प्रोफ़ेसर जीएन साईबाबा 10 साल की क़ैद के बाद रिहा होने पर पहली बार क्या बोले?

प्रोफ़ेसर जीएन साईबाबा 10 साल की क़ैद के बाद रिहा होने पर पहली बार क्या बोले?

माओवादियों के संबंध होने के कथित आरोपों में दस साल तक जेल में बंद रहने के बाद रिहा हुए प्रोफ़ेसर जीएन साईबाबा ने कहा कि उन्हें बुनियादी मानवाधिकार भी वंचित रखा गया.

रिहा होने के बाद पहली बार दिल्ली में प्रेस कांफ्रेंस के दौरान उन्होंने इन दस सालों में उन तकलीफ़ों का ज़िक्र किया जिनसे होकर वो गुजरे और उन सभी लोगों का धन्यवाद दिया जो उनके साथ खड़े रहे.

साईबाबा ने पत्रकारों से कहा, “10 साल लम्बे चले इस मामले के दर्द को मैं शब्दों में बयां नहीं कर सकता. आज यहाँ बैठे मुझे वो नरकीय अंडा शेल याद आ रहा, जहाँ मुझे इतने दिनों तक कैद रखा गया. मेरे बरी होने की इस पूरी प्रक्रिया के दौरान न सिर्फ मेरी परीक्षा हुई बल्कि उच्च अदालत का भी लिटमस टेस्ट था, क्योंकि न्याय में देरी न्याय से वंचित होने जैसा ही है.”

उन्होंने कहा कि ‘हमारे पूरे न्यायकि व्यवस्था को ये समझना होगा कि न्याय कि लम्बी प्रक्रिया भी अपने आप सज़ा भोगने जैसा होता है.’

उन्होंने कहा कि ‘मेरे परिवार ने जेल से बाहर होते हुए भी उसी यातना को भोगा है. उन पर भी तरह- तरह के आरोप लगाए गए लेकिन न्याय की उम्मीद और हमारी सच्चाई ने हमारा साथ नहीं छोड़ा. आज आप लोगों के सामने बैठ मैं ये कह रहा हूँ कि जेलों में हज़ारों लोग ऐसे ही झूठे मामलों में बंद पड़े हैं. दबे -कुचले वर्ग से आने वाले इन लोगों के न सिर्फ न्यायिक अधिकारों बल्कि मानवाधिकारों का भी हनन हो रहा है. जेल में मेरी जीवनरक्षक दवाइयों को भेजने से रोक दिया जाता था. जबकि मैं बिना दवा के अचेत हो जाता था. और सभी जानते हैं कि वर्टिगो दवा कितनी ज़रूरी है.’

जेल के अनुभव सुनाते रो पड़े

जेल के अपने अनुभव को साझा करते हुए साईबाबा ने बताया कि ‘मुझे कई तरह की शारीरिक परेशानियों के बावजूद मेडिकल सुविधा नहीं दी जाती थी. मैं महीनों दर्द में तड़पता रहता था, लेकिन मुझे डॉक्टर की मदद नहीं दी जाती थी. मैंने जेल में कई कैदियों की बिलकुल साधारण सी शारीरिक दिक्क्तों की वजह से जान जाते देखी है सिर्फ इसलिए की उन्हें किसी तरह की मेडिकल मदद नहीं मिली.’

अपनी मां के अंतिम दिनों में देखने जाने, मौत पर, अंतिम कृया में और फिर श्रद्धांजलि सभा में शामिल न होने देने की बात बताते हुए वो रो पड़े.उन्होंने कहा, “जिस मां की बदौलत मैं पढ़लिख कर आगे बढ़ पाया उसे देखने के लिए भी मुझे पैरोल पर रिहा नहीं किया गया, मानो मैं दुनिया का सबसे बड़ा आतंकवादी हूं.”

