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आख़िर मोदी सरकार ने मज़दूरों के लिए क्या किया? 12 करोड़ नौकरियां छीनीं, श्रम क़ानून की धज्जियां उड़ाईं?

ऐसी सरकार है जो मज़दूरों की मजबूरी का भी अवसर की तरह इस्तेमाल करती है- नज़रिया

25 मार्च 2020 को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने पूरे राष्ट्र में लॉकडाउन घोषित करते समय हमसे आह्वान किया था कि हम घर पर ही रहें और बाहर बिलकुल न निकलें, उनका आश्वासन था कि सरकार हमारी सभी ज़रूरतों का पूरा ख़याल रखेगी।

चार दिन बाद गृह मंत्रालय ने एक आदेश जारी कर मालिकों को निर्देश दिए कि लॉकडाउन के दौरान मज़दूरों को उनकी पूरी सैलरी दी जाये और किसी भी मज़दूर को काम से न निकाला जाये।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने सभी मालिकों से अनुरोध किया कि वे अपने साथ काम करने वाले लोगों के प्रति संवेदना दिखाएं और सरकार के आदेशों का पालन करें।

आज, जब लॉक डाउन को 3 महीने बीत चुके हैं, हर 4 में से 1 मज़दूर अपनी नौकरी गवां चुका है। 12.2 करोड़ से भी ज्यादा मज़दूर बेरोजगार हैं।

यानी लॉकडाउन शुरू होने से अब तक बेरोज़गार लोगों की गिनती में चौगुना बढ़ोतरी हुई है जबकि इस गिनती वे मज़दूर शामिल भी नहीं हैं जिनके पास कोई पूर्ण रोज़गार नहीं था।

इनमें से ज्यादातर वैसे मज़दूर हैं जिनकी दिहाड़ी बड़ी कम है और नौकरियाँ असुरक्षित। लगभग 9 करोड़ अकुशल व अर्ध-कुशल मज़दूरों के साथ-साथ 2 करोड़ कुशल मज़दूर और कर्मचारी वर्ग के लोगों की भी नौकरियाँ गयी हैं।

अपना रोज़गार करने वाले लाखों लोग जैसे कि रेहड़ी-ठेले वाले लोगों के रोज़गार के सारे माध्यम बंद हो गए क्योंकि पूरे राष्ट्र में तालाबंदी हो गयी।

यह सब हुआ कैसे?

राष्ट्र भर में छोटे से ले कर बड़े उद्योगों में हज़ारहा मालिकों ने सरकार के आदेश के बावजूद मज़दूरों को नौकरी से निकाल दिया।

वे सरकार के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट गए और वहीं मोदी सरकार जिसने 29 मार्च का आदेश जारी किया था अदालत में अपने आदेश का पक्ष नहीं ले पायी।

हालात को और बदतर बनाते हुए सरकार ने 18 मई 2020 को अपना आदेश ही वापिस ले लिया।

इस बीच 12 जून के सुप्रीम कोर्ट के आदेश और सरकार के देर से आये बचाव पक्ष ने मालिकों को खुली छूट दे दी है।

इसके क्या परिणाम हुए?

मज़दूरों की जो भी थोड़ी बहुत नगण्य सी बचत थी वो उन्हें खर्चनी पड़ी।

उन्हें आस-पास के साहूकारों, किराना दुकानदारों से उधार लेना पड़ा, सूद पर क़र्ज़ लेना पड़ा और अपनी इज्ज़त ताक़ पर रखते हुए भुखमरी से बचने के लिए दूसरों पर आश्रित होना पड़ा।

पैसे नहीं होने के कारण मज़दूरों को अपने मकान बचाने के लिए मकान मालिकों से भविष्य में और ऊँचे किराये पर समझौता करना पड़ा।

मज़दूर और उनके परिवारों को कई दफ़े भूखे पेट सोना पड़ा, उन्हें दवाइयां नहीं मिलीं और उन्हें अपने बच्चों को स्कूलों से निकालना पड़ा।

हर 10 में से 4 मज़दूर का मकान का किराया भरना, यहाँ तक कि खाना ख़रीदना भी भरना दूभर हो गया जहाँ वे रहते और काम करते थे इसीलिए कई मज़दूरों ने पैदल चल कर ही गाँव लौट जाने का फैसला किया।

प्रधानमंत्री के भाषण लोगों को सुनाने के आलावा सरकार ने और कुछ भी नहीं किया।

29 मार्च 2020 का आदेश जारी हुए 3 महीने से ज्यादा समय बीतने के बाद भी न तो एक भी मालिक पर कोई कानूनी कार्यवाही हुई है न तो छंटनी किये गए मज़दूरों को काम पर वापिस रखने के आदेश दिए गए हैं।

