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मजदूरों की मौत की खबर पर तिलमिला क्यों गया रेलवे

सिर्फ एक खबर को लेकर कर दिया ट्वीट, लेकिन बाकी ट्रेनों के संचालन की अव्यवस्था पर साध ली चुप्पी

By आशीष सक्सेना

यकीन नहीं होता कि ये वही रेलवे है, जिसके लिए कभी कहा जाता था कि ये हमारा संसाधन नहीं बल्कि जिम्मेदारी है। जिम्मेदारी इसलिए कि इससे करोड़ों लोगों की रोजी-रोटी सीधे या इसके जरिए जुड़ी है।

श्रमिक स्पेशल ट्रेनों की लेटलतीफी और रास्तों से भटक जाने की खबरों के बीच व्यवस्था को दुरुस्त करने की जगह रेलवे खबरों को झूठा साबित करने में अपनी ऊर्जा खपा रहा है। इस काम में उसका साथ सरकार समर्थक ऑनलाइन पोर्टल दे रहे हैं और खबरों को फर्जी बताने की खबरों को वायरल करने में जुटे हैं।

दरअसल, दैनिक भास्कर अखबार ने खबर छाप दी कि गुजरात के सूरत से 17 मई को बिहार के सिवान दो में पहुंचने की जगह आठ दिन में, यानी 25 मई को पहुंची। ट्रेन गोरखपुर की जगह छपरा होकर पहुंची।

यही नहीं, सूरत से ही सीवान के लिए निकली दो ट्रेनें ओडिशा के राउरकेला और बेंगलुरु पहुंच गईं। इसी तरह जयपुर-पटना-भागलपुर 04875 श्रमिक स्पेशल ट्रेन रविवार रात पटना की जगह गया जंक्शन पहुंच गई।

रेलवे को इससे कोई फर्क नहीं पड़ा, लेकिन इस बात से दर्द हुआ जब खबरों में ये आया कि भूख-प्यास से कुछ लोगों की ट्रेन के सफर के बीच मौत हो गई।

सात लोगों की मौत सफर के बीच हो जाने की बदनामी रेलवे के सिर आई तो सफाई दी जा रही है कि ‘ये आधा सच है, मौत की पुष्टि पोस्टमार्टम से होगी’। जिस मजदूर ने दस रुपये का सत्तू खाने के बाद पानी न मिलने पर दम तोड़ा।

उसके लिए कहा जा रहा है कि वह तो वॉशिंग लाइन से पानी लेने के दौरान नीचे गिर गया इसलिए मौत हुई। लेकिन पर कोई बात नहीं कि पानी क्यों नहीं मिला जो उसे वॉशिंग लाइन से हलक तर करने को जूझने की नौबत आई।

रेलवे अफसरों और सरकार ने असल में ट्रेनों को भी असल में उसी सूरत शक्ल में ढाल दिया है, जैसे मजदूर खुद ही ट्रकों-टैंकरों में भरकर चल दिए और हादसे हुए।

इतना ही फर्क है कि ट्रेनों की व्यवस्था सरकार देख रही है, लेकिन जिम्मेदारी और व्यवस्था के नाम पर सिफर है। डग्गामार वाहनों की तरह भारतीय रेल का संचालन पहली बार ही देखा जा रहा है।

रेलवे इस खास संकट के मौके पर ही नहीं, आम दिनों में भी श्रमिकों के साथ यही बर्ताव करता रहा है। जनरल कोच वाली मजदूरों को बेहिसाब भरकर चलने वाली जननायक और जनसेवा एक्सप्रेस जैसी ट्रेनें इसकी मिसाल हैं।

इन ट्रेनों के टॉयलेट में भी ऐसी भीषण गर्मी में दर्जनों मजदूर भरकर जाते हैं। पायदान पर लटककर, गमछा बांधकर टंगे हुए और पानी के लिए वॉशिंग लाइन पर जूझना और ट्रैक पर गिरकर मर जाना इन ट्रेनों में सफर करने वाले श्रमिकों के लिए आम बात है।

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