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माइक्रोमैक्स में 303 वर्करों की छँटनी ग़ैरकानूनी घोषित

ट्रिब्यूनल ने कहा छँटनी अवैध, श्रमिक सभी हितलाभ पाने के अधिकारी

उत्तराखंड के पंतनगर सिडकुल औद्योगिक क्षेत्र में 15 महीने लंबे संघर्ष के बाद भगवती प्रोडक्ट्स (माइक्रोमैक्स) के मज़दूरों को कोर्ट में शानदार सफलता मिली है।

औद्योगिक न्यायाधिकरण ने सारे पक्षों को सुनने के बाद 303 श्रमिकों की छँटनी को गैरकानूनी घोषित कर दिया।

13 मार्च को जारी आदेश में साफ़ लिखा है कि प्रबंधन  द्वारा की गई छंटनी अवैध और अनुचित है और सभी मज़दूर सभी सुविधाओं को पाने के अधिकारी हैं।

इसी के साथ सभी वर्करों की सवेतन कार्यबहाली का रास्ता साफ हो गया।

माइक्रोमैक्स कंपनी गेट पर 420 दिन से धरना, अधिकारी तक लगे धरना तुड़वाने में

माइक्रोमैक्स, भगवती प्रोडक्ट्स प्रा लि में मजदूरों के धरने का 417 वा दिन। देखिए किस हालत में रह और संघर्ष कर रहे हैं बीटेक किये हुए मज़दूर। सिडकुल पंतनगर, उत्तराखंड से लाइव।

Posted by Workers Unity on Friday, February 21, 2020

15 महीने से जारी रहा है संघर्ष

माइक्रोमैक्स उत्पाद बनाने वाले भगवती प्रबंधन ने 27 दिसंबर 2018 से 303 वर्करों, जिसमें महिला व पुरुष दोनों शामिल हैं, की गैरकानूनी छँटनी कर दी थी।

साथ ही प्रबंधन में बाकी बचे वर्करों में से यूनियन अध्यक्ष सूरज सिंह बिष्ट को निलंबित कर दिया था और बाकी 47 मज़दूरों को गैरकानूनी ले ऑफ के तहत बाहर बैठा दिया।

यूनियन ने प्रेस कांफ्रेंस कर कहा, “मजदूरों का यह संघर्ष लगातार जारी है। पुलिस प्रशासन के फर्जी मुकदमों को झेलते हुए विगत 15 महीने से हम मज़दूर कंपनी गेट पर लगातार धरना के साथ आंदोलन को तरह-तरह के से ऊपर उठाने का प्रयास करते रहे। हम जमीनी लड़ाई के साथ हाईकोर्ट से लेकर औद्योगिक न्यायाधिकरण तक कानूनी लड़ाई भी लड़ते रहे।”

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एकता के बूते चले संघर्ष की कहानी-

मज़दूरों का कहना है कि कंपनियों का यह धंधा बन गया है कि एक राज्य में एक जगह तरह तरह की सब्सिडी और तरह-तरह के सरकारी रियायतों को लेकर प्लांट लगाते हैं और छूटों की अवधि समाप्त होने के बाद अपना मुनाफा बटोर कर दूसरे राज्य में पलायन कर जाते हैं।

भगवती प्रोडक्ट्स माइक्रोमैक्स के प्रबंधन की भी यही चाहत थी। इसीलिए कभी 5000 मज़दूरों वाले भगवती कारखाने से प्रबन्धन धीरे-धीरे करके मशीनें और तमाम मज़दूरों को यहाँ से हटाता रहा, और अंततः बाकी मज़दूरों के ऊपर उसने गाज गिरा दी थी।

उन्होंने कहा, ‘हमारी कम्पनी का यह भी धंधा है कि मज़दूरों से 3-4 साल काम कराओ फिर उन्हें निकालकर नये मज़दूर भर्ती करो। 2007-08 में कम्पनी ने जिन मज़दूरों की भर्ती की, उन्हें 2011 में निकाल दिया। पुनः 2012-13 में हमें भर्ती किया और 2018 में निकाल दिया।’

2017 में जब प्रबन्धन ने मज़दूरों की छँटनी और पन्तनगर प्लांट के मुनाफे से खड़ा हुये दूसरे प्लांटों (भिवाड़ी व हैदराबाद) में भेजने की शुरुआत की तो हमने अपने को संगठित किया और भगवती श्रमिक संगठन नाम से यूनियन बनाई।

12 दिसम्बर, 2018 को श्रम विभाग द्वारा यूनियन का वेरीफिकेशन हुआ। इसकी सूचना मिलते ही प्रबन्धन ने साजिश रची और गैरकानूनी छँटनी की और लगातार गैरकानूनी ले ऑफ का हथकण्डा अपनाता रहा।

शाषन-प्रशासन-श्रम विभाग की भूमिका

इस पूरी प्रक्रिया में जिला प्रशासन, श्रम विभाग से लेकर शासन और सरकार तक ने प्रबन्धन का ही साथ दिया। हमपर फ़र्जी मुक़दमे लगाए लेकिन हम धैर्य के साथ अपने संघर्ष में डटे रहे।

