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मज़दूरों के नाम पर इकट्ठा हुए 36 हज़ार करोड़ रुपये कहां गए सरकार?

23 सालों में सिर्फ 9,967.61 करोड़ रुपये खर्च किए गए, बाकी का हिसाब नहीं

इमारत बनाने के काम में लगे निर्माण मज़दूरों की भलाई के नाम पर 1996 से अबतक 36,685 करोड़ रुपए सरकार ने इकट्ठा किए।

लेकिन इन 23 सालों में सिर्फ एक चौथाई ही खर्च (25.8%) किया गया यानी कुल 9,967.61 करोड़ रुपये। सवाल उठता है 28,755 करोड़ रुपये कहां हैं?

1983 से 2012 के बीच 29 सालों में देश में क़रीब कुल 5 करोड़ निर्माण मज़दूर या इमारती मज़दूर थे।

ये वो आबादी है, जो खस्ताहाल खेतीबारी से उजड़ी थी और इसे निर्माण क्षेत्र ने अपने में समेट लिया।

इंडिया स्पेंड की एक स्टोरी के मुताबिक, अधिकांश निर्माण मज़दूर तय समय तक स्थाई काम और बेहतर मज़दूरी के चलते गांव छोड़ कर कंस्ट्रक्शन साइटों की ओर आए।

शहरों में निर्माण साइटों पर एक तो लगातार काम मिलता है और काम छूट जाने पर यहां वो रिक्शा आदि चलाकर जीवन यापन कर सकते हैं।

लेकिन यहां भी उनकी हालत कोई बहुत अच्छी नहीं है. निर्माण क्षेत्र में काम के घंटे, सुरक्षा और सबसे बड़ी बात मज़दूरी सबसे बदतर होती है।

सरकार बिल्डरों से लेती है 1-2% टैक्स

हालांकि केंद्र सरकार के बहुत से क़ानून निर्माण मज़दूरों के कल्याण के लिए बने हैं जैसे बिल्डिंग एंड अदर कंस्ट्रक्शन वर्कर्स (रेग्युलेशन ऑफ़ एम्प्लायमेंट एंड कंडिशनन्स ऑफ़ सर्विसेज़) एक्ट, 1996 और बिल्डिंग एंड अदर कंस्ट्रक्शन वर्कर्स वेलफ़ेयर सेस एक्ट, 1996 महत्वपूर्ण हैं।

इन क़ानूनों का काम मज़दूरों के कल्याण के लिए फंड मुहैया कराना है। इसके लिए 10 या अधिक मज़दूरों वाले या 10 लाख रुपये से अधिक बजट वाले निर्माण प्रोजेक्टों पर 1 से 2% का सेस यानी टैक्स लगाया जाता है.

राज्य सरकार के कल्याणकारी बोर्ड इन पैसों को इकट्ठा करता है और उसके साथ रजिस्टर्ड मज़दूरों को सामाजिक सुरक्षा देने के लिए खर्च किया जाता है.

18 से 60 साल के जो मज़दूर बिल्डिंग या किसी निर्माण कार्य में मौजूदा साल में 90 दिनों तक काम किए रहते हैं, उन्हें राज्य सरकार के कल्याणकारी बोर्ड से रजिस्टर होने का हक़ होता है.

इसके तहत पेंशन, दुर्घटना की स्थिति में मदद, घर के लिए लोन, शिक्षा, सामूहिक बीमा का प्रिमियम, इलाज़ का ख़र्च, मातृत्व लाभ और अन्य लाभ मिलते हैं.

हालांकि इन क़ानूनों को बने 23 साल गुजर गए लेकिन इनका ढंग से पालन करने की सरकार ने सुध नहीं ली।

यहां तक कि अधिकांश राज्यों ने इस क़ानून के तहत 2011 तक वेलफ़ेयर बोर्ड तक नहीं बनाए थे। इसलिए जो फंड इकट्ठा हुआ वो मज़दूरों को दिया ही नहीं जा सका।

प्रति साल, प्रति मज़दूर कितना इकट्ठा हुआ?

