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अभूतपूर्व बेरोज़गारी-3: आत्मनिर्भता के झांसे में 41 करोड़ छोटे किसानों, छोटे कारोबारी, व्यापारी बेरोज़गारी की भेंट चढ़े

सरकार की नई कृषि नीतियाँ जल्द ही बे-दखल कर डालने वाली हैं, छोटे कारोबारी पहले ही तबाह हो चुके हैं

By एस. वी. सिंह

पंजीकृत और गैर-पंजीकृत बेरोज़गारों के अतिरिक्त भी हमारे समाज में ऐसे कई समुदाय मौजूद हैं, और इनकी संख्या काफ़ी है जो अपने जीवन यापन के लायक़ नहीं कमा  पाते, हालाँकि वो हर वक़्त हाड़तोड़ मेहनत करते हैं।

ये छुपी बे-रोज़गारी है जो प्रथम दृष्टया नज़र नहीं आती लेकिन अगर देश में व्याप्त बे-रोज़गारी की पूरी तस्वीर जाननी है तो इस सेक्शन को भी बे-रोज़गारों में ही गिनना पड़ेगा। यहां ऐसे सिर्फ कैटेगरी की चर्चा की जाएगी।

बात करते हैं सीमांत किसान की। जिस किसान के पास उसकी खुद की खेती की ज़मीन एक हेक्टेयर मतलब 2.5 एकड़ तक है उसे सीमांत किसान और जिसके पास 2 हेक्टेयर अर्थात 5 एकड़ तक ज़मीन है उसे लघु किसान बोला जाता है।

लघु और सीमांत किसान, दोनों की तादाद देश में कुल किसानों की तादाद का 86.2% है। प्रतिष्ठित पत्रकार पी साईनाथ ने अपने शोध से बताया है कि देश में कुल 9.58 करोड़ परिवार हैं जो खेती के व्यवसाय में लगे हुए हैं तथा कुल किसानों की तादाद पता करनी है तो इसे 5 से गुणा करना होगा। इस तरह; 9.58 करोड़ गुणा 5 = 47.9 करोड़ लोग खेती पर निर्भर हैं।

सीमांत और लघु किसानों की कुल तादाद हुई: 47.9 करोड़ का 86.2%; मतलब 41.29 करोड़। देश के उद्योग-व्यवसाय की तरह ही खेती-किसानी में भी आज़ादी मिलने के बाद से ही पूंजीवादी अर्थ व्यवस्था काम कर रही है।

उस वक़्त से ही खेती भूमि, किसानों के एक वर्ग के पास केन्द्रित होती जा रही है और दूसरी ओर लघु और सीमांत किसान भूमिहीन होकर सर्वहारा कैंप में शामिल होते जा रहे हैं।

इस प्रक्रिया की गति, लेकिन, उद्योग-व्यापर क्षेत्र के मुकाबले धीमी है। पूंजी को खेती किसानी में पूरी तरह मुक्त रूप से खेलने देने में कुछ बाधाएं/ नियंत्रण जान पूछकर ज़ारी रहे क्योंकि इतने विशाल समूह का खेती से एक झटके में बे-दखल होकर सर्वहारा के रूप में शहरों में जमा होते जाना एक भयावह संकट को जन्म दे सकता था जिसे शासन तंत्र नियंत्रित ना कर पाता।

पूंजी के सतत जान लेवा संकट और  दूसरी तरफ चन्द पूंजीपतियों के पास पूंजी के बढ़ते पहाड़ को निवेश के अवसर उपलब्ध कराने के सरकार, मतलब सरमाएदारों की मैनेजमेंट समिति के फ़र्ज़ के तहत, अब वो विकल्प भी नहीं बचा।

‘पूंजी के खेल’ में पैदा की गई सब रुकावटों को अब हटाया जा रहा है। ‘आपदा में अवसर’ की अपनी निति के तहत सरकार ने अभी हाल में कृषि क्षेत्र में कई बुनियादी बदलाव किए हैं। आवश्यक वस्तु अधिनियम 1955 में संशोधन किया गया है।

राज्यों को कृषि उत्पाद मंडी समितियों को भंग करने को कहा गया है जिससे किसानों के लिए अपनी उपज को देश में कहीं भी मुक्त बाज़ार के रूप में बेचने का रास्ता साफ कर दिया गया है।

