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आम हड़ताल की हवा निकालने में जुट गया संघ समर्थित भारतीय मज़दूर संघ, 20 को विरोध प्रदर्शन

22 मई को 10 केंद्रीय ट्रेड यूनियनों ने किया है आम हड़ताल का आह्वान

By आशीष सक्सेना

कोरोना काल में भारत के मजदूरों पर छाए संकट के बीच भी सरकार और मजदूरों से धोखा करने वाली ट्रेड यूनियनों की गतिविधियां संदिग्ध नजर आ रही हैं।

इस बात को दो अलग-अलग दिन होने वाले विरोध प्रदर्शन और हड़ताल के ऐलान से समझा जा सकता है। इस बार उससे भी बड़ी साजिश रचने की कोशिश है, जो सालभर पहले जनवरी में हड़ताल के वक्त दिखाई दी थी।

सरकार के श्रम अधिकार विरोधी कदम से खफा मजदूरों के बीच गुस्सा है, जिसको ठीक दिशा मिली तो कामयाबी और ग़लत मिली तो बरसों तक हाथ बांध लेने की सजा तय है।

इस बात को सरकार भलीभांति जानती है, भले आम मजदूर न समझ सकें। सोचने की बात है, जब श्रम कानून मजदूरों के खिलाफ बदले जा रहे हैं तो ट्रेड यूनियन महासंघ दो अलग खेमों में क्यों बंटे हैं।

बीस मई को आरएसएस समर्थित महासंघ भारतीय मजदूर संघ अपने सहयोगी केंद्रीय श्रम संघों के साथ विरोध जताएगा और 22 मई को अन्य केंद्रीय ट्रेड यूनियनें हड़ताल करेंगी।

इससे भी अजीब बात ये है कि दोनों ही खेमों में सेंट्रल ट्रेड यूनियन इंटक, टीयूसीसी और एलपीएफ़ भी हैं। ऐसा कैसे संभव है!

दरअसल, इसके पीछे दूरगामी खेल है, जिसकी बिसात सालभर पहले बिछाई गई थी।

सरकार ने 44 श्रम कानूनों को चार कोड में तब्दील करने के साथ ही सरकार विरोधी हर आवाज को बंद करने की गरज से ट्रेड यूनियन संशोधन बिल पास किया।

इसके विरोध में श्रम संघों ने आवाज उठाई भी, लेकिन उसी समय आरएसएस और भाजपा समर्थित केंद्रीय श्रम संघ भारतीय मजदूर संघ ने अन्य श्रम संघों के विरोध को बदनाम करना शुरू कर दिया और खुद साझे मंच से अलग हो गया।

इसके साथ ही बीएमएस ने कन्फेडरेशन ऑफ सेंट्रल ट्रेड यूनियंस (कंसेंट) का गठन किया। इसमें टीयूसीसी और इंटक का भी एक धड़ा शामिल हो गया।

इन दोनों केंद्रीय ट्रेड यूनियनों में ‘हम असली तुम नकली’ का विवाद चल रहा है।

इंटक का कांग्रेस समर्थित धड़ा और टीयूसीसी का एक धड़ा वामपंथी यूनियनों के खेमे में शामिल है, जब दूसरे धड़े कंसेंट का हिस्सा बनकर सरकारी बैठकों में हिस्सेदारी करते रहते हैं।

कंसेंट को स्थायी ढांचे की शक्ल देने का काम भी इस बीच होना शुरू कर दिया गया है। जिसका मतलब है, साझी ट्रेड यूनियन बनाने का प्रयास।

हालांकि, ये प्रैक्टिस कितनी सफल होगी, कहा नहीं जा सकता। इसकी वजह ये है कि कंसेंट के शीर्ष नेताओं के बीच तालमेल है, लेकिन स्थानीय नेताओं के बीच खासा अंतर्विरोध है।

बहरहाल, इस तरह मजदूरों के बीच भ्रम तो पैदा होना ही है। दूसरी ओर वामपंथी खेमे में भी कई केंद्रीय श्रम संघ अपने सेक्टर में मजबूत होने के बाद भी सरकार से सामना करने में कतराते देखे जाते हैं।

होने वाले विरोध प्रदर्शन में भागीदारी और नेतृत्व तय करेगा कि कौन कितना मजदूरों के साथ खड़ा होकर सरकार से सामना करने की हिम्मत रखता है। इन खेमों से अलग कुछ स्वतंत्र ट्रेड यूनियनें भी हैं, देखना होगा कि उनका रवैया क्या रहता है।

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