नेशनल कैंपेन कमेटी फ़ार सेंट्रल लेजिस्लेशन ऑन कंस्ट्रक्शन लेबर के आंकड़े के अनुसार, 2016-17 में उत्तर प्रदेश में सर्वाधिक निर्माण मज़दूर थे, कुल एक करोड़ 20 लाख।

2011 तक यूपी में वेलफ़ेयर बोर्ड तक नहीं बना था।

इंडियन एक्सक्लूज़न रिपोर्ट 2017 के मुताबिक, गुजरात और महाराष्ट्र भी ऐसे राज्य हैं, जहां औद्योगिकरण बहुत ज्यादा है। लेकिन टैक्स इकट्ठा करने और इसे वितरित करने के मामले में ये दोनों राज्यों ने बहुत बुरा प्रदर्शन किया है।

नेशनल कैंपेन कमेटी फार सेंट्रल लेजिस्लेशन ऑफ़ कंस्ट्रक्शन लेबर के मुताबिक, केवल चार राज्यों ने प्रति वर्ष प्रति मज़दूर 2000 रुपये इकठ्ठा किए जबकि 20 राज्यों ने 1000 रुपये से भी कम इकट्ठा किए।

ये आंकड़े नेशनल सैंपल सर्वे और इन राज्यों के द्वारा कोर्ट में दाख़िल हलफ़नामे के हैं।

पिछले साल सबसे अधिक दमन एवं दीव (20,525 रुपये), सिक्किम (3,853 रुपये) और छत्तीसगढ़ (3,157 रुपये) प्रति वर्कर इकट्ठा हुए।

पिछले साल सबसे कम फंड इकट्ठा करने वालों में मणिपुर (114 रुपये), झारखंड (135 रुपये) और तमिलनाडु (136 रुपये) शामिल हैं।

रजिस्ट्रेशन में भी भारी दिक्कत

इंडिया स्पेंड की स्टोरी के मुताबिक, गुजरात और महाराष्ट्र जैसे विकसित राज्यों में भी अधिकांश बिल्डरों को इन क़ानूनों के बारे में पता नहीं है।

इंडिया एक्सक्लूशन रिपोर्ट, 2017 के मुताबिक रजिस्ट्रेशन में कई तरह की दिक्कतें हैं, यहां तक कि एक स्कीम का दूसरे स्कीम के साथ ओवरलैप भी एक कारण है।

निर्माण मज़दूरों के रजिस्ट्रेशन के मामले में महाराष्ट्र की हालत सबसे बदतर है। यहां कुल 6 लाख 10 हज़ार वर्कर्स रजिस्टर्ड हैं और 2017 में 5,483 करोड़ रुपए टैक्स इकट्ठा हुआ और इसमें भी केवल 7% ही खर्च हो पाया।

2012 से काम करने वाले एक लेबर हेल्पलाइन एसोसिएशन के दीपक कांबले के अनुसार, भले ही ये कानून 1996 में आया लेकिन 2013-14 में मज़दूरों का रजिस्ट्रेशन होना शुरू हुआ।

निर्माण मज़दूर के सामने सबसे बड़ी समस्या है बिल्डर से 90 दिनों के काम का सर्टिफ़िकेट हासिल करना।

इसके बाद उसे रजिस्ट्रेशन फॉर्म जमा करने के लिए 85 रुपये की फ़ीस जमा करनी होती है।

माहाराष्ट्र में पहले मज़दूरों को सीधे कमिश्नर ऑफ़िस में जाकर रजिस्ट्रेशन कराना होता था लेकिन बाद में सरकार ने ये ज़िम्मेदारी नगर पंचायतों और नगर निगमों को सौंप दिया।

बिल्डरों को अपने प्रोजेक्ट पास कराने के लिए मज़दूर वेलफ़ेयर फंड में टैक्स जमा कराना होता है।

