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दो सालों में बेरोज़गारी दोगुना बढ़ी, अमरीका के कहने पर हुई नोटबंदी ने ढाहा कहर

नोटबंदी का असर सिर्फ और सिर्फ अर्थव्यवस्था पर ही नहीं बल्कि रोजगार पर भी दिखाई दे रहा है।

रोज़गार की लाइन में लगे भारत के तीन करोड़ बेरोजगारों का धैर्य अब जवाब देने लगा है।

अभी हाल ही में हुए एक सर्वे में पता चला है इस देश में बेरोजगारी दर दो साल से सबसे ऊंची यानी 6.9% पर पहुंच गई है।

यानी हर 100 रोज़गार के पीछे करीब 7 बेरोज़गार क़तार में खड़े हैं।

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बेरोज़गारों की संख्या 2 साल में दोगुनी

पिछले महीने अक्टूबर में क़रीब 3 करोड़ बेरोज़गार थे, जबकि पिछले साल जुलाई महीने में क़रीब एक करोड़ 40 लाख बेरोज़गार थे।

यानी पिछले साल के मुकाबले बेरोज़गारों की संख्या दोगुनी हुई है।

अर्थशास्त्रियों का मानना है नोटबंदी से लघु और मध्यम उद्योग एवं कारोबार मंदी की चपेट में आ गए।

इसकी वजह से फैक्ट्रियां बंद हुईं या आंशिक रूप से छंटनी का शिकार हुईं और रोज़गार के अवसर पैदा होने की बजाय और कम हो गए।

भारतीय अर्थव्यवस्था की निगरानी करने वाली संस्था सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनामी के अनुसार, श्रम हिस्सेदारी दर (लेबर पार्टिसिपेशन रेट) जनवरी 2016 से भी कम होकर 42.4% पहुंच गई है।

साढ़े चार साल चले अढ़ाई कोस

जब मोदी ने सत्ता संभाली थी तो उन्होंने वादा किया था कि हर साल 2 करोड़ रोजगार का सृजन करेंगे।

इसका मतलब यह हुआ इन साढे 4 सालों में अबतक नौ करोड़ नए रोजगार पैदा हो गए होंगे।

लेकिन सरकारी आंकड़े ही बताते हैं कि मोदी सरकार के कार्यकाल में अब तक मात्र छह लाख नई नौकरियां ही पैदा हुईं।

‘चौथी औद्योगिक क्रांति’ का जुमला फेंकने वाले प्रधानमंत्री की नोटबंदी और जीएसटी जैसी स्कीमें लाने के फैसले ने भारतीय उद्योगों और कारोबार पर उल्टा असर डाला है।

8 नवंबर 2018 को नोटबंदी के 2 साल पूरे हुए लेकिन जैसा वादा था न भ्रष्टाचार खत्म हुआ, न जाली नोटों का पता चला ना ही आतंकी और नक्सलियों की कमर टूटी।

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प्रधानमंत्री ने नोटबंदी की घोषणा के बाद कहा था कि ‘अगर मेरा निर्णय ग़लत हुआ तो मुझे जला देना।’ इसके दुष्परिणाम सामने आने के बाद अब लोग मोदी से माफी मांगने की डिमांड कर रहे हैं।

तो अमरीका के कहने पर हुई थी नोटबंदी?

एक अंतरराष्ट्रीय अंग्रेजी मीडिया संस्थान ग्लोबल रिसर्च ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि ये ओपन सीक्रेट है कि ‘अमरीका के कहने पर मोदी ने नोटबंदी जैसा आत्मघाती कदम उठाया।’

राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय अर्थशास्त्रियों का भी यह मानना है कि नोटबंदी भारतीय रिटेल और छोटे एवं मझोले उद्योगों की कमर तोड़ने के लिए की गई।

ताकि इस बाज़ार को बहुराष्ट्रीय कंपनियों के हवाले करने और उनके लिए खुला मैदान तैयार किया जा सके।

क्योंकि नोटबंदी का सबसे अधिक असर छोटे धंधे करने वालों कारोबारियों, छोटे एवं मझोले उद्योग धंधे, अनाज और सब्जी का धंधा करने वालों, परचून की दुकान चलाने वालों, फुटपाथ पर रोजी रोजगार चलाने वाले प्रभावित हुए जो औपचारिक अर्थव्यवस्था से बाहर लेनदेन करते थे।

मंशा थी परंपरागत अर्थव्यवस्था पर बहुराष्ट्रीय कंपनियों को कब्ज़ा दिलाना!

इन लोगों को बर्बाद करने के पीछे मोदी सरकार की मंशा औपचारिक अर्थव्यवस्था के समानांतर चल रही परंपरागत और ग्रामीण अनौपचारिक अर्थव्यवस्था को बैंकिंग व्यवस्था के तहत लाए जाने की थी।

ताकि बैंकिंग से बाहर सर्कुलेट हो रही हज़ारों करोड़ की अर्थव्यवस्था पर भी बहुराष्ट्रीय कार्पोरेट जगत का कब्ज़ा हो जाए।

इसीलिए नोटबंदी के दौरान डिजिटल ट्रांजैक्शन पर खुद प्रधानमंत्री ने जोर दिया था।

उनका वह जुमला आज तक लोगों के ज़ेहन में होगा जिसमें उन्होंने कहा था कि ‘अब तो भिखारी भी पेटीएम के माध्यम से भीख लेता है।’