शेयर मार्किट की तरह अनाज की ई-ट्रेडिंग की व्यवस्था करने की भी योजना है। सीमांत और लघु किसान, जो कुल किसानों का 86.2% हैं, इस हालत में भी नहीं होते कि वे अपनी फसल को बेचने के लिए उसके पकने तक का इन्तेज़ार भी कर सके।

अपने जीवन मरण की ज़रूरतों को पूरा करने के लिए उन्हें पहले ही साहूकारों और आड़तियों/ व्यापारियों/ धनी किसानों से क़र्ज़ लेना पड़ता है। समाज के सबसे बे-हाल और शोषित ये लघु और सीमांत किसान, जो कुछ भी ‘कमा’ पाते हैं वो अपने खाने-पीने की ज़रूरतों को लगातार कम करते जाने से ही संभव हो पाता है।

उन्हें भूखे पेट दिन में 15 घंटों तक हाड़तोड़ मेहनत करनी होती है। इतना ही नहीं अपने छोटे- छोटे बच्चों और महिलाओं को भी बिलकुल बंधुआ मज़दूरों की तरह उस छोटे से ज़मीन के टुकड़े में झोंक देना पड़ता है।

इतना सब कुछ करने के बाद भी ‘बचत’ तब ही हो पाती है जब कोई प्राकृतिक विपदा जैसे बाढ़, सूखा, रोग, टिड्डीदल आदि कुछ समस्या ना आए और ऐसा कभी कभार ही  होता है। सीमांत और लघु किसानों की हालत ग्रामीण सर्वहारा से भी दयनीय है।

क्या ये सीमांत और लघु किसान इस स्थिति में हैं कि वे अपनी उपज को मुक्त बाज़ार में बेचने के लिए देश में कहीं भी ले जा सकें? क्या एक अधनंगा, अधभूखा, अस्थि पंजर जिसे सीमांत किसान के नाम से जाना जाता है और जिसे ये भी नहीं पता कि स्कूल का क्लास रूम अन्दर से कैसा दिखता है, अपने लैपटॉप पर ‘इ ट्रेडिंग’ कर सकता है?

किसानों की हालत बताते हुए लेनिन (संकलित रचनाएं, खंड 3 में) लिखते हैं: “उसका (सीमांत किसान का) मुनाफ़ा उसके अनाज से भरे कुठलों से नहीं बल्कि उसके खाली पेट से आता है…एक आम मज़दूर, एक बड़े फार्म पर काम करते हुए खुद से कहता है; मैं चाहता हूँ कि दिन अभी ख़त्म हो जाए, छोटा किसान, लेकिन, हमेशा हर सीज़न में खुद से यही कहता है; ओह, काश दिन एक दो घंटे और बड़ा होता.”

सीमांत और लघु किसान समाज के क्रूरतम शोषित लोग हैं और इनके शोषक ये खुद हैं, उनकी वस्तुगत हालत द्वारा बनाए हुए। इनका ज़िन्दगी बहुत छोटी होती है। लगभग सभी आत्महत्या करने वाले किसान ये ही होते हैं।

ये ना सिर्फ़ आधे भूखे, आधे नंगे रहते हैं बल्कि ये लोग हमेशा क़र्ज़ के बोझ तले भी दबे रहते हैं। ये लोग पशु पालन भी करते हैं लेकिन इनके द्वारा उत्पादित सारे के सारे दूध को ये लोग बेचने को मज़बूर होते हैं, इनके अपने बच्चे उसे चखने तक को तरस जाते हैं।

सरकार की नई कृषि नीतियाँ जल्द ही इन्हें अपनी ज़मीन के छोटे से टुकड़े से बे-दखल कर डालने वाली हैं और ये पूरे का पूरा सेक्शन सर्वहारा की रैंक में मिल जाने वाला है क्योंकि इनके पास सिर्फ़ दो ही विकल्प हैं; या तो भूखों मरें या शहर की मज़दूर बस्तियों में सर्वहारा बन समा जाएँ।

इनकी तादाद हमारे देश में 41 करोड़ से भी अधिक है, ये बात भूलनी नहीं चाहिए। आज भी इनकी गिनती पूर्ण नहीं तो कम से कम अर्ध-बेरोज़गारों में तो होनी ही चाहिए।