श्रम सुविधा पोर्टल

लेकिन निर्माण क्षेत्र में लगे मज़दूरों के साथ ये बहुत कम ही हो पाता है कि वो तीन महीने तक एक ही प्रोजेक्ट में लगे रहें ऐसे में बिल्डर से इसबारे में सर्टिफिकेट हासिल करना एक टेढ़ी खीर होती है।

लेकिन अगर बिल्डर सर्टिफिकेट दे भी देता है तो रजिस्ट्रेशन करा पाना एक और लड़ाई होती है और कई मामलों में तो फ़ार्म जमा करने के बाद भी महीनों रजिस्ट्रेशन नहीं मिलता।

महाराष्ट्र सरकार का दावा है कि 90 प्रतिशत निर्माण मज़दूर बिल्डिंग एंड अदर कंस्ट्रक्शन वर्कर्स एक्ट के तहत रजिस्टर्ड हैं, लेकिन सामाजिक कार्यकर्ता कहते हैं कि ये झूठ है।

मौसमी मज़दूरों के साथ स्थिति और विकट होती है, क्योंकि वो एक मौसम में काम करके चले जाते हैं और उनका रजिस्ट्रेशन पेंडिंग पड़ा रहता है।

श्रम पर स्टैंडिंग कमेटी की 38वीं रिपोर्ट ने ऑनलाइन और ऑफ़लाइन दोनों तरह से रजिस्ट्रेशन कराने के तरीके इस्तेमाल करने के सुझाव दिए हैं।

श्रम एवं रोज़गार मंत्रालय ने इस बारे में एक अधिसूचना जारी की है ताकि मज़दूर श्रम मंत्रालय के श्रम सुविधा पोर्टल पर ई चलान के द्वारा अपना रजिस्ट्रेशन करा सकें।

इसमें हर मज़दूर को लेबर आइटेंडिफ़िकेशन नंबर दिया जाएगा। इंडिया स्पेंड के मुताबिक, 3 अप्रैल 2019 तक 26 लाख 85 हज़ार लेबर आइडेंटिफ़िकेशन नंबर जारी किए गए थे।

 

बिना हिसाब दिए नई स्कीमें कर दीं घोषित

मोदी सरकार ने श्रम सुधार के नाम पर 2018 में सोशल सिक्युरिटी एंड वेलफ़ेयर बिल के तहत  नए लेबर कोड्स प्रस्तावित किए हैं। जिसमें कई श्रम कानूनों को एक में समेट दिया जाएगा।

हालांकि कल्याण के लिए वसूले जाने वाले टैक्स को इसमें जारी रखा गया है लेकिन असंगठित क्षेत्र के मज़दूरों की सामाजिक सुरक्षा और कल्याकारी स्कीमों के लिए सिर्फ एक तंत्र होगा।

अगर ये कोड लागू होता है तो निर्माण मज़दूरों को कल्याणकारी स्कीम के तहत मिलने वाले लाभ और मुश्किल हो जाएंगे।

क्योंकि इसमें प्रस्तावित किया गया है कि ये लाभ उन्हीं मज़दूरों को मिलेंगे जो सालाना अपनी मज़दूरी का 20 प्रतिशत जमा कराएगा।

बीते फ़रवरी में जब असंगठित क्षेत्र के मज़दूरो के लिए मोदी ने प्रधानमंत्री श्रम योगी मान धन पेंशन योजना की घोषणा की थी, तो इससे निर्माण क्षेत्र में लगे करोड़ों मज़दूरों को मिलने वाली मदद की रूपरेखा और गड्डमड्ड हो गई।

मज़दूर नेताओँ का सवाल है कि मोदी सरकार ने है मज़दूरों के नाम पर इट्ठा किए गए उन 28,755 करोड़ रुपये का बिना हिसाब दिए अलग अलग स्कीमें लॉंच कर मज़दूरों को उनके हक से ही महरूम करने की कोशिश कर रही है।

और वे सवाल करते हैं कि मोदी सरकार आखिर किसकी चौकीदारी में मज़दूरों के हज़ारों करोड़ फंड को हड़पना चाहती है, ये किसी से छुपा नहीं है।

(इंडिया स्पेंड की स्टोरी से साभार)

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