ये जुमले बाद में हवा हवाई ही साबित हुए।

बैंकों को लूट लेने की खुली छूट देने की मंशा

रोज़गार के अवसर कम होने, मंदी आने और भारतीय बैंकों के दिवालिया होने की कगार पर पहुंचने के बावजूद रिजर्व बैंक पर

लगातार सरकारी खजाना पूंजीपतियों के लिए खोल देने का दबाव बनाकर भारतीय अर्थव्यवस्था को एक और दुष्चक्र में फंसाने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है।

अज़ीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी के एक अध्ययन में पाया गया है कि बहुत पढ़े-लिखे भारतीय नौजवानों में बेरोजगारी दर 16% तक पहुंच गया है, नोटबंदी और जीएसटी लागू होने के बाद लघु और मध्यम उद्योग लगभग बर्बादी के कगार पर पहुंच गए।

और एक अनुुमान के अनुसार, इन क्षेत्रों में 24 लाख रोज़गार कम हो गए जबकि निर्यात दर 24 प्रतिशत तक गिर गई।

ताज्जुब नहीं कि बहु प्रचारित गुजरात मॉडल में आज छह लाख लोग नौकरी की तलाश में दर दर भटक रहे हैं।

गुजरात में हीरा और टेक्सटाइल उद्योग ध्वस्त

गुजरात में विशुद्ध नकदी के लेन-देन वाले हीरा कारोबार पर नोटबंदी का ऐसा असर पड़ा है कि कई कारोबारी दिवालिया हो गए।

अल अरबिया न्यूज़ पोर्टल ने गुजरात चैंबर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री के पूर्व अध्यक्ष विपिन पटेल के हवाले से बताया कि, ‘टेक्सटाइल और डायमंड जैसे क्षेत्रों की हालत बहुत खराब हो चुकी है। यहां तक कि मौजूदा कर्मचारियों को नौकरी पर रखे रहना भी बहुत मुश्किल हो गया है।’

हकीक़त है कि रोजगार सृजन के नाम पर शुरू की गई मोदी की कई योजनाओं ने मौजूदा नौकरियां भी छीन लीं।

‘मेक इन इंडिया’ फ्लॉप शो साबित हुआ तो ‘स्किल इंडिया’ का जुमला आया।

इसने उद्योगों को सस्ते मज़दूर रखने का रास्ता साफ़ किया तो उद्योगपतियों ने परमानेंट मजदूरों को बाहर का रास्ता दिखा कर सस्ते मज़दूर रखने शुरू कर दिए।

मोदी की हर स्कीम ने रोज़गार छीनने का काम किया?

साढे 4 सालों में मोदी सरकार ने श्रम कानूनों को जितना ही उद्योगपतियों के हक़ में बदलने की कोशिश की उद्योगपतियों की भूख उतनी ही बढ़ती गई।

जब मोदी सरकार ने फैक्ट्री एक्ट को बदला ताकि उद्योगपतियों को मज़दूरों को रखने और निकालने में सुभीता हो तो इससे रोजगार सृजन होने के बजाय उद्योगों में छंटनी शुरू कर दी।

जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ‘फिक्स्ड टर्म एंप्लॉयमेंट’ और ‘नीम परियोजयना’ लागू किया तो उद्योगों में परमानेंट मजदूरों से छुटकारा पाने की होड़ मच गई।

अभी इसी दिवाली प्रधानमंत्री ने उद्योगपतियों को 1 मिनट में लोन पास करने की घोषणा की तो उद्योगपतियों में पुरानी फैक्ट्रियों को बंद कर नई फैक्ट्रियां चालू करने के नाम पर लोन लेने की होड़ मच गई।

इसका असर अभी नहीं दिख रहा है लेकिन इतना तय है की देर सबेर इसा भी असर मौजूदा नौकरियों पर उल्टा ही पड़ने वाला है।

नौकरियों के जाने के कुछ चुनिंदा वाकये

पिछले 2 सालों में हरियाणा में 8 उद्योग छंटनी, तालाबंदी या आंशिक तालाबंदी के शिकार हुए जिसमें दसियों हज़ार मज़दूर बेरोज़गार हुए।

उत्तराखंड के रामपुर में एक साथ तीन फैक्ट्रियां इसी साल जुलाई में बंद हो गईं, जिसमें साढ़े 4 हज़ार मज़दूर बेरोज़गार हो गए।

यूपी के ग्रेटर नोएडा में मोज़र बेयर नाम की कंपनी बंद हो गई जिसमें 2300 कर्मचारी सड़क पर आ गए।

ये ऐसे उद्योग थे जहां मजदूर 10-10 साल 20-20 साल से काम कर रहे थे।

पूजीपतियों के हित में श्रम कानूनों को ढीला बनाने और उन्हें बेरोकटोक लोन देने की सुविधा देने की कोशिशों का नतीजा यह है की पूंजीपति रोजगार सृजन के बजाय अपना मुनाफ़ा बढ़ाने में जुट गए हैं।

इसमें कोई शक नहीं कि स्वदेशी, मेक इन इंडिया, स्किल इंडिया और भारत को और महाने बनाने का नारा देने वाली मोदी सरकार ने बहुराष्ट्रीय कंपनियों के हित में, उनके प्रतिनिधि के रूप में काम किया है।

बेरोज़ग़ारी के नए आंकड़े इसी बात की तस्दीक करते हैं।

(अलअरबिया न्यूज़ पोर्टल में महेश त्रिवेदी के लेख के इनपुट के साथ।)

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