श्रम विभाग ने एक भी वार्ता कराये बगैर मामले को लटकाने के लिए छँटनी का विवाद औद्योगिक न्यायाधिकरण भेज दिया। ले ऑफ के मामले में श्रम विभाग ने अपने ही पूर्ववर्ती आदेश का पालन नहीं कराया और आज भी 47 मज़दूर गैरकानूनी लेऑफ के कारण सड़क पर हैं।

विकट स्थितियों में हमने उच्च न्यायालय नैनीताल की शरण ली थी, जिसने प्रमुख सचिव श्रम को 40 दिन में विवाद को निस्तारित करने का आदेश दिया था।

लेकिन सारे तथ्यों को गोल करते हुए श्रम सचिव ने एकतरफा रूप से मालिकों के पक्ष में आदेश पारित कर दिया था जिसके बाद हम पुनः उच्च न्यायालय गए थे।

हमारी अपील पर उच्च न्यायालय, नैनीताल ने औद्योगिक न्यायाधिकरण को 90 दिन के भीतर मामले के निस्तारण का आदेश दिया था। जिसके कारण लगातार और जल्दी जल्दी सुनवाई हुई और अंततः यह आदेश पारित हुआ।

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न्यायाधिकरण में नहीं टिकीं प्रबंधन की दलीलें

प्रबंधन पक्ष ने लगातार यह साबित करने की कोशिश की कि उसके द्वारा की गई छँटनी पूरी तरह सही है। प्रबंधन पक्ष का कथन था कि उसने उत्तर प्रदेश औद्योगिक विवाद अधिनियम 1947 के प्रावधानों के तहत प्रक्रिया पूरी की है जिसके तहत अनुमति लेने की जरूरत नहीं है।

लेकिन श्रमिक पक्ष की ओर से पैरवी कर रहे उच्च न्यायालय के वरिष्ठ अधिवक्ता श्री एम सी पंत ने जोरदार तर्कों को प्रस्तुत किया और यह साबित किया कि प्रबंधन ने छँटनी के लिए उचित प्रावधानों का अनुपालन नहीं किया।

उन्होंने सर्वोच्च न्यायालय की नजीर प्रस्तुत करते हुए बताया कि उत्तरांचल फॉरेस्ट डेवलपमेंट कारपोरेशन एंड अदर्स वर्सेस जबर सिंह एंड अदर्स 2007 मामले में सर्वोच्च अदालत ने आदेशित किया था कि छँटनी के लिए केंद्रीय औद्योगिक विवाद अधिनियम 1947 की धारा 25 एन के अनुसार ही छँटनी की जा सकती है, जिसका अनुपालन प्रबंधन ने नहीं किया।

उन्होंने यह भी कहा कि प्रबंधन ने 27 दिसंबर को कंपनी में अवकाश घोषित किया और 29 दिसंबर को जब मज़दूर काम पर पहुँचे तो 27 दिसंबर की छँटनी दिख दी। एक ही तिथि पर दोनों करना ही छलनियोजन है।

न्यायाधिकरण ने जबर सिंह मामले को माना नज़ीर

माननीय न्यायाधिकरण ने प्रबंधन पक्ष के तमाम तर्कों व नज़ीरों को अस्वीकार करते हुए जबर सिंह मामले में दिए गए फैसले को नजीर माना और श्रमिकों के पक्ष में अपना फैसला सुनाया।

अपने निर्णय में पीठासीन अधिकारी ने स्पष्ट किया कि “विपक्षी सेवायोजक द्वारा की गई वर्तमान अभिनिर्णय वाद में अंतरवर्णित श्रमिकों की छँटनी अवैध एवं अनुचित है एवं वर्तमान अभीनिर्णय वाद में अन्तरवर्णीत श्रमिकगण वे सभी हित लाभ पाने के अधिकारी हैं, जो उन्हें दिए गए होते यदि उपरोक्त प्रकार से छँटनी ना की गई होती।“

प्रबंधन ने 144 श्रमिकों को हिसाब दिया जाना बताया था, लेकिन माननीय न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया है कि यह आदेश समस्त 303 श्रमिकों के ऊपर लागू होती है, सबको समान लाभ मिलेगा।

यूनियन पंजीकरण से भी मिली है जीत

प्रबन्धन की साजिश से हमारी यूनियन का पंजियन अभी भी बाधित है। ऐसे में भीतर बचे शेष श्रमिकों ने भगवती इम्पलाइज यूनियन बनाई, जो कि 26 फरवरी, 2020 को पंजीकृत हो गई। जिसका पंजियन संख्या 410 है।

प्रेसवार्ता में दीपक सनवाल, वंदना बिष्ट, नंदन सिंह बगडवाल, सूरज सिंह, प्रशांत, अफज़ल, ठाकुर सिंह, आदित्य, लोकेश पाठक आदि यूनियन प्रतिनिधि शामिल थे।

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