उन्होंने कहा कि इसी मामले में जेल में उनके साथ बंद एक और अभियुक्त पांडु नरोटे को उन्होंने अपने सामने मरते देखा. उन्होंने कहा, वो सिर्फ एक बुखार से मर गए और तबतक उन्हें अस्पताल नहीं ले जाया गया जबतक उनकी आखों और पेशाब से खून नहीं बहने लगा.

उन्होंने कहा कि पांडु नरोटे की मौत नहीं हुई, यह एक हत्या है. वो गढ़चिरौली के सबसे वंचित आदिवासी समुदाय से आते हैं, जिसके अस्तित्व को संयुक्त राष्ट्र ने भी संकटग्रस्त माना है.

उन्होंने कहा कि जेलें आदिवासियों, दलितों, पिछड़ों, ग़रीबों और अल्पसंख्यकों से भरी हैं. जेल में उन्हें बुनियादी अधिकार भी हासिल नहीं हैं. शायद मुझे भी दलित पृष्ठभूमि के कारण बुनियादी अधिकारों से वंचित रखा गया.उन्होंने उन वकीलों, मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और मीडिया कर्मियों का धन्यवाद किया जिन्होंने साथ दिया और रिहाई की उम्मीद बनाए रखी.

जिस वकील ने पैरवी की, वो आज जेल के अंदर

उन्होंने कहा, “दो वकीलों का नाम अवश्य लेना चाहूंगा. एक बांबे हाईकोर्ट के वयोवृद्ध वकील और दूसरे सुरेंद्र गाडलिंग.”

उन्होंने कहा, “सुरेंद्र गाडलिंग की वजह से मैं आज रिहा हुआ लेकिन पुलिस ने उन्हें जेल में डाल दिया. गाडलिंग ने जिस तरह मेरे मुकदमे की पैरवी की, उसी से मैं बाहर हुआ, लेकिन दुखद है कि जो यातना मैं 10 साल तक भुगतता रहा, आज वही यातना गाडलिंग भुगतने को अभिशप्त हैं. सिर्फ इसलिए कि उन्होंने मेरी पैरवी की. ट्रायल के दौरान ही पुलिस ने गाडलिंग को कहा था कि साईबाबा के बाद तुम्हें अंदर करेंगे. और मुझे सज़ा मिलने के कुछ ही महीने बाद उनपर भी मुकदमे थोपकर अंदर कर दिया गया.”

उन्होंने कहा, “मैं बचपन से पोलियग्रस्त हूं. मेरी मां बचपन से ही मुझे उठाकर स्कूल ले जाती थी. वो चाहती थी इसीलिए मैं दिल्ली विश्वविद्यालय में उस स्थिति तक पहुंचा. उसने मज़दूरी कर, कष्ट झेलकर मुझे पढ़ाया.”
उन्होंने अपनी पत्नी वसंथा का ज़िक्र करते हुए कहा कि उनके लिए संघर्ष में वसंथा ने कोई कसर नहीं छोड़ी.

उनके साथ पूर्व सांसद और सीपीआई नेता डी राजा, दिल्ली विश्विद्यालय की रिटायर्ड प्रोफ़ेसर और शिक्षक संघ की कई बार की अध्यक्ष रह चुकीं नंदिता नारायण, उनके साथ रिहा हुए हेम मिश्रा और उनके पिता और साईबाबा की पत्नी वसंथा भी मौजूद थे.

भावुक हुए सीपीआई नेता डी राजा

D Raja

डी राजा ने कहा, “जीएन साईबाबा के संघर्ष को मैं सलाम बोलता हूं. हम उनके साथ थे, हैं और आगे भी रहेंगे.”

जीएन साईबाबा की बेटी के संघर्षों को याद करते हुए उनकी आंखों में आंसू आ गए और वो रो पड़े.

