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सभी मनरेगा मजदूरों को नहीं मिल रहा राशन, कोटेदारों की सूची और आदेश से अफरातफरी

तमाम मजदूर ऐसे हैं, जिनके नाम से या तो राशन कार्ड ही नहीं है या फिर राशन कार्ड में यूनिट बतौर नाम नहीं है

By आशीष सक्सेना

कोरोना वायरस के प्रकोप से हुई देशव्यापी तालाबंदी ने मजदूरों के लिए मुसीबत खड़ी कर दी है। राहत देने के लिए भले ही कह दिया गया हो कि मनरेगा मजदूरों को सिर्फ उनके जॉब कार्ड के आधार पर राशन दे दिया जाएगा, लेकिन ऐसा हो नहीं रहा।

उत्तरप्रदेश के बरेली जिले मनरेगा के जिला समन्वयक ने बाकायदा आदेश जारी किया है कि केवल उन्हीं मनरेगा मजदूरों को मुफ्त राशन मिलेगा, जिनका नाम राशन कार्ड में दर्ज है। जबकि तमाम मजदूर ऐसे हैं, जिनके नाम से या तो राशन कार्ड ही नहीं है या फिर राशन कार्ड में यूनिट बतौर नाम नहीं है।

समस्या इस लिहाज से भी है कि अगर उनका नाम दर्ज है तो उन्हें मुफ्त राशन व्यवस्था में शामिल नहीं किया जा रहा। इस अफरातफरी के बीच मनरेगा मजदूर जैसे-तैसे सस्ते गल्ले की दुकानों से राशन खरीदने को मजबूर हैं।

कई कोटेदारों ने सिर्फ उसी सूची से मुफ्त राशन देने को कहा है जो उन्हें आपूर्ति विभाग ने मुहैया कराई है। ऐसे में मनरेगा मजदूरों की संख्या और उपलब्ध सूची में बड़ी संख्या का अंतर है।

सिर्फ बरेली जिले के पंद्रह ब्लॉकों में 1 लाख 58 हजार 872 जॉब कार्ड धारक मनरेगा मजदूर हैं, जबकि राशन इनमें आधी संख्या मुफ्त राशन की योजना से बाहर कर दी गई है। पूरे उत्तरप्रदेश में इसी तरह राशन वितरण का सिलसिला जारी है।

राशन वितरण में सोशल डिस्टेंसिंग का फॉमूला ‘लापता’
कहने को संपूर्ण लॉकडाउन है और सोशल डिस्टेंसिंग का शत प्रतिशत बनाए रखने की कवायद और दावे हैं। लेकिन राशन वितरण में इस कायदे पर कोई काम नहीं हो रहा।

अधिकांश जगह भीड़ जमा करके वितरण हो रहा है। साथ ही, कार्डधारक उपभोक्ताओं को बायोमीट्रिक मशीन पर अंगूठा लगवाकर ही राशन मिल रहा है।

इस तरह बायोमीट्रिक निशान पर एक के बाद एक के स्पर्श का संक्रमण भी हो सकता है, इस बात का ख्याल सरकार और अधिकारियों को या तो आया नहीं, या फिर उसे अनदेखा कर दिया गया।

इस मामले में कोटेदार संघ ने जब ऐतराज जताया था, लेकिन उसको सुना नहीं गया। हालांकि, रेलवे समेत कई दूसरे सेक्टरों में बायोमीट्रिक हाजिरी भी केंद्र सरकार के निर्देश पर एहतियातन बंद है।

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