मोदी सरकार का सलूक

यह कहना सही नहीं होगा कि सरकार ने कुछ भी नहीं किया– सरकार ने पुलिस और अर्ध-सैनिक बलों के तैनाती की जिन्होंने काम की तलाश में बाहर निकलने वाले, हालात के मारे अपने गाँव वापिस जाने की कोशिश में रेल या बस स्टैंड पर जाने वाले मज़दूरों पर पूरी बर्बरता से डंडे बरसाए।

कोविड के अपने आर्थिक राहत पैकेज में सरकार ने मनरेगा पर अपना खर्च 60,000 करोड़ रुपये से बढ़ा कर 1 लाख करोड़ रुपये कर दिया।

उम्मीद कि जा रही है कि इससे ग्रामीण क्षेत्रों में फैली व्यापक बेरोज़गारी से पर लगाम लगेगी और साथ ही उन मज़दूरों को भी काम मिल सकेगा जो शहरों में अपनी नौकरी गवां कर गाँव लौटे हैं।

जैसा कि कई रिपोर्ट्स से पता चला है इसमें से ज्यादातर रकम तो मज़दूरों की बकाया दिहाड़ी चुकाने में ही खर्च हो जाएगी।

सरकार ने कुछ मुद्दों का कोई संज्ञान ही नहीं लिया है जैसे कि मौजूद काम की कमी, मनरेगा के काम में कांट्रेक्टर और मशीनों का इस्तेमाल जिसे इस सरकार ने यह दिखलाने के लिए बढ़ावा दिया था कि मनरेगा पिछली सरकार कि गरीबी पर लगाम लगाने की अक्षमता का जीता-जागता प्रतीक है।

गाजे-बाजे के बीच सरकार ने गरीब कल्याण रोज़गार अभियान का ऐलान किया है जिससे 6 राज्यों के 116 जिलों में घर लौट रहे प्रवासी मज़दूरों को 125 दिन का रोज़गार मिलेगा।

लोगों को उजाड़ने की नीति

ऐसी स्थिति में जब ग्रामीण क्षत्रों में पहले ही नौकरियों की तंगी है, सरकार सबको बस मनरेगा के तहत अकुशल काम या खेतों में मज़दूरी का काम ही दे पायेगी।

यह एक ऐसी सरकार है जो मज़दूरों की मजबूरी का भी अवसर की तरह इस्तेमाल करती है और तमाशा बनाती है।

खनन क्षेत्र का जल्द से जल्द निजीकरण करना सरकार के कोविड के बाद के आर्थिक सुधार पैकेज का आधार है।

सुधार के नाम पर किये जा रहे इस निजीकरण के चलते लगभग 25 करोड़ लोगों जो वन क्षेत्र में या उसके आस-पास रहते हैं जिनमें ज्यादातर आदिवासी हैं और जिनका जीवन और रोज़गार जंगल पर ही आश्रित है बुरी तरह से प्रभावित होगा।

ऐसा करते हुए सरकार वन आश्रित लोगों के अधिकारों का भी हनन कर रही है जो उन्हें वन अधिकार कानून के तहत मिले हैं।

खनन क्षेत्र के निजीकरण और वनों को संरक्षित जंगल घोषित कर वन्य-जीवों को बचाने के नाम पर सरकार आदिवासियों को घुसपैठिया बता कर उनको उस ज़मीन से बेदखल करने की साज़िश कर रही है जहाँ वे पीढ़ियों से रह रहे हैं।

शहरी क्षेत्रों में छोटा-मोटा कारोबार करने वाले वे ढेरों लोग जिनके आमदनी का ज़रिया ख़त्म हो गया उनके लिए समाधान के तौर पर सरकार कर्ज़ बाँट रही है।

जिन रेहड़ी-पटरी वालों ने अपने ज़िन्दगी भर की बचत लॉकडाउन के समय गँवा दी है सरकार उन्हें फिर से अपने पैरों पर खड़ा करने के नाम पर क़र्ज़ के बोझ तले दाब देना चाहती है।

राष्ट्र भर के लाखों मेहनतकश लोगों को सरकार बस प्रधानमंत्री गरीब कल्याण पैकेज के तहत राशन बाँट रही है, वहीं दूसरी तरफ गुजरात, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश कि राज्य सरकारें सारे श्रम कानून खारिज कर लोगों के रोज़गार के अधिकार ही छीन लेने का षड़यंत्र रच रही हैं।

भाजपा की केंद्र शासित सरकार राज्य सरकारों को प्रोत्साहित कर रही है कि वे इस महामारी की आड़ में श्रम कानूनों को धड़ल्ले से खारिज करें ताकि केंद्र सरकार संसदीय प्रक्रिया शुरू करने के नाम पर पाँव घसीटते रहे और अपनी मज़दूर विरोधी अपने फैसलों से पल्ला झाड़ सके।

(यह लेख एनटीयूआई की ओर से प्रसारित किया गया था। वहीं से साभार प्रकाशित।)

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