कोरोनाख़बरेंप्रमुख ख़बरें

लॉकडाउन कथाः मुंबई से भोपाल पहुंचे हैं, झोला ढोते ढोते कंधा छिल गया, अभी 700 किमी और चलना है

महाराष्ट्र और मुंबई से चलकर भोपाल पहुंचने वाले मज़दूरों का हाल, जितने लोग उतनी कहानियां

By सचिन श्रीवास्तव

मुंबई से चले हैं। कांधे पर बैग टंगा हुआ। चलते चलते दर्द तो हो रहा था, लेकिन घर पहुंचने की जिद में एक बार बेगाने शहर को पीछे छोड़ दिया तो लौटना नामुमकिन था।

भोपाल पहुंच रहे हैं लेकिन साथ चल रहे लोग आगे न निकल जाएं सो कदमताल भी जल्दी करना है। इस बीच कांधे से कब घिस घिस कर बैग की डोरी ने जख्म बना दिया पता ही नहीं चला।

हालांकि ये जख्म दिख रहा है। जो घाव सीने पर लगे हैं, वे कभी नहीं भरेंगे। बस टीस बनकर उभरते रहेंगे।

उन्हें न किसी से कह पाएंगे, न कोई उन्हें सुनने के लिए आगे आएगा। बस कसूर नहीं पता, फिर भी सजा भुगत रहे हैं। अभी अपना घर 700 किलोमीटर और दूर है।

मेहनत करने से कोई अमीर नहीं होता

महाराष्ट्र, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना के विभिन्न इलाकों से आ रहे नागरिकों, जिन्हें इन दिनों प्रवासी मजदूर का नाम दिया गया है, का दर्द लगभग एक जैसा है। बिहार, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश के विभिन्न इलाकों की ओर जा रहे इन नागरिकों के हुनर से देश संपन्न हुआ है, लेकिन हमेशा की तरह ग़रीब ही रहे।

बातचीत में वे साफ करते हैं, “हमने तो खूब मेहनत की, लेकिन हमारे हिस्से में पैसा कभी नहीं आया। हां, फैक्ट्री, कारखाने के मालिक जरूर अमीर होते गए। जिन्हें उन्होंने स्कूटर पर देखा था, अब कारों और हवाई जहाज से बातें करते हैं।”

ये गए ट्रेनों के जनरल डिब्बे में थे, लौट रहे हैं पैदल खाली हाथ।

जिसकी जैसी हैसियत उसकी वैसी तकलीफ़

जो लोग यह कह रहे हैं कि कोरोना के संकट में पूरा देश एक साथ है, असल में वे झूठे हैं। कोरोना की मुसीबत हैसियत के मुताबिक छल रही है। प्रवासी मजूदरों के मामले में भी ऐसा ही है।

पैदल हों, स्कूटी पर, आटो रिक्शा में, ट्रक की छत पर या फिर किसी और साधन से, देखने में वे एक जैसे लगते हैं। लेकिन दर्द अलग अलग है। जिसकी जेब में थोडा पैसा था, उसने निजी कार कर ली। कोई साझा ट्रक में पैसा देकर सफर कर रहा है।

जमा पूंजी से कोई साइकिल खरीदकर निकल पड़ा है, तो किसी ने अपनी स्कूटी, आटो पर ही यात्रा की तैयारी कर ली। इसके अलावा भी थे, जिनके पास बस अपने दो पैर थे और अदम्य साहस। वे निकल पड़े अपने हौसले के साथ।

उत्तर और दक्षिण के बीच बहुत फर्क है, एक यह भी

भारत एक देश है, लेकिन उत्तर और दक्षिण के बीच की खाई हमेशा उभर ही आती है। इस वक्त इसे देखना तो नहीं चाहा, लेकिन नजरअंदाज करना भी मुश्किल है। उत्तर भारत सड़कों पर है, दक्षिण के राज्यों से लौट रहा है।

मेहनतकश अवाम का यह देश कुछ इस तरह से बंटा है कि समृद्धि का शिखर चंद महानगरों के हिस्से में है और गांवों के हिस्से में मेहनत लिखी गई है। दिलचस्प यह भी है कि यह मेहनती गांव ज्यादातर उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखंड के हैं। बिहार और उत्तर प्रदेश कुछ और भी ज्यादा। क्या दक्षिण के थोड़ कारखाने उत्तर में नहीं लाए जा सकते?

असली लड़ाई तो अभी शुरू भी नहीं हुई

12 मई को विदिशा बाईपास पर आमद लगभग आधी थी तो साथियों के चेहरे पर कुछ ताजगी थी। बोले कि धीरे धीरे संख्या कम हो रही है, यानी लोगों को साधन मिल रहे हैं घर जाने के। मुझे यह चिंता लगी। असली लड़ाई तो अभी शुरू होगी।

बीजापुर से चले धर्मेंद्र ने कल कहा भी था यहीं पर कि, “गांव में जाकर क्या करेंगे, यह भी सोचना है।”

असल में पलायन से वापसी मुश्किलों का अंत नहीं, बल्कि शुरूआत है। गांवों में मेहनतकशों की संख्या बहुत ज्यादा है और काम बहुत कम। शहरों में काम बहुत है, और काम करने वाले हाथ कम। इनके बीच संतुलन बनने में अभी वक्त लगेगा। लेकिन तब तक सामाजिक घर्षण बहुत ज्यादा होगा।

खेती छोड़ गए थे, फिर खेती से ही आस

नंदलाल गोरखपुर गए हैं, शायद पहुंचने वाले होंगे। उनकी बात याद आती है। कह रहे थे, “12 साल पहले खेती छोड़कर भाग गए थे कमाने। अब खेती का ही भरोसा है। शहर में जो मुसीबतें झेली हैं, उससे तो अच्छा है कि गांव द्वार में ही रहते तो शायद आज ये दिन न देखना होता।”

मुश्किल यह है कि खेतों पर पहले ही जरूरत से ज्यादा काम करने वाले लगे हुए हैं। क्या अतिरिक्त श्रम को झेलने के लिए हमारे खेत तैयार हैं।

अपने घर होते तो हम भी खाना बांट रहे होते

सुबह सुबह खाना लेते वक्त प्रमोद यादव की आंखें नीचे थीं। कोने में जाकर खाने लगे तो मैं करीब पहुंचा। पूछा, ‘कहां से आ रहे हैं,’ तो बस ‘पुणे’ कहकर चुप हो गए। मैंने कहा, ‘सब ठीक है, कोई और भी साथ है,’ तो आंखें नम हो गई। मैं हौसले की नसीहत दी तो फट पड़े, “सर हम अपने गांव में होते तो हम भी लोगों की मदद कर रहे होते। बहुत बुरा लग रहा है, लेकिन हम क्या करें।”

मैंने कहा, “कुछ देर आराम करो फिर कुछ ट्रक रोकना और लोगों को उनमें बैठाएंगे।” उसके बाद से करीब 3—4 घंटे प्रमोद हमारे साथ रहे। जाते वक्त अपना नंबर और देवरिया आने का न्यौता भी दे गए हैं।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं और भोपाल में रहते हैं। ये कहानी उनके फ़ेसबुक पेज से साभार ली गई है।)

(वर्कर्स यूनिटी स्वतंत्र निष्पक्ष मीडिया के उसूलों को मानता है। आप इसके फ़ेसबुकट्विटर और यूट्यूब को फॉलो कर इसे और मजबूत बना सकते हैं। वर्कर्स यूनिटी के टेलीग्राम चैनल को सब्सक्राइब करने के लिए यहां क्लिक करें।)

Tags
Show More

Related Articles

Back to top button
Close