लेकिन खुद को संयत करते हुए उन्होंने कहा कि सरकार ने अरबन नक्सल, अरब माओवादी के नाम पर बुद्धिजीवियों, मानवाधिकार कार्यकर्ताओं, वकीलों को निशाना बनाया जबकि फासीवादी साम्प्रदायिक शक्तियां देश के लिए ख़तरा बनी हुई हैं.

उन्होंने कहा, “अभी तक साईबाबा को पूरी तरह सरकार ने रिहा नहीं किया है और ऐसा नहीं है कि सरकार उनकी रिहाई के ख़िलाफ़ अपील नहीं करे. इसलिए हम मांग करते हैं कि उन पर और उनके जैसे अन्य लोगों के ख़िलाफ़ सभी मुकदमों को रद्द किया जाए, सरकार उनकी रिहाई के ख़िलाफ़ अपील न करे. उन पर थोपे गए यूएपीए के आरोपों को रद्द किया जाए.”

डी राजा ने कहा, “जब मनमाने तरीके से ज़ेल में डालने वाले यूएपीए क़ानून आया तो मैंने विरोध किया था. मैं अभी भी कहता हूं कि यह क़ानून रद्द किया जाना चाहिए.”

मालूम हो मार्च , 2017 में अदालत द्वारा साईबाबा सहित 5 अन्य लोगों को माओवादी संगठन और उनके अन्य संगठन रेवोल्यूशनरी डेमोक्रेटिक फ्रंट के साथ सम्बंधित होने के कारण आजीवन कारावास की सज़ा दी गई थी.

दिल्ली यूनिवर्सिटी में अंग्रेजी के प्रोफ़ेसर जीएन साई बाबा को एक पुराने मामले में बॉम्बे हाईकोर्ट के नागपुर बेंच द्वारा बरी किया गया. उन पर यूएपीए समेत कई मुकदमे दर्ज किए गए थे.
54 साल के साईबाबा व्हीलचेयर से चलते हैं और 99 फ़ीसदी विकलांग हैं. वह पिछले 11 साल से नागपुर की सेंट्रल जेल में थे.

क्या था मामला?

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• 2013 में हेम मिश्रा और प्रशांत राही को गिरफ्तार किया गया था.
• पुलिस का कहना था कि वो माओवादी नेताओं से मुलाक़ात करने वाले थे और ये मुलाक़ात प्रोफ़ेसर साईबाबा की मदद से तय हुई थी.
• इसके बाद 2013 में प्रोफ़ेसर जीएन साईबाबा के घर पर गढ़चिरौली और दिल्ली पुलिस की संयुक्त टीमों ने छापा मारा.
• उस समय प्रोफ़ेसर जीएन साईबाबा ने कहा था कि पुलिस उनका लैपटॉप, चार पेन ड्राइव, चार एक्सटर्नल हार्ड-डिस्क, कुछ किताबें अपने साथ ले गई.
• 2014 में प्रोफ़ेसर जीएन साईबाबा को दिल्ली में उनके घर से महाराष्ट्र पुलिस ने गिरफ्तार किया था.
• इसके बाद उन्हें यूनिवर्सिटी ने निलंबित कर दिया था.
• महाराष्ट्र की गढ़चिरौली अदालत ने यूएपीए के सेक्शन 13, 18, 20 और 39 के तहत प्रोफ़ेसर साईबाबा को दोषी पाया था.
• प्रोफ़ेसर साईबाबा पक्षाघात के मरीज़ हैं और 90 प्रतिशत विकलांगता की श्रेणी में आते हैं.
• सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद बिगड़ती सेहत के आधार पर उन्हें जुलाई 2015 में जमानत पर रिहा किया गया था.
• इसके बाद हाईकोर्ट ने उनकी ज़मानत रद्द करते हुए उन्हें आत्मसमर्पण करने को कहा था.

साईबाबा का पूरा भाषण आप नीचे दिए गए लिंक पर सुन सकते हैं:

https://www.facebook.com/share/v/7FUBKf32qcVeHujT/?mibextid=WC7FNe

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Abhinav Kumar

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