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डरें नहीं, ये है कोरोना से निपटने का तरीका, जानिए क्या है आपके हाथ में

मेहनतकश आबादी और मज़दूर वर्ग कैसे खुद को बचा सकता है कोरोना से

By आशीष सक्सेना

प्रधानमंत्री से लेकर तमाम लोगों की जुबान पर कोरोना वायरस से निपटने को सामाजिक दूरी बनाने के फॉर्मूले पर जोर है। जबकि संकट के वक्त सामाजिक एकजुटता ही काम आती है। यही जरूरत इस समय भी है। हां, भौतिक दूरी बनाने का प्रयास करें, स्पर्श से पहले सुरक्षा का ध्यान रखें।

सामाजिक दूरी का विचार भारतीय समाज का घृणित विचार है, बल्कि पूरी दुनिया के लिए भी। यहां अछूत प्रथा का सदिया का इतिहास इसका प्रमाण है। बीते दिनों फासिस्ट ताकतों ने सांप्रदायिक विष से सामाजिक दूरी का नया रिकॉर्ड कायम कर दिया है, जिसको मिटाने का ये उपयुक्त समय है।

ऐसे में किसके हाथ में क्या काम है, इसको बिंदुवार प्रमुख वर्ग, समुदाय और तबकों को समझने की कोशिश की जाए। जरूरी है कि इन सवालों को बहस का मुद्दा बनाकर किसी निष्कर्ष पर पहुंचा जाए।

मजदूर वर्ग

कोरोना वायरस का सबसे बड़ा संकट मजदूर वर्ग पर है। यही वो वर्ग है जो हमेशा सबके सुख के साधन तैयार करने को पसीना बहाता है और नागरिक होने की हैसियत भी उसे नहीं दी जाती। इस वक्त भी फैक्ट्रियों में जरूरत का सामान तैयार कर रहा है।

कई फैक्ट्रियों से निकाल दिया गया तो घर पहुंचने को खुले आसमान के नीचे पड़ा है। तमाम जगह ठेकेदारों ने बकाया मजदूरी भी नहीं दी है। उनके या उनके परिवार के सामाने भोजन, इलाज और आसरा पाने का भी बंदोबस्त नहीं है।

कहीं छूट मिली है तो उसके एवज में दूसरे तरह से वसूली का खेल भी चल रहा है। सिर्फ इतना ही चुनना है उन्हें कि कोरोना से मरें या भूख से।

ये हालात बता रहे हैं कि इस वर्ग को अभी से निजी उत्पादन इकाइयों का राष्ट्रीयकरण करने, शिक्षण संस्थाओं, स्वास्थ्य सेवाओं समेत सभी सार्वजनिक क्षेत्र को मजबूत बनाने, निजीकरण की प्रक्रिया रद करने, बैंक कर्ज अदायगी न करने वाले सभी उद्योगपतियों की संपत्ति जब्त करने, विदेशी कर्ज जब्त कर लेने की मांग करने की मांग करना चाहिए।

ग्रामीण क्षेत्र के भूमिहीनों और खेत मजदूरों को खेती को सामूहिक फॉर्मों में बदलने और बड़े फॉर्मों का राष्ट्रीयकरण करने की मांग करना चाहिए। इसके लिए एक दूसरे की हर संभव मदद करते हुए एकजुट होने की जरूरत है।

यही वह तरीका है कि फिर कभी ऐसी मुसीबत आए तो व्यवस्था उनका ख्याल पहले रख सके। सरकार से 21 दिन का लॉकडाउन समाप्त होने से पहले जवाब मांगा जाना चाहिए।

मध्यवर्ग

इस वर्ग को अपने जानमाल की रक्षा तक की बातों से बाज आना चाहिए। सामाजिक दूरी बनाने के उसके प्रयास बहुत ही निकृष्ट और निंदनीय है।

सामाजिक दूरी पर पहले ही अमल करके समाज को तोडऩे में उसकी अहम भूमिका बनी हुई है। इस मौके पर भी ये मध्यम वर्ग अपने अंदर के सांप्रदायिक और जातिवादी नजरिए को फैलाने में लगा हुआ है और समाज को बचाने की फर्जी बातें भी कर रहा है।

जबकि उसको मजदूर वर्ग की मांगों के साथ खड़े होने की जरूरत है, जिससे भविष्य में उसको भी समस्या का सामना न करना पड़े और जानमाल के ऐसे संकट में न फंसना पड़े।

सार्वजनिक क्षेत्र के तहत स्वास्थ्य सेवाएं उसे में उत्तम गुणवत्ता के साथ मुफ्त में तभी मिल सकती हैं।

अपने मुहल्ले-कॉलोनी या गांव के गरीब दलित परिवार की जरूरत को पूछें और उनकी मदद करें। ये काम मध्यवर्गीय दलित परिवारों को भी करना चाहिए, क्योंकि ये वर्गीय बीमारी उनके पास भी है।