मोदी सरकार के बहु प्रचारित ‘विकास’ का सबसे ज्यादा बजने वाला ढोल स्व:रोज़गार सृजन का है: “रोज़गार मांगने वाले नहीं रोज़गार देने वाले बनो” मानो जो लोग भी अपना खुद का फुटकर काम, रेहेड़ी, खोमचे आदि हज़ार प्रकार के पटरी पर माल बेच रहे हैं, जो भी अपने स्व:व्यवसाय कर रहे हैं, सब ऐश कर रहे हैं और वो उन सब को रोज़गार प्रदान करने को लालायित हैं जो भी उनके पास से गुज़र जाए!! आईये, पड़ताल करते हैं।

नोटबंदी’ वो भयंकर हमला था जो इस सरकार ने उन सभी ग़रीब गुरबों पर बोला था जो दिहाड़ी मज़दूरी, रेहेड़ी, खोमचे लगाकर, पटरी पर सामना बेचकर अपना पेट पालते थे।

चूँकि उनकी छोटी छोटी बिक्रियां, ज़ाहिर तौर पर, कैश में ही हुआ करती थीं इसलिए वो नोटबंदी की मार झेल ही नहीं पाए और अपना टाट कमंडल समेटकर सर्वहारा सेना में शामिल होकर, अपनी बची एक मात्र वस्तु, श्रम शक्ति बेचने के लिए हर सुबह पास के लेबर चौकों पर खड़े होने को मज़बूर हो गए।

एक रिपोर्ट के मुताबिक नोटबंदी ने 50 लाख से भी अधिक लोगों का स्व रोज़गार छीन लिया। प्राणघातक नोट बंदी के बाद आया डरावना जी एस टी!! 30 जून 2017 की आधी रात को ठीक 12 बजे ढोल नगाड़े बजाकर हुई जी एस टी की घोषणा मानो लोगों को मूर्ख बनाने का प्रायोजन तथा छोटे और फुटकर व्यापारियों की मौत का अट्टहास था!!

छोटे व्यापारी, उत्पादक बर्बाद हो गए और व्यवसाय का वो अंश बड़े ब्रांडेड उत्पादकों की झोली में दाखिल हो गया, वही जी एस टी का असल उद्देश्य था। सर्वहारा की सेना और बड़ी हो गई क्योंकि करोड़ों फुटकर व्यवसायी उसमें भरती हो गए।

नोट बंदी और जी एस टी की मार से भी जो स्व:व्यवसायी बच निकले थे, मानो  उनका काम तमाम करने के लिए ही सरकार खुदरा व्यापार में 100% विदेशी निवेश का कानून लेकर आई!!

वो पार्टी जिसने कुछ ही साल पहले जिस कानून का विरोध मिरगी के दौरे वाले मरीज की तरह किया था और महीनों संसद को बन्धक बनाकर रखा था उसे अब खुदरा व्यापर में 100% विदेशी निवेश लाकर उन व्यापारियों का सत्यानाश करने में कोई झिझक महसूस नहीं हुई जो हमेशा से उनके विचारों के पोषक और उनके पक्के मतदाता रहे हैं।

पूंजीवादी सरकारों को यूँ ही कॉर्पोरेट की मैनेजमेंट समिति नहीं कहते!! पूंजीवाद के ‘शाश्वत’ नियमानुसार सरमाएदार और सर्वहारा के बीच वाली जगह पर कुछ भी ठहरने वाला नहीं है सबको देर सबेर सर्वहारा के महासागर में समा जाना है।

छोटे-फुटकर व्यापारियों, स्व:व्यवसायियों की बात तो जाने दीजिए, नव उदारीकरण के पूंजीवाद के निर्बाध हमले के सामने कितने ही दिग्गज कॉर्पोरेट भी पछाड़ खाकर गिर रहे हैं। व्यवसाय डूबने पर ख़ुदकशी करने वालों में कई अपने ज़माने के धन्ना सेठ भी शामिल हैं।

बात का निचोड़ ये है कि युवकों को पकौड़े तलने का ज्ञान दरअसल उनका मखौल उड़ाते हुए ये सुनिश्चित करने के बाद दिया गया था कि छोटा व्यवसायी बाज़ार में नज़र ही नहीं आना चाहिए, जो भी माल बिके वो बड़े कॉर्पोरेट के कारखानों से निकला ब्रांडेड ही बिके। (क्रमशः)

(मज़दूर मुद्दों पर केंद्रित ‘यथार्थ’ पत्रिका के अंक तीन, 2020 से साभार)

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