उत्तरकाशी सुरंग हादसाः बचाव में लगे मज़दूरों के पैरों में चप्पल, कर रहे गम बूट के बिना काम

उत्तरकाशी सुरंग हादसाः बचाव में लगे मज़दूरों के पैरों में चप्पल, कर रहे गम बूट के बिना काम

उत्तराखंड के उत्तरकाशी सुरंग हादसे में राहत और बचाव कर रहे मज़दूरों के पैरों में गम बूट (जूतेः तक नहीं हैं जबकि वहां कड़ाके की ठंड शुरू हो गई है।

इसी तरह की एक तस्वीर सामने आई है जिसमें सुरंग में ड्रिल की जा रही पाइप के सहारे मज़दूरों को बचाने की कोशिश में लगे मज़दूर चप्पल पहने मेहनत करते दिख रहे हैं।

उल्लेखनीय है कि उत्तरकाशी में निर्माणाधीन सुरंग में दीपावली के दिन हुए भूस्खलन के कारण पिछले 17 दिनों से 41 मज़दूर फंसे हुए हैं।

900 एमएम की पाइप ड्रिल कर रही कई ऑगर मशीनें ख़राब होने से पहले तक करीब 47 मीटर तक मलबे में रास्ता बनाया जा सका था। सोमवार को फिर से हाथ से खोद कर पाइप धंसाने का काम शुरू हुआ और मंगलवार की शाम तक मज़दूरों तक पाइप पहुंच गई है। और मज़दूरों को निकालने की कार्रवाई की तैयारी की जाएगी।

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यह तस्वीर उत्तराखंड के एक स्वतंत्र पत्रकार आसिफ़ अली ने ली है, जिसे बीबीसी ने प्रकाशित किया था। यहां साभार प्रकाशित है।

मज़दूरों के परिजनों की शिकायतें

मौके पर पहुंचे कई मज़दूरों के परिवार वालों ने भी आरोप लगाया कि ” मज़दूरों को काम के दौरान भी किसी खास तरह की सुरक्षा नहीं दी जाती और अब उनके रेस्क्यू के दौरान भी कुछ ऐसा ही देखने को मिल रहा है।

टनल के अंदर फंसे मज़दूर मंजीत के पिताजी जो कि उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी से आये हैं अपने बेटे के लिए ने बताया कि” मेरे पास इतने पैसे नहीं थे कि मैं यहाँ आ पाता.आखिर में मुझे घर में रखे थोड़े गहनों को गिरवी रख ,पैसे का जुगाड़ किया और यहाँ आ पाया। हम बेहद परेशान हैं। इससे पहले मेरे बड़े बेटे कि भी मौत निर्माण कार्य के दौरान काम करते हुए हो गई थी,मैं अपना दूसरा बेटा नहीं खोना चाहता।”

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सुरंग का निर्माण करने वाली हैदराबाद स्थित कंपनी नवयुग इंजीनियरिंग कंपनी लिमिटेड पर आरोप है कि उसने सुरंग निर्माण के शुरू से ही हादसे के लिए एक अलग सुरक्षित रास्ता बनाने पर ध्यान नहीं दिया।

बीबीसी हिंदी के अनुसार, एक मज़दूर ने कहा कि “सुरंग में 200 से 270 मीटर तक हादसे से कुछ दिन पहले से ही कुछ समस्या थी। पत्थर गिर रहे थे, इसकी मरम्मत की जा रही थी और 12 नवंबर को अचानक वो हिस्सा नीच आ गिरा।”

इससे पहले भी ख़बर थी हादसे वाली जगह पहले भी मरम्मत की गई थी।

दिवाली के दिन यानी 12 नवंबर को साढ़े चार किलोमीटर लंबी सुरंग का निर्माणाधीन हिस्सा ढह गया, जिसके बाद सुरंग के 70 मीटर क्षेत्र में मलबा फैल गया, जिससे मजदूरों का रास्ता बंद हो गया।

इसके बाद से अंदर फंसे सभी 41 कर्मचारियों को पाइप के जरिए खाना, ऑक्सीजन और पानी भेजने की कोशिश हुई थी।

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15 नवंबर, यानी हादसे के चौथे दिन मज़दूरों के साथियों ने टनल के बाहर विरोध प्रदर्शन किया और प्रशासन और टनल बनाने वाली कंपनी के नकारेपन पर गुस्सा ज़ाहिर किया था।

मज़दूरों के प्रदर्शन के बाद काम में आई तेजी

72 घंटे बीतने के बाद मज़दूरों का जब सब्र का बांध टूटा तो टनल के बाहर वहां काम करने वाले मज़दूरों और स्थानीय ग्रामीणों ने अंदर फंसे लोगों को जल्द से जल्द बाहर निकालने के लिए प्रदर्शन शुरू कर दिया।

प्रदर्शन में शामिल एक मज़दूर ने कहा था कि प्रशासन कुछ स्पष्ट नहीं जवाब दे रहा है और आश्वासन दे रहा है कि आज निकालेंगे, कल निकालेंगे लेकिन अभी तक चार पांच दिन हो गया है कोई सूरत नज़र नहीं आ रही।

प्रदर्शनकारियों ने जीएम समेत उच्च अधिकारियों को मौके पर पहुंच कर स्पष्ट जवाब देने की मांग की।  एक मज़दूर के अनुसार, “सारे साहब और नेता दिवाली और भैयादूज मनाने में व्यस्त थे।”

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Workers Unity Team

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