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उच्च व उच्च मध्यम वर्ग

इस वर्ग से उम्मीद करना फिजूल ही है। फिर भी अगर किसी के दिल में कोई मानवता और करुणा है तो वे अपनी संपत्ति मजदूर वर्ग के हित में राष्ट्रीयकरण कराने का निर्णय लें और इस वक्त अपनी संपत्ति से आमजन की सेवा के संसाधन मुहैया कराएं।

ट्रेड यूनियन व मजदूर संगठन

ट्रेड यूनियन और मजदूर संगठन नेताओं को सिर्फ सोशल मीडिया पर सरकारी दिशानिर्देश बताने की जगह मजदूरों की सहायता के लिए मैदान में आना चाहिए।

उनको मजदूर सहायता समितियां गठित कर अपने ही विभाग या ट्रेड का ख्याल नहीं, बल्कि उनकी जद में आने वाले सभी श्रमिकों की मदद करना चाहिए। इसके लिए उनको अपने विभाग के संसाधन उपयोग में लाने की भी जरूरत है।

उनको सुनिश्चित करना चाहिए कि उनके कारखाना, उपक्रम संस्थान के इलाके में कोई मजदूर न भूखा मरे और न ही संक्रमण की दशा में इलाज को तरसे।

साथ ही सबसे बड़ा काम इस दौरान बनता है कि मजदूर वर्ग की मांगों को पुरजोर तरीके से उठाए और सरकार पर दबाव बनाए कि इसी समय उन मांगों को मानने का ऐलान करे। सरकार को लॉकडाउन के बीच सोचने का पर्याप्त समय है।

दलित आंदोलन

कामगार वर्ग में एससी एसटी समुदाय की बड़ी संख्या है, जिनके साथ ज्यादती वही है, जो मजदूर वर्ग के बारे में बताई गई है। दलित आंदोलन के लोग भी सिर्फ सरकारी बयानों को दोहराने का काम करके किनारा कर रहे हैं।

वे वास्तव में सामाजिक भेदभाव के खिलाफ हैं तो गरीब मजदूर बिरादरजनों की सहायता को समितियां बनाकर मदद करें, वही काम उनको भी करना चाहिए, जो ट्रेड यूनियनों का बनता है। संभव हो तो ट्रेड यूनियनों के साथ मिलकर करें।

सामाजिक भेदभाव का इससे बड़ा क्या प्रमाण होगा कि इलाज की व्यवस्था, कोरंटाइन करने का इंतजाम, भूखे मरने की नौबत, संक्रमण के कामों में होने के बावजूद सुरक्षा के उपायों से यही वर्ग सबसे ज्यादा महरूम है।

इसके बावजूद इस समुदाय के सक्षम लोग घरों में सरकारी धुन सुनकर खामोश बैठे हैं। उनको भी मजदूर वर्ग की मांगों के साथ खड़े होकर सामाजिक भेदभाव के खिलाफ संघर्ष को मजबूत करना चाहिए, बल्कि नेतृत्व में भागीदारी निभाना चाहिए।

बुद्धिजीवी और पत्रकार

सरकार के कदमों की सराहना अहसान बतौर प्रस्तुत करने की जगह, आमजन की वास्तविक परेशानियों को उजागर करें। अपने मीडिया संस्थान के जरिए नहीं कर सकते तो सोशल मीडिया पर करें।

ऐसे लोगों को लेखनी से सबक सिखाएं जो इस समय भी सांप्रदायिक या जातिवादी जहर बोने का प्रयास कर रहे हैं। इससे सरकार को भी ठीक से काम करने की दिशा मिलेगी।

ऐसे ही सवालों को उठाने से सरकार ने कुछ राहत वाले कदम उठाने की घोषणा भी है। उनको कोशिश करना चाहिए कि वे मजदूर वर्ग की मांगों को लगातार मजबूती से उठाएं और सरकार का विपक्ष बने रहें।

महिलाओं से संबंधित

उच्च व उच्च मध्यवर्गीय महिलाओं को छोड़ दें तो महिलाएं पहले ही काफी काम करती हैं और समाज में उनका योगदान अतुलनीय होता है, अगर वे श्रमिक वर्ग की हों। इस दौरान पुरुषों को घरेलू कामों में मदद देना चाहिए।

कपड़े धोने, बर्तन धोने, खाना पकाने, सफाई करने में हाथ बंटाना चाहिए।

इस काम करके पुरुष घरेलू कामों की मेहनत का अंदाजा लगा सकते हैं। साथ ही तमाम उन मानसिक दबावों पर बातचीत करके भविष्य बेहतर बनाने की कोशिश कर सकते हैं।

दैनिक जीवन संघर्ष को समझने का ये मौका है, जिसे महिलाओं को भी समझने की आवश्यकता है।

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