इस महा विपदा में मोदी ने पल्ला झाड़ लिया, ख़त्म हो जाएंगी 2.5 करोड़ नौकरियां

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By आशीष सक्सेना

प्रधानमंत्री और कुछ बड़ी कंपनियों ने कर्मचारियों के लिए जुबानी तौर भले ही नौकरी और वेतन के मसले पर आश्वासन दिया है या विचार कर रहे हैं।

अलबत्ता, नए कोरोना वायरस नेे मजदूर वर्ग के लिए महज सेहत का नहीं, बल्कि भविष्य में रोजी-रोटी का संकट का संकेत देना शुरू कर दिया।

मॉल, दुकानें, छोटे-बड़े कारखानों में ठेकेदारी के तहत काम करने वालों की छंटनी शुरू होने के संकेत मिलना शुरू हो गए हैं। ग्राहकों या उत्पादन के घटने से काम से निकालने का सिलसिला शुरू हो गया है।

ऐसा सिर्फ इस बहाने पर भी किया जा रहा कि किसी को सामान्य सर्दी लग गई है तो उसे नहीं आना है।

ये ठीक उसी तर्ज पर है जैसे रेलवे ने यात्रियों के घटने से गाडिय़ों को निरस्त कर दिया है। इससे सिर्फ वे ही कर्मचारी आश्वस्त हैं जिनकी नौकरी पक्की है, वे नहीं जो ठेकेदारी के तहत काम कर रहे हैं।

महामारी लाएगी बेरोज़ग़ारी

कोरोना वायरस की महामारी के माहौल में प्रधानमंत्री ने बृहस्पतिवार को रोजगार मुहैया कराने वाले मालिकों से कर्मचारियों से हमदर्दी के साथ पेश आने की अपील की।

लेकिन इसका कितना असर होगा इसका अंदाजा पहले से मौजूद नियम कानून लागू करने की मंशा से जाहिर है।

सरकार न सिर्फ सार्वजनिक उपक्रमों को निजी हाथों में बेचने की कोशिश में है, बल्कि निजी मालिकाने को कोई तकलीफ न हो, इसलिए मजदूरों की सेहत और वेतन को लेकर खासी लापरवाही की छूट दे दी गई है।

आने वाली सूचनाएं भारत के लिए लगभग सही हैं, इसका अंदाजा इससे भी लगा सकते हैं कि संयुक्त राष्ट्र की एजेंसी ने भी मौजूदा महामारी से बेरोजगारी बढऩे और 2.5 करोड़ नौकरियां खत्म होने का अनुमान लगाया है।

एजेंसी के अनुसार, महामारी की वजह से भयानक आर्थिक संकट जन्म लेगा, जिसका असर पूरी दुनिया पर दिखाई देगा।

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सरकार ने छोड़ा मालिकों के भरोसे

ऐसे में मजदूर वर्ग को कितना चिंतित होना चाहिए, ये जानना-समझना बहुत जरूरी हो गया है।

सरकार का बचाव बंदोबस्त बहुत लचर, नाकाफी और संपन्न वर्ग की जरूरत तक ही सीमित है। जबकि ये महामारी अगर मजदूर वर्ग के पास तक पहुंची तो देश में कहर बरपेगा।

देश महामारी के संभावित तीसरे चरण में दाखिल हो गया है और संक्रमण के केस बढऩे के साथ ही मौत का आंकड़ा भी बढऩा शुरू हो चुका है।

मजदूर वर्ग सबसे खतरनाक स्थिति में है, क्योंकि उसके पास जीने-मरने के हालात हर तरफ हैं।

वह चाहे कारखानों में हो या खेतों में। मजूदरों को राहत के मामले में सरकार सिर्फ अपील से काम चला रही है, जो मालिकों के विवेक पर निर्भर है, जिस पर भरोसा बिल्कुल भी नहीं किया जा सकता।

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वर्कर्स यूनिटी का सुझाव

वर्कर्स यूनिटी का सुझाव है कि फौरी तौर पर मजदूर वर्ग का एक राष्ट्रीय स्तर का नेटवर्क स्थापित किया जाए।

इस नेटवर्क के साथ मजदूर वर्ग और उसके सहयोगी तबकों से हमदर्दी रखने वाले संगठन, पार्टी, मंच, स्वतंत्र कार्यकर्ता जुड़ें।

शहर, कारखानों, बस्ती, मुहल्लों में टीमें बनाई जाएं, जो मजदूरों और उनके परिवारों की मदद को हाजिर हो सकें।

ऐसे चिकित्सक, पैरामेडिकल स्टाफ, राशन की व्यवस्था के लिए ये नेटवर्क एक दूसरे की मदद करे।

असंगठित मजदूरों के लिए सार्वजनिक उपक्रमों की व्यवस्था का भी लाभ दिलाने की कोशिश की जाए, जो वहां की ट्रेड यूनियनें करा सकती हैं।

वर्कर्स यूनिटी की ओर से फेसबुक पेज बनाकर इसकी अपील की जा रही है और संबंधित अपडेट और सूचनाएं साझा की जा रही हैं।

जो लोग भी मजदूर वर्ग के नेशनल हेल्थ इमरजेंसी नेटवर्क में सहयोग करना चाहते हैं, वे हमें सूचित करें। या फिर कोई संगठन इसकी जिम्मेदारी ले सकता है।

(वर्कर्स यूनिटी स्वतंत्र निष्पक्ष मीडिया के उसूलों को मानता है। आप इसके फ़ेसबुकट्विटर और यूट्यूब को फॉलो कर इसे और मजबूत बना सकते हैं।)