP के कंट्रोल वाली पुलिस ने एक बड़ा मैदान, म्यूज़िक सिस्टम, स्टेज और भारी भीड़ मुहैया कराई। यानी पूरा माहौल बना दिया।”
“वहीं आईवाईसी, एनएसयूआई, नेहा बोरा, योगेंद्र यादव, प्रशांत भूषण, मनोज झा – लगभग सभी के साथ बीजेपी के कंट्रोल वाली पुलिस ने बर्बरता की और उन्हें हिरासत में ले लिया। अजीब है? नहीं। यह तो साफ़ है।”
वरिष्ठ पत्रकार उर्मिलेश ने अपने सोशल मीडिया अकाउंट पर लिखा, “मुद्दा-एक। प्रोटेस्ट स्थल दो। दिल्ली में छात्र-युवाओं और नागरिक संगठनों का प्रदर्शन। मुंबई में सीजेपी की रैली!
दिल्ली में ‘सरकार-एआईआर-ज्ञानेश कुमार-विरोधी धरना-प्रदर्शन’ को पुलिस मंज़ूरी नहीं मिली! युवाओं को बड़े पैमाने पर हिरासत में लिया गया। फिर भी जंतर-मंतर के पास की सड़कों पर युवाओं और विपक्षी दलों के कार्यकर्ताओं की भारी हिस्सेदारी!”
“लेकिन मुंबई में सीजेपी को आधिकारिक मंज़ूरी न होने के बावजूद व्यावहारिक तौर पर शिवाजी पार्क में रैली-प्रदर्शन करने की पूरी मंज़ूरी! यहां पर किसी तरह की पुलिसिया बाधा नहीं! (शाम 5:18 तक)! कुछ होगी कहानी!”
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- कॉकरोच जनता पार्टी की नियति जंतर मंतर के पुराने आंदोलनों से कितनी अलग होगी?
कहानी के पीछे सवाल
तो सवाल ये है कि वो क्या कहानी है जिसके तहत जून में सीजेपी को जंतर मंतर पर धरना लगाने की इजाज़त दी गई?
यह तब हुआ जब दिल्ली एनसीआर में मज़दूरों का एक विशाल प्रोटेस्ट हुआ था, सैलरी बढ़ाने को लेकर और उसमें कई सौ लोगों को जेल में बंद कर दिया गया, कुछ पर एनएसए तक लगाया गया।
वो क्या कहानी है कि जब आंदोलन सीजेपी के हाथ से निकल गया तो अचानक 25 जुलाई को केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफ़ा हुआ और उसी शाम सीजेपी ने आंदोलन को अचानक समाप्त करने की घोषणा कर दी?
वो क्या कहानी है कि नीट परीक्षा की तैयारी करने वाले जिन छात्रों ने आत्महत्या की, उनको मुआवज़े की मांग को वहीं छोड़ दिया गया और दोबारा सीजेपी के एजेंडे का हिस्सा नहीं बना?
वो क्या कहानी है कि जिस एसआईआर को लेकर पिछले कुछ महीनों से विपक्ष लगातार मुद्दा उठा रहा है, उसके ख़िलाफ़ अचानक सीजेपी ने आंदोलन की घोषणा कर दी और दो से आठ तक देश भर में विपक्ष के अभियान के बाद 10 अक्तूबर को दिल्ली के जंतर मंतर पर धरना प्रदर्शन करने का एलान किया?
वो क्या कहानी है कि शुरू से ही सीजेपी के समर्थन में आम आदमी पार्टी ने खुली अपील दे रखी थी और दो अक्तूबर को भी आम आदमी पार्टी के शीर्ष नेताओं ने गिरफ़्तारी दी?
इन सवालों के जवाब आने वाला वक़्त खुद दे देगा। लेकिन इतना अंदाज़ा तो लगाया जा सकता है कि जनता के बीच भारी रोष और गुस्सा है। युवा पीढ़ी के अंदर बेरोज़गारी और विकास के खाली मौकों से भारी गुस्सा है। राजनीतिक दल और देश के शासक वर्ग में बेचैनी है और वो इस रोष का भुनाना चाहते हैं।
बावजूद कि जनता को पता है कि शासक वर्ग का एक हिस्सा एक दिन चला जाएगा, दूसरे आएंगे और फिर भी हालात नहीं सुधरने वाले, उनके सामने सड़क पर उतरने के अलावा कोई चारा नहीं है।
इस उथल पुथल के दौर में अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों और साम्राज्यवादी शक्तियों की भूमिका को भी नज़रअंदाज़ करने से पूरी तस्वीर नहीं दिखने वाली।
जब पूरी दुनिया एक भयान वैश्विक युद्ध के मुहाने पर है, साम्राज्यवादी शक्तियां हर देश में अपनी कठपुतली सरकारें बैठा रही हैं और उनके ख़िलाफ़ एक पॉकेट प्रतिरोध भी तैयार कर रही हैं ताकि जनता के गुस्से को ठंडा करने के लिए एक को हटाकर दूसरे को बैठाया जा सके।
सवाल है कि क्या भारत साम्राज्यवादी हस्तक्षेप से मुक्त है? क्या उसकी अपनी संप्रभुता, संविधान, लोकतंत्र किसी हद तक बचा है, जिससे वो स्वतंत्र निर्णय ले सके?
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