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10 कारण, जिनकी वजह से भटक रहीं या लेट हो रहीं श्रमिक स्पेशल ट्रेनें

ट्रेन संचालन में सिर्फ लापरवाही ही नहीं, बल्कि सरकार की खास मंशा भी है शामिल

By आशीष सक्सेना

लॉकडाउन में बमुश्किल ट्रेन चलाने को राजी हुई सरकार इसमें भी शायद अवसर तलाश चुकी है। चलाई जाने वाली श्रमिक स्पेशल ट्रेनों का हाल ये है कि कई ट्रेनें रास्ता भटककर कहीं की कहीं पहुंच गईं तो दो दर्जन रास्ता बदलकर आखिरी पड़ाव पर पहुंचीं, जहां से मजदूरों को फिर मुसीबत का सफर तय करना पड़ रहा है।

वर्कर्स यूनिटी ने इस पूरे मामले की तह तक जाने की कोशिश की तो कई वजह सामने आईं, जिनमें एक निजीकण की ओर ले जाने की तैयारी भी इस अनाप-शनाप ट्रेन संचालन का कारण बतौर सामने आया।

इस संबंध में जानकारी दी ट्रेन संचालन में प्रमुख भूमिका निभाने वाले कुछ चीफ कंट्रोलरों ने। हालांकि, वे इस बात को तैयार नहीं हुए कि उनके नाम से इस संबंध में प्रकाशित किया जाए, क्योंकि सरकार गलती बताने वाले को तुरंत सजा देने को हर वक्त तैयार बैठी है।

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चीफ कंट्रोलरों के बताए कारण

1- सामान्य टाइम टेबुल के हिसाब से ट्रेन संचालन नहीं हो रहा है, बल्कि ट्रेन ऑपरेशन का समय अनुमान लगाकर किया जा रहा है, जैसे ट्रेन की औसत रफ्तार कितनी है और आखिरी पड़ाव की दूरी कितनी है। ट्रेन शुरू करने वाला डिवीजन दूसरे डिवीजन को जानकारी दे देता है।

2- आम दिनों में ट्रेन संचालन वाले स्टाफ को रूट चार्ट भी मुहैया कराया जाता है, जबकि इन दिनों मौखिक ही बता दिया जाता है कि यहां से चलेगी और यहां आखिरी स्टेशन है।

3- ट्रेन को कहीं पर भी स्लो करके झटका न देने के निर्देश हैं, जिससे बीच में सवारियां न उतर सकें और न चढ़ सकें। ऐसे में रन थ्रू निकालने के लिए लाइन क्लियर चाहिए होती है। कई बार इस वजह से डायवर्ट रूट भी अपनाया जाता है। ट्रेनें संख्या से चलती हैं, जैसे किसी ट्रेन का नाम 8312 हो, ऐसे में नंबर सुनने में जरा सी चूक होने पर स्टेशन मास्टर और कंट्रोलर का निर्णय ट्रेन को कहीं का कहीं पहुंचा सकता है।

4- रेलवे संचालन के उच्च अधिकारी कंट्रोलर के पूछने पर इतना ही पूछते हैं कि ट्रेन को कहां पहुंचना है, केवल इतने के लिए क्लियर रूट पर डायवर्ट करा देते हैं। वे जानने की कोशिश नहीं करते कि बीच के किसी स्टेशन पर ज्यादा लोगों को उतरने की जरूरत तो नहीं है।

5- सिर्फ 33 फीसद स्टाफ को ही ड्यूटी पर बुलाने से वर्कलोड काफी बढ़ गया है, भले ही सवारी ट्रेनों की संख्या कम है। इस बीच बड़े पैमाने पर ब्लॉक लिए जा रहे हैं और पटरी पर कई काम कराए जा रहे हैं, उनके बारे में भी कंट्रोलरों को सूचना का आदान-प्रदान करना होता है।

6- आम दिनों में भी ट्रेन कंट्रोलरों को दो-दो दर्जन ट्रेनों के संचालन करना पड़ता है, जिससे समस्याएं आती हैं, जबकि इस समय एक ही कंट्रोलर को दो-दो बोर्ड देखकर काम कर रहे हैं, मतलब एक से ज्यादा रूट पर काम करना।

7- ट्रैक पर सवारी गाडिय़ां न होने से मालगाडिय़ों को प्राथमिकता से गुजारना होता है, इसके साथ ही ब्लॉक की वजह से कई घंटे तक गाडिय़ां खड़ी कराना पड़ती हैं। इससे ट्रेन लेट होती हैं। ब्लॉक लेकर लाइनें ठीक करने का मकसद भी निजीकरण ट्रेन संचालन को तवज्जो देना है।

8- रेलवे अपने आधे स्टाफ को कम करने की योजना पर काम कर रहा है। इस दौरान की प्रैक्टिस कम लोगों से ज्यादा काम लेने, कई तरह के काम लेने को हो रही है। काडर को विलय करके कई काम लेने की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है।

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9- अफसरों के अनावश्यक खर्चों और ट्रेन संचालन में प्रमुख पदों को न भरने से खतरे पैदा हो रहे हैं, जिसका खामियाजा रेल कर्मचारियों को बदनामी से भुगतना पड़ सकता है। इस संकट की स्थिति में उनकी मेहनत और समर्पण जरा सी चूक पर निजीकरण की जरूरत का तर्क बन जाएगा।

10- श्रमिकों के प्रति अफसरों का नजरिया इतना ही है कि इनको एक जगह से दूसरी जगह लाकर छोड़ दिया जाए, भले ही उनको वहां से गंतव्य तक जाने में कितनी ही परेशानी हो। फर्ज अदायगी का ये तरीका श्रमिकों के मोल को न समझना है, भले ही वे रेल के ही क्यों न हों।

(वर्कर्स यूनिटी स्वतंत्र निष्पक्ष मीडिया के उसूलों को मानता है। आप इसके फ़ेसबुकट्विटर और यूट्यूब को फॉलो कर इसे और मजबूत बना सकते हैं।)

 

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